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जानें, व्हाइट फंगस के लक्षण, कारण और बचाव के उपाय

By Anand Dubey June 10, 2021

जानें, व्हाइट फंगस के लक्षण, कारण और बचाव के उपाय

कोरोना से संक्रमित मरीजों की कोरोना को मात देने के बाद रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। जिसके कारण वह आसानी से व्हाइट फंगस जैसी जानलेवा बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। सैमफोर्ड हॉस्पिटल के डॉक्टर रविकांत चतुर्वेदी के अनुसार व्हाइट फंगस कोरोना संक्रमितो में खासकर मधुमेह के मरीजों पर आसानी से हमला करता है। चिकित्सकीय भाषा में व्हाइट फंगस को कैंडिडा कहते हैं। जो रक्त के जरिए होते हुए शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है। यह फंगस मरीज के नाजुक अंग जैसे आंख, गला, आंत, लिवर, जीभ आदि के सेल को तेजी से नष्ट कर देता है। जिससे अंग काम करना बंद कर देते हैं। इस फंगस का अटैक इतना तेज होता है कि यह 2-3 दिनों के भीतर मरीज के महत्वपूर्ण अंग को बर्बाद कर चुका होता है। इस स्थिति में कोरोना को मात देने के बाद भी शरीर के अन्य अंग के फेल होने के कारण रोगी की मौत हो जाती है। डॉक्टरों की मानें तो अन्य फंगस संक्रमणों के मुकाबले व्हाइट फंगस ज्यादा जानलेवा है। क्योंकि यह शरीर के हर अंग पर असर डालता है। यह नाखून, स्किन, पेट, किडनी, ब्रेन, प्राइवेट पार्ट और मुंह के साथ फेफड़ों तक को संक्रमित कर सकता है। हालांकि इस फंगस से प्रभावित, जो मरीज आ रहे हैं जरूरी नहीं कि वे कोविड से ही संक्रमित हों। लेकिन इसके लक्षण काफी हद तक कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले मरीजों से मिलते हैं।

व्हाइट फंगस के कारण-

व्हाइट फंगस (White Fungus) के फैलने के पीछे का सटीक कारण अभी तक मालूम नहीं हो पाया है। लेकिन कई एक्सपर्ट्स ने कोरोना से संक्रमित मरीजों के शरीर में इस संक्रमण के पहुंचने की आशंका ऑक्सीजन सिलेंडर के जरिए बताई है। उनके मुताबिक, गंदे-मैले ऑक्सीजन सिलेंडर या ऑक्सीजन सिलेंडर से जुड़े ह्यूमिडिफायर में नल का पानी इस्तेमाल करने से व्हाइट फंगस इंफेक्शन हो सकता है। इसके साथ ही, स्टेरॉयड का अधिक इस्तेमाल भी इसकी एक वजह हो सकती है।

शरीर में कैसे प्रवेश करता है व्हाइट फंगस?

केजीएमयू की माइक्रोबायोलॉजी विभाग की सीनियर डॉक्टर शीतल वर्मा के अनुसार कैंडिडा यानी व्हाइट फंगस कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों में होता है। विशेष रूप से मधुमेह, एचआईवी से ग्रस्त या स्टेरॉयड का अधिक प्रयोग करने वाले रोगियों पर यह आसानी से हमला करता है। यह संक्रमण खून के माध्‍यम से शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है। यह बीमारी म्यूकॉरमाइसाइट्स नामक फफूंद से होती है। जो नाक के माध्‍यम से बाकी अंग में पहुंचती है। यह फंगस हवा में होता है और सांस के जरिए नाक में जाता है। इसके अलावा, शरीर के कटे हुए अंग के संपर्क में इस फंगस के आने से भी यह संक्रमण हो जाता है।

व्हाइट फंगस के लक्षण-

देश में व्हाइट फंगस के शुरुआती मामलों को एस्परगिलस और कैंडिडा फंगल इंफेक्शन (Aspergillus and Candida) का मिला-जुला रूप माना जा रहा है। यह दोनों ही फंगल इंफेक्शन हैं। जहां कैंडिडा मुख्य रूप से त्वचा के किसी भी भाग पर हो सकता है, वहीं एस्परगिलस एक एलर्जी है। जो त्वचा से लेकर फेफड़े, दिमाग, किडनी आदि को नुकसान पहुंचा सकती है। व्हाइट फंगस में एस्परगिलस का रूप ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। वातावरण, मिट्टी, पेड़-पौधे में आमतौर पर मिलने वाले सूक्ष्मजीवों का सांस द्वारा शरीर में जाने पर एस्परगिलस इंफेक्शन हो सकता है। अमूमन हमारा शरीर इस प्रकार के इंफेक्शन से लड़ने में सक्षम होता है। मगर कोरोना, एचआईवी-एड्स, मधुमेह, अस्थमा जैसी किसी बीमारी के कारण कमजोर हुआ इम्यून सिस्टम सही तरीके से लड़ नहीं पाता। इसके बाद शरीर में निम्नलिखित लक्षण दिख सकते हैं।

● बुखार।
● कमजोरी।
● खांसी में खून के थक्के।
● सांस फूलना।
● वजन घटना।
● जोड़ों में दर्द।
● नाक से खून आना।
● त्वचा पर निशान, आदि।

व्हाइट फंगस की जांच-

व्हाइट फंगस की जांच के लिए डॉक्टर निम्नलिखित टेस्ट करवाने का सुझाव देते हैं। जैसे-


● चेस्ट एक्सरे
● ब्लड टेस्ट
● सीटी स्कैन, आदि।


कोरोना संक्रमण जैसे लक्षण दिखने पर अगर मरीज RT PCR करवाता है और जांच नतीजा निगेटिव आता है, तो विशेषज्ञ उसे कोरोना के लिए HRCT करवाने की सलाह देते हैं। इसमें लंग्स गोले की तरह दिखते हैं, जो कि कोरोना से अलग होते हैं। तब मरीजों से बलगम कल्चर की जांच करवाई जाती है, जिसमें इसकी पुष्टि हो जाती है।

व्हाइट फंगस का इलाज व बचाव-

व्हाइट फंगस के इलाज के लिए डॉक्टर एंटीफंगल मेडिसिन का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन
व्हाइट फंगस का एकदम पुख्ता बचाव नहीं किया जा सकता, पर कुछ हद तक निम्नलिखित
सावधानियों द्वारा इससे बचा जा सकता है। जैसे-


● धूल-मिट्टी या गंदगी वाली जगह पर न जाना।
● मास्क का प्रयोग करना।
● इम्यून सिस्टम को मजबूत करने वाले खाद्य पदार्थ को खाना।
● योग व एक्सरसाइज करना।

कोविड-19 मरीजों को क्यों हो रहा है व्हाइट फंगस?

कोविड-19 और व्हाइट फंगस का सबसे बड़ा और आम रिश्ता यह है कि इस फंगल इंफेक्शन के फेफड़ों तक पहुंचने के बाद दिखने वाले लक्षण बिल्कुल कोरोना के लक्षणों से मेल खाते हैं। कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि मरीज कोविड-19 टेस्ट (Covid-19 test) करवाते रहते हैं। लेकिन रिजल्ट नेगेटिव आने के साथ लक्षण बने रहते हैं। यह फंगल संक्रमण भी कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों को शिकार बनाता है। चूंकि, कोरोना वायरस पहले ही शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर कर देता है। इसलिए व्हाइट फंगस आसानी से मरीज को अपना शिकार बना लेता है। एचआरसीटी टेस्ट के माध्यम से देखा गया है कि व्हाइट फंगस के कारण भी फेफड़ों में कोरोना जैसे पैच दिखाई देते हैं।

क्यों ब्लैक फंगस से ज्यादा खतरनाक है व्हाइट फंगस?

व्हाइट फंगस भी ब्लैक फंगस की तरह शरीर के कई भागों जैसे फेफड़े, त्वचा, दिमाग आदि पर
 मला करता है। लेकिन जो कारण इसे ब्लैक फंगस यानी म्यूकॉरमायकोसिस से ज्यादा खतरनाक बनाता है। वह है शरीर में इसके फैलने की तीव्रता और गंभीरता। यह ब्लैक फंगस (Black Fungus) के मुकाबले ज्यादा तेजी से फेफड़ों व शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों जैसे दिमाग, पाचन तंत्र, किडनी, नाखून व गुप्तांगों तक फैलते हैं और गंभीर क्षति पहुंचाता है। कोविड-19 के मरीजों के फेफड़े पहले से ही कमजोर होते हैं और फिर इस संक्रमण के तेज और गंभीर हमले को वह झेल नहीं पाते। व्हाइट फंगस के खतरनाक होने के पीछे अभी तक इसी वजह को मूल कारण माना जा रहा है।

क्या है ब्लैक फंगस और व्हाइट फंगस में अंतर?

डॉक्टरों द्वारा उपलब्ध कराई गई अभी तक की जानकारी के अनुसार ब्लैक फंगस कोरोना के उन मरीजों में पाया गया है जिनको बहुत ज्यादा स्टेरॉयड दिए गए। जबकि व्हाइट फंगस के केसों की उन मरीजों में भी संभव है, जिन्हें कोरोना नहीं हुआ। ब्लैक फंगस आंख और ब्रेन को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। जबकि व्हाइट फंगस लंग्स, किडनी, आंत, पेट और नाखूनों को आसानी से प्रभावित करता है। इसके अलावा ब्लैक फंगस ज्यादा डेथ रेट के लिए जाना जाता है  और इसमें डेथ रेट 50% के आसपास है। यानी हर दो में से एक व्यक्ति की जान जाने का खतरा होता है। लेकिन व्हाइट फंगस में डेथ रेट को लेकर अभी तक कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है।

नवजात बच्चों में क्रीम स्‍पॉट और महिलाओं में ल्यूकोरिया के रूप में दिखता है व्हाइट फंगस

वाइट फंगस का खतरा महिलाओं और नवजात बच्चों को भी ज्यादा होता है। महिलाओं में यह ल्यूकोरिया यानी जननांग से सफेद स्राव के रूप में दिखता है और नवजात बच्चों में यह फंगस डायर कैंडिडेसिसर बीमारी के रूप में सामने आता है। जिसमें क्रीम कलर के स्‍पॉट दिखते हैं। महिलाओं में यह ल्यूकोरिया की मुख्य वजह है। इसके अलावा कैंसर, एचआईवी और कुपोषण का शिकार मरीजों को यह व्‍हाइट फंगस अपनी चपेट में ले सकता है क्‍योंकि उनमें भी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है।


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