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बदन दर्द के लक्षण, कारण और घरेलू उपचार

Posted 20 September, 2022

बदन दर्द के लक्षण, कारण और घरेलू उपचार

आजकल बदन दर्द की समस्या बेहद आम हो गयी है। इतनी आम की बुजुर्गों की अपेक्षा यह समस्या युवाओं और बच्चों में अधिक देखने को मिलती है। इसका मुख्य कारण आधुनिक खान-पान, रोजमर्रा की भागती जिंदगी और गलत लाइफ स्टाइल को फॉलो करना होता है। कई बार यह समस्या थोड़ा आराम करने, मालिश कराने और कुछ अन्य घरेलू उपचार करने से ठीक हो जाती हैं। लेकिन कुछ समय बाद फिर यह उत्पन्न हो जाती है। ऐसे में इसे नजर अंदाज न करें। क्योंकि इस स्थिति में इसे छोटी-मोटी बीमारी मानकर नजर अंदाज कर देना एक गंभीर समस्या का कारण बन सकतीहै।

बदन दर्द क्या है?

बदन दर्द को अंग्रेजी में बॉडी पेन (Body Pain) के नाम से जाना जाता है। यह एक आम समस्या है, जो किसी भी व्यक्ति को हो सकती है। कुछ लोगों में यह समस्या अचानक देखने को मिलतीहै। साथ ही कुछ मामलों में यह गंभीर रूप का कारण बनता है। बदन दर्द शरीर में उपस्थित मेटाबोलिक रसायनों की कमी के कारण होता है। इसके अतिरिक्त बदन दर्द मुख्य रूप से हड्डियों, नसों, मांसपेशियों और स्नायुबंधन (ligaments) द्वारा मिलकर किए जाने वाले कार्य और उसके तरीके पर निर्भर करता है।

बदन दर्द के लक्षण क्या है?

  • बदन दर्द के सामान्य लक्षण निम्नलिखित है:
  • शरीर के किसी हिस्सों में खिंचाव और जकड़न होना।
  • लगातार पूरे शरीर में दर्द का बना रहना।
  • सुबह में जागते समय शरीर में जकड़न होना।
  • शरीर के ऊपरी या निचले हिस्सों में झनझनाहट या सुन्नता होना।
  • मांसपेशियों में तेज दर्द होना।
  • सोने में कठिनाई महसूस करना।
  • अनिद्रा होना।
  • अधिक शारीरिक कमजोरी महसूस करना।
  • शरीर के किसी हिस्से में सूजन होना।
  • चलने-फिरने में परेशानी होना।

बदन दर्द के कारण क्या है?

सामान्य कारण-

यूं तो बदन दर्द होने के पीछे कई कारण होते हैं। लेकिन उनमें से कुछ सामान्य कारण भी होते हैं, जो निम्नलिखित हैं:

  • लगातार कई घंटो तक बैठकर या खड़े होकर काम करना।
  • शरीर में अत्याधिक कमजोरी होना।
  • नियमित रूप से व्यायाम न करना।
  • शरीर में विटामिन डी की कमी होना।
  • रक्त में आयरन की कमी का होना।
  • अधिक चिंता या तनाव रहना ।
  • त्वचा पर चकत्ते पड़ना।
  • लुपस होना।
  • थायरॉइड की समस्या होना।
  • किसी संक्रमण या इन्फ्लुएंजा से ग्रसित होना।
  • गठिया की समस्या रहना।
  • मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को अधिक रक्त स्राव होना।

जोखिम कारक-

  • भारी वजन उठाना।
  • अधिक देर तक स्ट्रेचिंग वाले व्यायाम करना।
  • गलत मुद्रा में सोना या बैठना।
  • रीढ़ की हड्डी में कमजोरी होना।
  • रोग-प्रतिरोधक क्षमता।
  • ह्रदय रोग।
  • अन्तः स्त्रावी ग्रंथियां।

कैसे करें बदन दर्द से बचाव?

बदन दर्द से पीड़ित लोगों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। लेकिन लोग कुछ सावधानियों को बरतें तो वह बदन दर्द की रोकथाम कर सकते हैं;

  • जो लोग शारीरिक` गति विधियां अधिक करते हैं, वह अपने शरीर को आराम दें।
  • भारी वजन उठाने से बचें।
  • सोने और बैठने की सही मुद्रा अपनाएं।
  • ज्यादा देर तक एक जगह पर बैठकर या खड़े होकर काम न करें।
  • भरपूर पानी पीएं।
  • आयरन, कैल्शियम और विटामिन युक्त फलों एवं आहार का सेवन करें।
  • सभी लोग अपने वजन को नियंत्रित रखें। जिससे उन्हें किसी प्रकार की गंभीर बीमारी न हो सकें।
  • नियमित रूप से व्यायाम एवं योग करें।
  • अपने मांसपेशियों को अच्छे से स्ट्रेच करें। ताकि शरीर में रक्त का संचार सुचारु रूप से हो सकें।

बदन दर्द के घरेलू उपाय-

  • कोल्ड और हीट थेरेपी अपनाएं-कोल्ड थेरेपी को क्रायोथेरेपी के नाम से भी जाना जाता है। इस थेरेपी में बर्फ का उपयोग प्रभावित अंगों पर किया जाता है। ऐसा करने से रक्त परिसंचरण कम होता है। जिससे दर्द एवं सूजन को दूर करने में मदद मिलती है। इसके अलावा बदन दर्द से छुटकारा पाने के लिए प्रभावित अंगों की सिकाई करना भी लाभप्रद होता है। जिसे हीट थेरेपी के नाम से जानते हैं। इसके अंतर्गत हीट पैक, पैराफिन वैक्स एवं हाइड्रो थेरेपी शामिल हैं।
  • सेंधा नमक-बदन दर्द को दूर करने के लिए सेंधा नमक एक प्राकृतिक उपचारक की तरह काम करता है। इसका प्रयोग करने से मांसपेशियों के ऊत्तकों की सूजन एवं दर्द से राहत मिलती है। इसके लिए एक कटोरी एप्सम साल्ट (सेंधा नमक) को हल्के गर्म पानी से भरे बाथटब में डालें। जबतक पानी की गर्माहट रहे तब तक बाथटब में बैठे रहें। ऐसा करने से बदन दर्द में आराम लगता है।
  • मालिश करें-बदन दर्द को दूर करने के लिए तेल की मालिश को कारगर उपाय माना जाता है। इसके लिए सरसों, लैवेंडर या ऑलिव ऑयल में से किसी भी ऑयल को हल्का गर्म करके पूरे शरीर की मालिश करें। ऐसा करने से बदन दर्द में शीघ्र ही आराम होता है।
  • हल्दी है फायदेमंद-हल्दी में सूजन रोधी गुण मौजूद है। साथ ही यह प्राकृतिक दर्द निवारक का काम करती है। इसके लिए एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच हल्दी पाउडर मिलाकर पिएं। ऐसा करने से बदन दर्द से राहत मिलती है।
  • सेब का सिरका है फायदेमंद-सेब का सिरका बदन दर्द और सूजन को दूर करने में बेहद प्रभावी माना जाता है। इसके लिए दो कटोरी सेब के सिरके को हल्के गर्म पानी से भरे बाथटब में डालें। जब तक पानी की गर्माहट रहे तब तक बाथटब में बैठे रहें। ऐसा करने से बदन दर्द कम होता है।
  • दालचीनी का करें उपयोग-दालचीनी प्राकृतिक दर्द निवारक के रूप में काम करती है। क्योंकि इसमें एंटी एनाल्जेसिक, एंटी इंफ्लेमेंटरी और एंटी ऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं। यह सभी गुण दर्द और सूजन से छुटकारा दिलाता है। इसके लिए एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच दालचीनी का चूर्ण और शहद मिलाकर पिएं। इसके अलावा इसके पेस्ट को प्रभावित अंगों पर लगाना भी फायदेमंद होता है।
  • लाल मिर्च है फायदेमंद-मांसपेशियों या बदन दर्द को ठीक करने के लिए लाल मिर्च का इस्तेमाल अच्छा उपाय माना जाता है। दरअसल लाल मिर्च में पाए जाने वाला एंटी एनाल्जेसिक और सूजन रोधी गुण शरीर के किसी भी अंगों के दर्द एवं सूजन को कम करता हैं। इसके लिए एक चम्मच लाल मिर्च पाउडर को दो चम्मच जैतून के तेल में मिलाकर मिश्रण बना लें। अब इस मिश्रण को प्रभावित अंगों पर लगाकर कपड़ें से बांध लें। फिर उसे रात भर के लिए छोड़ दें। अगली सुबह कपड़ें खोलकर अंगों को अच्छी तरह धोएं।
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Everything You Need to Know About Hiccups

Posted 29 August, 2022

Everything You Need to Know About Hiccups

Hiccups are sudden, involuntary contractions of the diaphragm that may repeat several times per minute. The diaphragm is the muscle that separates the chest from the abdomen and plays an important role in breathing. Each contraction is followed by a contraction of the vocal cords, resulting in a sudden rush of air into the lungs and creating the “hic” sound.

Hiccups may occur in episodes or individually. These are often rhythmic, meaning that the interval between each hiccup is relatively constant. Hiccups are a temporary minor problem, but prolonged hiccups may signal a major medical problem.

Women and men tend to get hiccups equally as often but hiccups that last longer than 48 hours are more common in men.

Causes of Hiccups

For hiccups that last less than 48 hours, common triggers may include-

  • Eating quickly and swallowing air along with chewing gum.
  • Drinking too much alcohol.
  • Sudden temperature changes.
  • Drinking carbonated beverages.

For hiccups that last longer than 48 hours, common triggers include-

Damage or irritation of the phrenic nerves or vagus nerves which serve the diaphragm muscle. This may be caused by-

  • Sore throat or laryngitis, a tumor, cyst or goiter in the neck.
  • A hair or any object in the ear touching the eardrum.
  • Gastroesophageal reflux.
  • Pneumonia.
  • Liver disease.
  • Surgery.

A tumor or infection in the central nervous system or damage to the central nervous system as a result of trauma. This can disrupt the body’s normal control of the hiccup reflex. This may be caused by-

  • Stroke.
  • Traumatic brain injury.
  • Tumors.
  • Meningitis.
  • Encephalitis.
  • Multiple sclerosis.

Metabolic disorders and drugs, including-

  • Diabetes.
  • Alcoholism.
  • Kidney disease.
  • Steroids.
  • Anesthesia.
  • Electrolyte imbalance.
  • Tranquilizers.

Risk Factors for Hiccups

Hiccups can occur at any age, even in a fetus. But the following factors can put a person at risk of developing it more often than others-

  • Being a male.
  • Strong emotions and anxiety.
  • People who have received general anesthesia.
  • After surgery, especially abdominal surgery.

Symptoms of Hiccups

  • A single or series of breathing diaphragm spasms that is usually rhythmic.
  • A brief but painful, frequent or occasional interruption in normal breathing with a slight tightening sensation in the throat, chest or abdomen.

Are There any Complications?

Yes, long-term hiccups can lead to certain complications, which are as follows-

  • Trouble sleeping.
  • Malnutrition.
  • Fatigue or exhaustion.
  • Weight loss.
  • Dehydration.

How to Prevent Hiccups?

Although, there are no proven ways to prevent hiccups, but the following methods can be followed to prevent triggers that can cause hiccups:

  • Avoid overeating.
  • Avoid consumption of carbonated drinks.
  • Self-protection from sudden temperature changes.
  • Avoid drinking alcohol.
  • Stay calm. Avoid strong emotions, anger or anxiety.

Diagnosis for Hiccups

Hiccups that last less than 48 hours do not usually need any medical attention, as they resolve on their own. If they persist for longer, a medical professional should be consulted.

To make a diagnosis, the doctor will perform a physical examination and a neurological exam to check your balance and coordination, eyesight, muscle tone, strength and reflexes.

If any underlying medical condition is suspected, the doctor may recommend one or more of the following tests-

  • Blood tests to check the signs of diabetes, infection or kidney disease.
  • Imaging tests such as chest X-ray, CT scan or MRI scan to detect the anatomical abnormalities that may be affecting the vagus nerve, phrenic nerve or diaphragm.
  • Endoscopic tests to check for problems in the windpipe or esophagus.

Treatment for Hiccups

Most of the hiccups resolve on their own without medical treatment. If an underlying condition is causing it, managing the condition may help eliminate the hiccups.

If prolonged hiccup is disrupting your quality of life, the doctor may prescribe medication including-

  • Baclofen.
  • Chlorpromazine.
  • Metoclopramide.

In cases that don’t respond to other treatments, the doctor may inject medication into the phrenic nerve to temporarily block the nerve’s action to stop hiccups.

Another option is the surgical implantation of a battery-operated device to deliver mild electrical stimulation to the vagus nerve. This procedure is commonly used to treat epilepsy, but it has been found to help control persistent hiccups.

Home Remedies to Control Hiccups

  • Sugar-Have a teaspoon of sugar and let it melt slowly in your mouth without chewing. This remedy is effective to stop hiccups. It is especially suitable for young children who don’t follow detailed instructions on breathing patterns.
  • Yogurt-Mix a teaspoon of salt in a cup of yogurt, stir well until the salt is completely dissolved. Consume it slowly, this will help stop hiccups.
  • Cardamom powder-Cardamom powder is an effective remedy for hiccups. Boil 1 cup of water and add 1 teaspoon of freshly ground cardamom powder. Let it cool, then strain and drink the liquid. This medication will help the diaphragm muscles relax and stop your hiccups.
  • Ginger-Peel a small piece of fresh ginger and chew it gently to get rid of hiccups.
  • Warm water-Slowly drink a glass of warm water. This helps stimulate the activity of the vagus nerve, which travels from the brain to the stomach, thereby reducing hiccups.
  • Peanut butter-A spoonful of peanut butter is a great remedy that can help stop persistent hiccups.
  • Holding breath-Hold your breath for a few seconds to effectively retain some of the carbon dioxide in your body. It works against spasms in the diaphragm and thus prevents hiccups.
  • GheeTake 1/2 teaspoon of mustard seeds, mix it with 1/2 teaspoon of pure ghee and swallow the mixture. This will help reduce your hiccups.
  • Pat on the back-If your hiccups are uncontrollable, gently pat your back, behind your neck along your spine. This helps relieve tension in the diaphragm muscles and stops hiccups.

When to see a doctor?

Make an appointment with your doctor if your hiccups last more than 48 hours or are severe enough to cause problems with eating, sleeping, or breathing.

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फ्रोजन शोल्डर (कंधे की अकड़न) के कारण, लक्षण और घरेलू उपाय

Posted 24 May, 2022

फ्रोजन शोल्डर (कंधे की अकड़न) के कारण, लक्षण और घरेलू उपाय

 

 आजकल कई ऐसी बीमारियां हैं, जिनकी कुछ साल पहले तक किसी बीमारी की श्रेणी में गणना नहीं होती थी। लेकिन अब बड़ी तकलीफ बनकर उभर रही हैं। इन्हीं बीमारियों में से एक हैं फ्रोजन शोल्डर (कंधे की अकड़न)। जिसकी मुख्य वजह गलत लाइफ स्टाइल और आधुनिक खान-पान को अपनाना है। जिसके कारण कंधे में अकड़न की समस्या बेहद आम हो गयी है। इतनी आम कि यह बुजुर्ग लोगों की तुलना में युवाओं में अधिक देखने को मिलती है। इस समस्या के मुख्य कारण खराब मुद्रा एवं झुककर बैठना, गलत तरीके से भारी वजन उठाना और घंटों तक कम्प्यूटर पर काम करना आदि होता है।

क्या होता है कंधे की अकड़न?     

फ्रोजन शोल्डर हड्डियों से जुड़ी एक समस्या होती है। जिसके होने पर कंधे के जोड़ों में गंभीर दर्द होता है। जिसे फ्रोजन शोल्डर या कंधे का अकड़न कहा जाता है। इसके अलावा इस समस्या को मेडिकल भाषा में एडहेसिव कैप्सूलाइटिस (Adhesive  Capsulitis) के नाम से भी जाना जाता है। यह समस्या आमतौर पर 40 से 70 आयु के लोगों में देखने को मिलती हैं। हालांकि, आज के दौर में अनियमित दिनचर्या के कारण लगभग सभी उम्र के लोगों को फ्रोजन शोल्डर जैसी परेशानी से गुजरना पड़ता है। वही, यह समस्या पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक देखने को मिलती है। दूसरे शब्दों में कहें तो कंधे के जोड़ों या आस-पास के ऊतकों में सूजन हो जाती है और वह अकड़ जाते हैं। जिससे कंधे को हिलाने में परेशानी और दर्द उत्पन्न होने लगते है। कंधे की अकड़न की समस्या एक या दोनों कंधो को प्रभावित कर सकती है। दरअसल कंधे की हड्डियां, स्नायुबंधन (ligaments) और मांसपेशियां यह सभी अंग, सिर को सहारा देती है।साथ ही गति को सामान्य बनाए रखती हैं। ऐसे में उस स्थान पर सूजन, चोट या किसी भी प्रकार की  असामान्यता होने पर कंधे में दर्द या अकड़न होने लगती है। इसे दूर करने के लिए फिजियोथेरेपी या व्यायाम की आवश्यकता पड़ सकती है।

कंधे की अकड़न के चरण-

फ्रोजन शोल्डर यानी कंधे की अकड़न सामान्यतः धीरे-धीरे और तीन चरणों में विकसित होते हैं जो कुछ महीनों तक बने रहते हैं। आइए बात करते हैं इन्हीं चरणों के बारे में दर्दनाक चरण (फ्रीजिंग)- फ्रोजन शोल्डर का यह चरण काफी दर्दनाक होता है। इसमें दर्द कंधे के किसी भी गतिविधि में हो सकता है। साथ ही यह दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है और रात के समय यह तीव्र हो जाता है। आमतौर पर यह दर्द मरीज को 3 से 9 महीने तक परेशान करता है। फ्रोजन (Frozen)- यह कंधे की अकड़न का दूसरा चरण होता है। इसमें फ्रीजिंग चरण की अपेक्षा कम दर्द का एहसास होता है। लेकिन इस अवस्था में आपका कंधा अकड़ सकता है। यह चरण 4 से 12 महीने तक हो सकता है।थाविंग (Thawing)- यह कंधे की अकड़न का अंतिम चरण माना जाता है। इसमें कंधा पहले जैसा काम करने में सक्षम हो जाता है । लेकिन इस अवस्था में दर्द के होने की संभावना बनी रहती है। यह चरण 1 से 3 साल तक रहता है।

कंधे की अकड़न के सामान्य लक्षण-

●कंधे को हिलाने में कठिनाई महसूस करना।

●कंधे की कैप्सूल का सख्त या कठोर(स्टिफनेस) होना।

●कंधे में तेज दर्द होना।

●कंधे में खिंचाव या अकड़न के कारण कार्य करने में असमर्थ होना।

कंधे की अकड़न होने के कारण- 

शोल्डर ब्लेड, ऊपरी बाह की हड्डी और गर्दन से नीचे की कंधे की ओर जाती हुई हड्डी (कॉलरबोन) अर्थात इन तीनो हड्डियों से मिलकर कंधे का निर्माण होता है। यह सभी हड्डियां कंधे में गेंद के आकार के सॉकेट से जुड़ी होती हैं। इस जोड़ या सॉकेट में आस-पास के हड्डियों को जोड़ने वाले ऊतक (टिश्यू) मौजूद होते हैं। इसके अतिरिक्त कंधे के जोड़ में मौजूद द्रव (Synovial fluid) जोड़ों को बिना घर्षण के हिलने में सहायता करता है। लेकिन किसी कारणवश इन्हीं ऊतकों में क्षति होती है, तब कंधे की अकड़न शुरू हो जाती है। जो प्रायः कंधे के दर्द से जुड़े होते हैं। कंधे की दर्द का प्रमुख कारण उपास्थि और हड्डियों में घिसाव के कारण हुई टूट-फूट भी होता है। ऐसी समस्या ज्यादातर उम्र बढ़ने वाले लोगों में पाई जाती है। हालांकि, यह अन्य जोखिम कारकों के कारण युवकों में भी होता है। आइए जानते हैं इन्हीं जोखिम कारकों के बारे में;

●मधुमेह (डायबिटीज) होने पर। 

●अतिसक्रिय थायराइड (हाइपरथायरायडिज्म) होने पर। 

●हाइपोथायरायडिज्म यानी थायराइड का कम होना। 

●हृदय संबंधी कोई बीमारी होने से। 

●टीबी की शिकायत होने पर। 

●पार्किंसंस रोग जैसी समस्या से ग्रसित व्यक्ति को।

कंधे की अकड़न का निदान-

कंधे की अकड़न के निदान के लिए डॉक्टर सबसे पहले कराने की सलाह देते हैं। कुछ शारीरिक परीक्षण निम्नलिखित हैं शारीरिक परीक्षण- इस परीक्षण में डॉक्टर समस्या को पता लगाने के लिए सबसे पहले शारीरिक परीक्षण करते हैं। इस प्रक्रिया में वह कंधे की हड्डी, गर्दन एवं पीठ के पीछे के हड्डियों को स्पर्श करते हैं। इससे पता चलता है कि असल में समस्या कहां से उत्पन्न हो रही है। मेडिकल हिस्ट्री- चिकित्सक रोगी से उसकी मेडिकल हिस्ट्री के बारे में पूछ सकते हैं। ऐसी समस्या पहले कभी हुई थी या नहीं। यदि हां, तो उसके लिए किस प्रकार की दवाइयाँया उपचार किया गया था। एक्स-रे- फ्रोजन शोल्डर की जांच के लिए डॉक्टर एक्स-रे करवाने की सलाह देते हैं। इससे रोग का सही ढंग से पता चलता है कि अकड़न या दर्द किस वजह से हैं।

कंधे की अकड़न के घरेलू उपाय-

एप्सम साल्ट (सेंधा नमक)-

एक कटोरी एप्सम साल्ट (सेंधा नमक) को हल्के गर्म पानी से भरे बाथटब में डालें। जबतक पानी की गर्माहट रहे तब तक बाथटब में बैठे रहें। ऐसा करने से कंधे की अकड़न में आराम मिलता है। 

आइस पैक-

आइस पैक (ice pack) कई तरह के दर्द में मदद करता है। इसलिए आइस पैक को प्रभावित अंग पर लगाने से काफी आराम मिलता है। इसके अलावा आइस पैक कंधे या शरीर के अन्य किसी हिस्से में दर्द के साथ सूजन को भी खत्म करता है।

गर्म सिकाई करें-

किसी भी तरह के दर्द से राहत पाने के लिए गर्म पानी से सिकाई करना एक अच्छा उपाय माना जाता है। इससे रक्त का संचरण भी ठीक हो जाता है। इसके अलावा गर्म पानी से शावर लेने पर भी कंधे की दर्द में फायदा करता है।  

तिल का तेल- 

तिल के तेल में फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, जिंक, कॉपर और विटामिन डी प्रचूर मात्रा में पाए जाते हैं। जो कंधे की दर्द या अकड़न से राहत दिलाने का काम करते हैं। इसके लिए प्रतिदिन तिल के तेल को हल्का गुनगुना करके हल्के हाथों से प्रभावित अंगों कीमालिश करें। ऐसा करने से आपका दर्द काफी हद तक कम हो जाता है। 

फ्रोजन शोल्डर के लिए फीजियो थेरेपी (व्यायाम)- 

फ्रोजन शोल्डर अर्थात कंधे की अकड़न या दर्द को कम करने के लिए डॉक्टर कुछ शारीरिक व्यायाम करने की परामर्श देते हैं। इन व्यायामों का उपयोग नियमित रूप से दिन में कम से कम 3 से 4 बार करने से कंधे के दर्द से काफी हद तक राहत मिलती हैं जो निम्नलिखित हैं:

●शोल्डर स्ट्रेच। 

●वाल क्रावल। 

●पेंडुलम। 

●रोप एंड पुल्ली स्ट्रेचेस।

क्या है फ्रोजन शोल्डर के बचाव और सावधानियां?

●दर्द को नजरअंदाज न करें। लगातार या कई दिनों तक रहने पर डॉक्टर से तुरंत सलाह लें। 

●तेज दर्द का अहसास होने पर अपने हाथों को सिर के बराबर ऊंचाई पर रख कर सोएं।

●3 से 9 महीने के समय को फ्रीजिंग पीरियड माना जाता है। इस दौरान फिजियोथेरेपी के इलाज से बचें।

 
 
 
 
 
 
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What is Achalasia? Know its Symptoms, Causes and Home remedies

Posted 06 April, 2022

What is Achalasia? Know its Symptoms, Causes and Home remedies

Achalasia is a rare but serious disease that usually affects the oesophagus i.e, the food pipe. The oesophagus is a type of tube that carries food from the throat to the stomach. Apart from this, there is also a lower oesophagal spectrum in the body that is not able to open properly while chewing food due to achalasia due to which the chewed food remains in the tube. In this situation, sometimes the nerves of the food pipe also get damaged. Thus, a person suffering from this disorder finds it extremely difficult to swallow food. Also, there is discomfort in the oesophagus.

A person suffering from achalasia has to face problems like indigestion, vomiting, chest pain, burning sensation and weight loss because, in this disease, the oesophagus does function properly. As a result, food does not mix with saliva to reach the stomach through the food pipe.

Symptoms of Achalasia

Achalasia affects the body in many ways. People with this disease often have difficulty swallowing food and liquids due to which they feel that food is stuck in their throat. The disease mostly affects people between the ages of 25 and 60. The symptoms of this disease can last for several months or even years. Hence its symptoms are as follows:

  • Pain and nervousness after eating.
  • Chest pain and discomfort.
  • Difficulty swallowing liquids or solids.
  • Feeling like a lump in the throat.
  • Weight loss.
  • Burning in chest.
  • Feeling stressed etc.
  • Sometimes in some people without any symptoms, problems like sudden shortness of breath, phlegm in the throat, food or something stuck in the throat are also seen. Apart from this, symptoms like food coming back from the food pipe and acid reflux also start appearing.

Causes of Achalasia

There is no exact cause of this disease. This can happen due to various reasons such as genetic, autoimmune disorders, and viral infections. During an autoimmune disorder, the body's immune system mistakenly attacks healthy cells in the body which also affects the nerves of the oesophagus due to which the person starts having difficulty in swallowing while eating or drinking something.

Treatment and Screening process of Achalasia

To treat and diagnose achalasia, doctors conduct some tests to examine the body of the victim and also try to know the family’s medical history. The tests & procedures are-

Oesophageal manometry-

Through this test, the contraction of muscles in the oesophagus is observed while swallowing food by which it is ascertained how much the lower oesophagal sphincter is opening and closing while swallowing food.

X-ray-

For this procedure, the inner lining of the patient's digestive system is first filled with a special fluid. After that, the upper part of the digestive system, the upper part of the stomach and intestine and the food pipe are examined. For this procedure, the patient is given a barium tablet to eat which helps to check for obstruction in the oesophagus.

Endoscopy-

In this procedure, the doctor examines the oesophagus and stomach by inserting a flexible tube containing a light and camera into the patient's throat. Through this test, the blockage in the food pipe is checked. Apart from this, the tissue sample is taken and sent to the laboratory for an acid reflux test.

Myotomy surgery-

Myotomy is a surgical procedure in which the oesophagus is cut slightly to open the sphincter muscle of the patient. Thus this surgery gives the patient a permanent solution to swallowing.

Pre-oral endoscopic myotomy-

This is a new treatment in which instead of operating, the patient is given myotomy using a gastroscope.

Apart from all this, in some cases, an attempt is made to increase the patient's oesophagal sphincter by inserting a balloon so that the patient's oesophagal sphincter can open slightly. This process is repeated over and over again when the oesophagal sphincter does not open.

Home remedies for Achalasia

In the case of achalasia, this problem can be avoided to a great extent by making some lifestyle changes and adopting the right eating habits. Therefore, these changes are as follows-

  • Drink plenty of water when suffering from achalasia. Apart from this, drink water in between while eating because, with the help of water, there is less trouble in swallowing food.
  • When suffering from achalasia, take only a liquid diet instead of a solid for a few days.
  • During this time, drink carbonated beverages in appropriate amounts. This increases the pressure on the oesophagus and it easily reaches the stomach.
  • Take a healthy liquid diet supplement if you are losing weight due to achalasia.
  • Eat a diet rich in nutrients, vitamins and minerals to reduce malnutrition and physical weakness during achalasia.
  • When suffering from achalasia, the patient should consume foods like curd, milk, porridge, oats, juice and soup.
  • Always chew the food thoroughly and eat it.
  • When suffering from achalasia, avoid consumption of anything that causes difficulty in swallowing.
  • Do not consume anything that causes constipation or gas in the stomach at the time of achalasia.
  • Exercise daily.
  • While sleeping, sleep with the head slightly above the pillow or any other mattress. By doing this, the oesophagal promote the emptying of the contents of the stomach and the patient does not have much difficulty in breathing.

 

 

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कब होती है मांसपेशियों में कमजोरी? जानें, इसके कारण, लक्षण और उपचार

Posted 15 February, 2022

कब होती है मांसपेशियों में कमजोरी? जानें, इसके कारण, लक्षण और उपचार

मांसपेशियों में कमजोरी आना एक आम समस्या है जिसका मतलब मांसपेशियों की गतिविधियों का ठीक से काम न कर पाना है। यह समस्या ज्यादातर उन लोगों में देखने को मिलती है, जो लोग शरीर से अधिक कमजोर होते हैं अर्थात जिन लोगों में शारीरिक ताकत की कमी होती है। इसके अलावा यह समस्या अधिक काम करने वाले लोगों में भी हो सकती है। इस समस्या से ग्रसित व्यक्ति के शरीर में गिरावट, जलन, बेचैनी, मांसपेशियों में ऐंठन एवं दर्द, आदि लक्षण नजर आते हैं।  

 

मांसपेशियों में कमजोरी के कारण

 

मांसपेशियों में कमजोरी या दर्द होने के पीछे कई कारण होते हैं। जिनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

 

बढ़ती उम्र

 

मांसपेशियों में कमजोरी का सबसे बड़े कारणों में से एक है बढ़ती उम्र का होना। क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ-साथ शरीर की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। 40 से 50 साल तक हम और आप महसूस नहीं कर पाते हैं लेकिन इससे बाद की उम्र में कमजोरी महसूस होने लगती है। परिणामस्वरूप मांसपेशियां अधिक नाजुक हो जाती हैं। उपरोक्त आयु के दौरान यह समस्या सभी लोगों में ज्यादा होती है और कई बार यह इनएक्टिव होने के कारण भी होती है। इसलिए इस उम्र में व्यक्ति को अपने शरीर के पीछे ज्यादा से ज्यादा एक्टिव रहना चाहिए।

 

किसी दवाई का दुष्प्रभाव होना

 

बीमार होने पर डॉक्टर हमें कुछ दवाईयां देते हैं। जो हमें ठीक होने में सहायता करती हैं। लेकिन साथ में इन दवाईयों के कुछ दुष्प्रभाव भी होते हैं। जिसके कारण मसल्स वीकनेस जैसी कई गंभीर बीमारियां होने की संभावना बढ़ जाती हैं।

 

रोग-प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना

 

मांसपेशियों की कमजोरी होने का प्रमुख कारण कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता (Immune System) होता है। इसलिए लोगों को नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए ताकि उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रहे।

 

शरीर में विटामिन और मिनरल्स की कमी होना

 

शरीर को सभी तरह के पौष्टिक पदार्थों की आवश्यकता होती है। क्योंकि यह पदार्थ शरीर को सेहतमंद बनाते हैं। इसमें विटामिन और मिनरल्स भी शामिल हैं। जिसका मुख्य काम मांसपेशियों को मजबूत करना होता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति विटामिन और मिनरल्स युक्त तत्वों का सेवन नहीं करता तो उसे मसल्स वीकनेस समेत अनेक बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है।

 

स्ट्रोक के कारण

 

यदि किसी को कभी भी स्ट्रोक हुआ है तो उससे मांसपेशी कमजोर हो जाती है। कई बार स्ट्रोक (पक्षाघात) होने पर व्यक्ति के शरीर की एक तरफ की मांसपेशियां प्रभावित होती हैं। जिसके वजह से व्यक्ति को चक्कर आना, चलने-फिरने में परेशानी होना, धुंधला दिखाई देना, सिर दर्द रहना और कंफ्यूज रहना आदि समस्याएं उत्पन्न होते हैं।

 

मांसपेशियों में कमजोरी के अन्य जोखिम कारक

 

  • शरीर में रक्त की कमी होने पर।
  • खेल के दौरान मांसपेशियों में चोट लगने पर।
  • अधिक परिश्रम करने पर।
  • गलत या अस्वस्थ आहार लेने पर।
  • पोलियो, रूमेटिक बुखार होने पर।
  • डायबिटीज एवं थाइराइड होने पर। 
  • कैंसर ट्रीटमेंट थेरेपी और रूमेटाइड आर्थराइटिस। 
  •  
  • मस्तिष्क संबंधी बीमारी जैसे डिप्रेशन आदि होने पर। 

 

मांसपेशियों के कमजोर होने के लक्षण

 

  • मांसपेशियों में ऊर्जा की कमी का आभास होना।
  • चलने-फिरने में कठिनाई महसूस करना।
  • सांस लेने में तकलीफ होना।
  • लेटने के बाद सिर को उठाने में परेशानी होना।
  • किसी एक अंग को हिलाने में परेशानी होना।
  • अपने दैनिक कार्य जैसे कंघी करना, सीढ़िया चढ़ना, बोलने में कठिनाई महसूस करना।
  • थकावट महसूस करना।
  • चक्कर आना।
  • बेचैनी  या घबराहट होना।
  • शरीर में कंपकंपी आना।
  • अधिक नींद आना।
  • देखने में परेशानी होना।
  • मांसपेशियों में ऐंठन होना।
  • खाने-पीने या निगलने में कठिनाई महसूस करना।

 

कैसे करें मांसपेशियों में कमजोरी की रोकथाम?

 

मांसपेशियों की कमजोरी से पीड़ित मरीजों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन लोग कुछ सावधानियों को बरतें तो वह मांसपेशियों की कमजोरी की रोकथाम कर सकते हैं;

  • जो लोग गतिविधियां अधिक करते हैं, वह अपने मांसपेशियों को आराम दें।
  • आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन इत्यादि पौष्टिक युक्त भोजन का सेवन करें।
  • पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
  • नियमित रूप से व्यायाम करें। ताकि वह लोग सेहतमंद रहें।
  • अपने मांसपेशियों को अच्छे से स्ट्रेच करते रहें। जिससे रक्त का संचार ठीक रहता है। 
  • सभी लोगों को अपने वजन को नियंत्रित करना चाहिए। जिससे उन्हें किसी प्रकार की गंभीर बीमारी न हो सके।

 

  • अपने स्वास्थ्य को नियमित रूप से चेक करवाएं। जिससे पता चलता है कि हम पूरी तरह से स्वस्थ्य हैं।
  • यदि शरीर के किसी अंग की  मांसपेशियां कमजोर हैं  तो फिजियोथैरेपी जरुर करवाएं।

 

मांसपेशियों में कमजोरी के घरेलू उपचार

 

 

तेल की मालिश

 

मांसपेशियों की कमजोरी को दूर करने के लिए तेल की मालिश को कारगर उपाय माना जाता है। इसके लिए नारियल एवं सरसों तेल की समान मात्रा को गर्म करके मिला लें। अब इस मिश्रण से प्रभावित जगहों पर हल्के हाथों से मालिश करें। ऐसा करने से मांशपेशियां मजबूत होती है। इससे प्रभावित जगह की दर्द एवं सूजन भी कम होती है।

 

विटामिन युक्त खाद्य पदार्थो का सेवन

 

मांसपेशियों में कमजोरी के इलाज और रोकथाम में विटामिन्स का महत्वपूर्ण योगदान होता हैं। एक शोध के अनुसार, विटामिन-डी आंतों में कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ाता है। वहीं, विटामिन-सी मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करता है। इसलिए हमें अपने भोजन में विटामिन से समृद्ध खाद्य पदार्थों जैसे पनीर, खट्टे फल, हरी पत्तेदार सब्जियों आदि का सेवन जरुर करना चाहिए।

 

दूध का सेवन करें

 

दूध में कई तरह के विटामिन और मिनरल्स पाए जाते हैं। जो मांसपेशियों के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरुरी है। इसलिए प्रतिदिन दूध पीने से मांसपेशियों को कमजोरी दूर करने में सहायक होती है। इसके अलावा दूध कैल्शियम से समृद्ध है, जो कमजोर मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करता है। साथ ही इसके निरंतर सेवन से शरीर हाइड्रेट भी रहता है।

 

आवंला है फायदेमंद

 

आवंला कैल्शियम,आयरन, प्रोटीन एवं विटामिन बी से भरपूर है। यह सभी तत्व कमजोर मांसपेशियों के लिए बेहद जरुरी होते । इसके अलावा आंवला में प्राकृतिक एनाल्जेसिक गुण पाया जाता है, जो कमजोर मांसपेशियों के कारण होने वाले दर्द को कम करता है।

 

कमजोर मांसपेशियों को दूर करने के लिए केला खाएं

 

केला शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है। इसके अलावा मांसपेशियों की कमजोरी को दूर करने के लिए बेहतरीन उपाय है। दरअसल केले में सुक्रोज और ग्लूकोज जैसे कार्बोहाइड्रेट मौजूद है। साथ ही केले में पोटैशियम की प्रचूर मात्रा पाई हैं जाती है।  जो कार्बोहाइड्रेट को ऊर्जा में परिवर्तित  कर देती है। यह ऊर्जा कमजोर मांसपेशियों को दूर करने में बेहद जरुरी है।  

 

कब जाएं डॉक्टर के पास?

 

  • बेहोश होने पर।
  • मांसपेशियों की कमजोरी गंभीर होने पर।
  • चलने-फिरने या अंगों को हिलाने में अधिक कठिनाई होने पर।
  • अधिक बेचैनी, उलझन एवं कुछ समझने में कठिनाई महसूस करने पर।
  • सांस लेने में तकलीफ होने पर।
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Slipped disc- Causes, Symptoms and Home remedies

Posted 18 January, 2022

Slipped disc- Causes, Symptoms and Home remedies

In today's time almost everyone has the problem of back pain. There are many reasons behind this. One of these reasons is a slipped disc. However, this disease is mostly seen in the elderly but due to the hectic life and unhealthy lifestyle, the problem of slipped disc has become very common today. Working on a computer for long hours, using a cell phone for a long time, standing for a long time, running for long hours, incorrect posture and lifting heavy weights in the wrong way, etc. are some of the common causes of a slipped disc.

What is a Slipped disc?

There are small padded discs in the back to support the bones that are attached to the spine. It works to protect the spine from shocks and keeps it flexible. When this disc swells or breaks due to some reason, this condition is called a slipped disc. In addition, the outer wall of the disc becomes discolored or inflated due to which the fluid present in it starts leaking into the spinal cord.

The human spine consists of 7 cervical spines, 12 thoracic spines and 5 lumbar spines from top to bottom. All these bones are connected by discs. Each disc consists of two parts- soft inner part and hard outer ring. Due to the weakening of the outer ring for some reason, the inner part of the disc gets a signal to exit. This phenomenon is known as slipped disc or herniated disc.

Types of Slipped discs

There are mainly three types of slipped discs, which are as follows-

Cervical disc slip

Cervical disc slip occurs in the neck. This causes pain in the back of the head, neck, shoulder bone and hands.

Lumbar disc slip

This disc slip occurs in the lower part of the spine. This causes pain in the lower back, hip, thigh, anus/genitals and feet or toes.

Thoracic disc slip

This type of slipped disc occurs in the middle of the spine. The main reason for this is the pressure exerted around it. This causes pain in the central part of the back and shoulder area. However, the chances of this happening are very low.

Stages of Slipped disc

There are four stages of a slipped disc, which are as follows-

First stage

Dehydration starts from the discs of the body in this phase due to which the outer layer of the disc becomes weak and flexibility decreases. This problem occurs due to aging.

Second stage

In the second stage, cracks develop in the fibrous layers of the disc due to which the fluid inside it starts leaking or bubbles start forming.

Third stage

In the third stage of a slipped disc, a portion of the nucleus breaks off but it resides inside the disk.

Fourth stage

This stage of slipped disc is very serious. In this phase the fluid inside the disc starts coming out from the hard outer layer. Along with this, the leakage of this fluid starts completely in the spinal cord.

Causes of Slipped disc

There are many reasons behind a slipped disc but some of the main reasons are the following-

Disc weakening

Each of the vertebrae present in the spinal cord are connected by discs which tend to weaken over time. In older people, the outer layer of the disc begins to weaken and bulge due to which complaint of slipped disc occurs due to slight injury or blow. If these vertebrae break, then there is pressure on the nervous system of the body. As a result, pain occurs in the back. After some time this pain starts affecting different parts of the body as well.

Pressure on the disc

Some people's daily chores involve difficult and tiring activities which exerts pressure on the disc. This includes activities such as lifting heavy weights, working in a bent position, sitting in the wrong posture, etc. due to which a slipped disc may occur. As a result, pain starts in the lower part of the spine.

Due to injury

Chronic injury in the neck or spinal cord can lead to slipped disc problems in the future.

Lack of calcium and vitamins in the body

The body needs all kinds of nutritious substances because these substances make the body healthy. It also contains calcium and vitamins. Its main function is to strengthen the bones but if a person does not consume calcium and vitamin-rich elements, then in this condition he starts feeling weak and starts to bulge because of which a person may have to face the problem of slipped disc.

Symptoms of Slipped disc

Slipped discs mainly cause pain in the areas around the shoulders and neck. Apart from this, some other symptoms of a slipped disc are as follows-

  • Weakness or tingling in the hands and feet.
  • Difficulty in walking due to lack of coordination.
  • Feeling pain while travelling some distance.
  • Pain spreading to arms or legs.
  • Sharp pain in a specific part of the body.
  • Unbearable pain in the lower back.
  • Feeling of pain often while getting up and sitting anywhere.
  • Trouble walking or exercising.
  • Tingling or burning in the affected area.
  • Difficulty urinating and passing stools as problems progress.
  • Numbness around the hip or thigh when pressure is applied to the middle of the spinal cord.

Prevention methods of Slipped disc

  • Maintain body weight so that the pressure on the lower back of the person is reduced.
  • Walk and exercise regularly every day.
  • Use correct technique for lifting weights.
  • Avoid wearing shoes and sandals with high heels.
  • Avoid the use of tobacco and smoking.
  • Read a book, sit, watch television and sleep in the correct posture.
  • Maintain proper body posture while using the computer and mobile phone.
  • Do not stand or sit in the same posture for long hours.
  • Keep your neck, shoulders and hips straight while walking or standing.
  • While sitting on the chair, make a round pillow or towel. Doing so does not damage the disc.

Tests for Slipped disc

To check for a slipped disc, doctors recommend getting an X-ray done. With the help of X-ray, all types of wear and tear of discs in the body can be detected. If not certain with X-rays, the doctor may order other tests, such as a CT scan, MRI, and myelography (via an injection into the spinal cord canal). This shows the status of the slipped disc.

Slipped disc patients mostly get relief with rest and physiotherapy. For this, the person should take complete rest for at least 2-3 weeks. If the pain does not subside, take pain-relieving medicines as per the doctor's advice. For this, muscle relaxants or sometimes steroids are also given. In this problem, physiotherapy is also done only after the pain subsides

Home remedies for Slipped disc

Garlic

Heat at least 4 to 5 cloves of garlic in mustard oil. After cooling down a bit, massage the back and waist with this oil. Massaging the spine with the thumb with light hands helps to relieve pain.

Cloves & peppercorns

Make a powder by grinding five cloves and five black peppercorns. Now prepare a mixture by mixing some ginger powder. Now make a decoction from this mixture and drink it twice a day. By doing this, the problem of slipped discs gets relieved.

Cinnamon

Cinnamon also proves to be effective in relieving slipped discs. For this, take 2 grams of cinnamon powder mixed with one spoon of honey.

Camphor and asafoetida

If there is a slipped disc, take equal quantities of camphor and asafoetida and make a paste by beating it in mustard oil. Now massage this mixture on the affected parts of the neck or body with light hands. By doing this, the pain gets relieved.

Hot compress

Compressing with warm water provides great relief from any kind of pain. It also improves blood circulation. Apart from this, taking a shower with hot water is also beneficial in back and neck pain.

Ice packs

Ice packs help in many types of pain. Therefore, applying an ice pack on the affected part provides great relief. Along with this, it also eliminates swelling.

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Nasal Polyps: Symptoms, Causes and Treatment

Posted 17 June, 2022

Nasal Polyps: Symptoms, Causes and Treatment

Nasal polyps are soft, fleshy lumps that grow inside your nose and these are non-cancerous protrudes. They can be yellowish, gray or pink in color and can vary widely in size. There may be only one, but sometimes several growths like a little bunch of grapes on a stem.

Nasal polyps can grow anywhere in the membrane of the nose or sinuses. They often spread where the sinuses open into the nasal cavity. Small polyps may not be a problem. Large polyps can block the sinuses or nasal airways leading to further complications and life threatening situations.

Types of Nasal Polyps

There are two types of nasal polyps-

Ethmoidal polyps-Ethmoidal polyps are the most common type which develop from the ethmoidal sinuses and are located between the nose and eyes.

Antrochoanal polyps-Antrochoanal polyps are less common. These develop in the maxillary sinuses, which are above the teeth and under the cheeks and nose.

Symptoms of Nasal Polyps

Nasal polyps are often soft and painless. You might have them and not even notice until they start growing and blocking your nasal passages. Following symptoms appear as these polyps start growing-

  • Chronic nasal congestion
  • Reduced sense of smell
  • Snoring
  • Sneezing
  • Sleep apnea
  • Severe headache
  • Facial pain
  • Itching around the eyes
  • Postnasal drip

Causes of Nasal Polyps

People who have following conditions are more likely to develop nasal polyps-

  • Chronic Sinus Infections
  • Asthma
  • Allergic Rhinitis
  • Sensitivity to certain medicines like Ibuprofen and Aspirin
  • Cystic Fibrosis
  • Churg-Strauss Syndrome (a disorder that causes inflammation in the blood vessels)

How to prevent Nasal Polyps?

Reducing the risk of nasal polyps is especially important if you have asthma or allergies. Follow your treatment plan and talk to your doctor if that doesn't help control your symptoms. Anyone can take these simple steps to reduce the risk-

  • Stay away from nasal irritants such as dust, cigarette smoke, and chemical fumes.
  • Wash your hands regularly.
  • Avoid foods or drinks that can irritate your sinuses, such as certain dairy products and alcoholic beverages.
  • Rinse your nasal passages regularly with an over-the-counter saline spray.

Diagnosis for Nasal Polyps

Diagnostic tests include-

Nasal Endoscopy-A narrow tube with a magnifying lens or tiny camera (nasal endoscope) allows your doctor to carefully examine your nostrils and sinuses.

Scanning- A computed tomography (CT) scan can help your doctor determine the size and location of polyps in the deeper areas of the sinuses and assess the extent of swelling and inflammation.

Blood test-Your doctor can test your blood for low levels of vitamin D, which are linked to nasal polyps.

Allergy tests-Your doctor may suggest a skin test to determine if allergies are contributing to chronic inflammation. In a skin prick test, small drops of an allergy causing agents (allergens) are injected into the skin of the forearm or upper back. Your doctor or nurse will then examine your skin for signs of an allergic reaction.

Treatment for Nasal Polyps

Anyone suffering from nasal polyps should consult a doctor and go for treatment with medicines before considering surgery -

  • Steroid nose drops-

Steroid nose drops are the most recommended treatment for nasal polyps.

Nose drops contain steroid medications which reduce inflammation in the nose. Gradually, nasal congestion reduces and the polyps start to shrink. It may take a week or two for the nose drops to make a noticeable difference in your symptoms. You may be recommended to use it for at least 4-6 weeks.

Betamethasone or fluticasone are two steroid nasal drops that are only available by prescription.

  • Steroid tablets-

A course of steroid tablets (prednisolone) for about a week is sometimes prescribed to reduce inflammation in the nose. This often works very well to shrink polyps. This treatment is a short-term solution because long-term use of steroid tablets can have significant side effects. It should be used in combination with topical steroid drops or nasal sprays.

  • Surgery-

Surgery may be recommended if the polyp is large or if steroid nose drops or tablets don't work.

Polypectomy-In polypectomy, polyps are removed surgically. This can be done through the nostrils or under general anesthesia. The type of anesthesia may depend on the number and size of the polyps, where they are located and how suitable you are for surgery.

Endoscopic sinus surgery-This type of surgery is performed under general anesthesia. This may be done if the polyps are very large and numerous or if they severely block your sinuses. Endoscopy allows the surgeon to view the sinuses with a camera and perform operations in places that are difficult to reach with ordinary surgical instruments.

Home Remedies to treat Nose Polyps

Capsaicin-

Capsaicin is a compound found in chili peppers. Cayenne pepper contains high concentrations of capsaicin. These compounds are known to reduce pain and discomfort. It helps clear the sinuses and when used in the nasal cavity, it helps reduce the size of nasal polyps.

For this-Use nasal sprays containing capsaicin are commercially available that can help relieve the symptoms of nasal polyps.

Turmeric-

Turmeric has strong anti-inflammatory and antiseptic properties (the ability to stop or slow down the growth of pathogenic microorganisms).

It helps to treat symptoms of nasal polyps that cause discomfort such as itching and nasal congestion.

For this-Take a spoonful of turmeric powder, mix it in a glass of warm milk and drink it once or twice a day.

Saline nasal irrigation-

Rinsing your sinuses with sterile saline solution helps relieve symptoms of nasal polyps.

You can use the neti pot, specially designed nasal irrigation pot, to flush your nasal cavities and sinuses. It helps clean the dust and other irritants from the nasal cavity.

For this- Use warm water to fill your neti pot and mix 1 to 2 teaspoons of salt in it. Tilt your head and inhale the solution through one nostril and exhale from the other, repeating the same thing from the other side. You can blow your nostrils afterwards to get the solution out.

Tea tree oil-

Tea tree oil has anti-inflammatory properties that help reduce inflammation and swelling of the sinuses.

It is easily available in the market. This oil can cause allergies in some, so make sure you do a patch test before applying it to the nostrils.

Steam inhalation-

Inhaling steam can help reduce swelling in the airways and also helps in thinning the mucus.

For this-You can boil water in a bowl and gently place your face on it. Cover your head with a towel to take steam properly.

When to see a doctor?

Consult your doctor if the symptoms of nasal polyps last more than 10 days.

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Why do Gums bleed? Know its Causes, Symptoms and Home remedies

Posted 04 January, 2022

Why do Gums bleed? Know its Causes, Symptoms and Home remedies

Bleeding gums are the most common signs of gum disease which also indicates many other health problems. Sometimes bleeding gums can also be caused by sharp brushing or wearing dentures that don't fit properly. Apart from this, frequent bleeding gums can also be due to many serious underlying conditions which include periodontitis: an advanced form of gum disease, vitamin deficiency, platelet deficiency, hormonal changes during pregnancy, etc. However, a little bleeding in the gums is not a big deal but if a person's gums are bleeding continuously or excessively, then it should not be ignored at all.

 

Symptoms of Bleeding gums

  • Swelling of gums
  • Pain in the mouth and gums
  • Dark red or reddish-purple gums
  • Pain in the gums only on touching
  • Gapping between gums and teeth
  • Bad taste in the mouth
  • Loss of teeth etc.

Causes of Bleeding gums

Vitamin C deficiency-

 

When a person's diet does not include enough fruits and vegetables, then there is a deficiency of Vitamin-C in his body. These cause pain and swelling in the gums due to which the gums start bleeding.

 

Liver diseases-

 

Any type of liver disease and disease caused by alcohol obstructs the functions of the liver which leads to gum bleeding.

 

Cancer-

 

Some types of cancer such as leukemia or bone marrow cancer can also cause bleeding gums.

 

Vitamin K deficiency-

 

Vitamin K is an important element for the clotting process in the body. Therefore,  due to deficiency of Vitamin K in the body, there is an increased tendency of bleeding in any part of the body including the gums.

 

Hormonal changes in women-

 

This usually happens during pregnancy. It starts in the second or third month of pregnancy and lasts till the eighth month. Due to this there is pain, swelling and bleeding of gums. Some birth control products taken by mouth can also cause bleeding gums.

 

Poor oral hygiene-

 

When the gums are swollen, they bleed and this is what happens when people are unable to keep their teeth clean. This causes problems in the gums and they become red. As a result, swelling and pain occur due to which the gums start bleeding.

 

Crooked teeth-

 

It is very difficult to clean crooked teeth because food gets stuck between them. This causes the gums to swell and bleed.

 

Gum injury-

 

It occurs by brushing with more pressure, using a brush with more rigid hair or by rubbing the gums more vigorously than with a datun (datun of neem etc.) which leads to gum injury.

 

Medicines-

 

Certain medicines, including those given for heart attack and stroke (aspirin), epilepsy, cancer and chemotherapy can cause bleeding gums.

 

Measures to prevent Bleeding gums

  • Regularly get your gums tested by a dentist
  • Change the toothbrush in every 3 months
  • Take a balanced diet
  • Drink plenty of water
  • Be aware of overly hot or cold foods and beverages
  • Do not consume tobacco products

Home remedies for Bleeding gums

Coconut oil-

 

Coconut oil has anti-inflammatory properties which relieves the problem of swelling and bleeding of gums. The anti-microbial properties present in this oil keep the teeth clean. To use it, keep swirling coconut oil in your mouth for 10 to 15 minutes. Do this atleast once a day.

 

Clove oil-

 

Clove oil is rich in anti-bacterial properties which prove to be extremely beneficial for bleeding gums. For this, take a few drops of clove oil and heat it a little. Apply this warm clove oil on the gums twice a day. Leave it on the gums for about 5-10 minutes and then wash it off with lukewarm water.

 

Salt water-

 

Regular use of salt water is one of the effective home remedies for bleeding gums because it has anti-inflammatory and antiseptic properties which are useful in reducing inflammation and infection in the gums. For use, mix a little amount of salt with some warm water and rinse the mouth with it. Do this about 2-3 times a day for better results.

 

Vitamin-

 

One of the reasons for bleeding gums is the lack of vitamins in the body. Therefore it can be prevented by consuming the right dosage of vitamins. For this, consume food which is rich in vitamin C and vitamin-K. Consumption of lemon, gooseberry, orange, carrot can be beneficial.

 

Honey-

 

Honey possesses antibacterial properties to fight bacterial infections like swollen and bleeding gums. It also has anti-inflammatory properties that reduce gum inflammation. Therefore, take a little honey and then massage the gums lightly. Do this at least twice a day.

 

When to go to the doctor?

One should see a doctor in the following cases-

 
  • In case of prolonged and severe bleeding gums.
  • If bleeding doesn’t stop even after treatment.
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Causes, Symptoms and Home remedies for Runny Nose

Posted 17 March, 2022

Causes, Symptoms and Home remedies for Runny Nose

Sudden change in weather leads to many problems which include colds, flu, runny nose, etc. Runny nose is a common problem, but people face a lot of problems due to this. People suffering from this problem face an increase in the amount of mucus in the sinus i.e, airways. The main reason for which is the entry of cold or flu viruses, bacteria or allergy-causing substances into the body.

 

The problem of runny nose is medically known as Rhinorrhea or Rhinitis. This is a problem in which mucus (fluid) starts coming out of the nose. This fluid can be both thin or thick. Sometimes this mucus goes inside the throat, then it causes sore throat, pain, burning and cough. Generally, the problem of a runny nose automatically gets cured in two to three days. Apart from this, it can be cured with the help of some home remedies but frequent runny nose indicates internal problems of the body. Therefore, without ignoring it, one should immediately contact the doctor.

 

Symptoms of Runny nose

Along with runny nose, some other symptoms also appear, which are as follows:

 
  • Fever
  • To get cold
  • Yellowish or foul-smelling mucus discharge from the nose
  • Shortness of breath
  • Chest tightness or pain
  • Swelling under the eyes or around the cheeks
  • Tonsils
  • Sore throat or pain

Causes of Runny nose

Following are some common causes of runny nose:

 

Cold or flu-

A runny nose caused by a cold or flu is a common symptom. This results in a thin and clear flow but in some circumstances, instead of coming out through the nose, the mucus starts going into the throat. This mucus is thick.

 

Allergies-

Due to allergies, a person also starts having a runny nose. This happens through contact with domestic animals or animals through which harmful bacteria enter the body due to which the person feels allergic, leading to a runny nose.

 

Sinusitis-

Sinus tissue i.e., mucous membrane begins to swell. This condition is called sinusitis. This inflammation is caused by an infection. This causes the nasal airways to narrow due to which it becomes difficult to breathe and mucus starts to form. Usually the mucus produced due to sinusitis is thick in which yellow and green spots are also visible.

 

Other possible causes of runny nose are-

  • Virus, fungus and bacterial infection
  • Having a polluted environment
  • Exposure to chemical fumes and dust
  • Enlargement of the nasal bone
  • Headache
  • Side effects of medicines
  • Cold weather or sudden changes in temperature
  • Dry air
  • Hormonal changes in the body
  • Injury to the nose
  • Tobacco, smoking, alcohol and drug use
  • Consuming more spicy food
  • Tumor (cancer) in the airways
  • Suffering from asthma, bronchitis

Prevention of Runny nose

  • Wash hands thoroughly before eating
  • Wash hands thoroughly after sneezing, coughing or blowing your nose
  • Use a tissue paper or handkerchief when blowing your nose
  • Avoid going into an infected and polluted environment
  • Include vitamin-C rich foods in your diet
  • Drink lukewarm water
  • Drink or gargle with warm water containing salt

Home remedies for Runny nose

Peppermint essential oil-

Using peppermint essential oil as aromatherapy is beneficial for a runny nose as menthol is found in it, which helps in improving breathing ability and destroying bacteria. For this, put 2 to 3 drops of peppermint essential oil in a diffuser and smell its fragrance. By doing this the mucus becomes thinner and it is easier to remove it from the body. It also provides relief from inflammation caused by sinus. Apart from this, taking a few drops of it in your hands and massaging the nose and head with light hands is also beneficial.

 

Take facial steam-

Taking facial steam is an effective remedy for a runny nose. For this, put a teaspoon of salt in hot water. Now cover your head with a towel and inhale the steam. Doing this 3 to 4 times a day gets rid of the problem of a runny nose.

 

Tea and herbal tea-

Tea or herbal tea containing honey is one of the good home remedies for the prevention of a runny nose because it helps in reducing the symptoms of allergies and sinus. Therefore, this tea proves to be effective in case of a runny nose.

 

Tea tree oil-

Tea tree oil has antiseptic, anti-microbial and anti-inflammatory properties which removes the problem of runny nose and headache due to allergies. For this, put 4 to 5 drops of tea tree oil in hot water and take steam. Doing this two to three times a day gives relief.

 

Red chilli-

Cayenne pepper exhibits antihistamine properties which help to remove mucus from the body and reduce the symptoms of allergies due to which the toxins are easily removed from the body. By doing this, the blood circulation in the body increases which provides warmth to the body and the problem of a runny nose goes away. Therefore, to get rid of it, use red chili in your food.

 

Garlic-

Garlic has antibacterial properties which help to relieve the symptoms of runny nose. For this, keeping 2 to 3 buds of garlic between your teeth and sucking its juice is beneficial. Apart from this, grind 4 to 5 cloves of garlic and put it in hot water and make soup. Drink this soup when it is lukewarm. This gives relief from the problem of a runny nose.

 

Nilgiri oil-

The antiviral and anti-microbial properties present in eucalyptus oil cure the symptoms of cold. To get rid of it, smell a few drops of eucalyptus oil in a handkerchief. By doing this, cold and runny nose is relieved.

 

Honey and lemon are beneficial-

Consumption of honey and lemon acts as a medicine for the problem of allergies and runny nose because the antimicrobial properties present in honey and vitamin C present in lemon are helpful in destroying germs. Along with this, the mucus is easily removed from the body. Apart from this, honey also removes swelling of the nasal canal. For this, drink honey and lemon juice mixed with lukewarm water.

 

Turmeric and Ajwain-

Turmeric and Ajwain are effective in the problem of runny nose. For this, cook ten grams of turmeric and carom seeds in a cup of water. When the water reduces to half, add some jaggery to it and consume it.

 

Fenugreek seeds-

Fenugreek seeds are also effective in treating runny nose. For this, boil fenugreek seeds in water. After that filter that mixture and drink it like tea two to three times a day. Doing this regularly gets rid of this problem.

 

Black pepper-

Consuming the powder of black pepper with honey provides relief in cold and flu.. Apart from this, drinking half teaspoon black pepper powder and one teaspoon sugar candy mixed in a glass of warm milk is beneficial.

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Snoring- Causes, Symptoms and Home remedies

Posted 17 March, 2022

Snoring- Causes, Symptoms and Home remedies

Snoring while sleeping is a common problem that is accompanied by loud noises and vibrations with breath while sleeping. This is a sleep-related problem. The sound of snoring can come from either the nose or the mouth. This sound starts and stops at any time after sleeping. Snoring, in reality, is a kind of sound that is produced when a person is unable to breathe freely through his nose and throat during sleep. When the flow of air causes vibrations in the tissues located in the skin of the throat, the snoring starts which is why people who often snore a lot are believed to have a lot of vibration in the tissues of their throat and nose. Snoring can lead to many other problems that include shortness of breath during sleep, excessive sleepiness during the day, difficulty concentrating, morning headache, sore throat upon waking, restlessness in sleep, gasping at night, and increased blood pressure.
 
Symptoms of Snoring
Breathe in and out with a loud sound.
At times, breathing stops for a few seconds.
Gradual increase in the rate and time of breathing.
Waking up in confusion when there is no breath while falling asleep.
Being lethargic and laziness throughout the day.
Feeling sleepy throughout the day even after getting enough sleep.
Feeling tired
Reasons for snoring
There are many reasons for snoring, the main reasons are as follows:-
 
Obesity
Snoring also occurs due to weight gain. When a person's weight increases, more meat hangs on his neck. While lying down, due to this flesh, the windpipe gets clogged, and breathing becomes difficult.
 
Excessive alcohol consumption
Like many pain-relieving drugs, alcohol also reduces the tension in the muscles of the body. Sometimes the muscles of the throat get stretched due to the consumption of too much alcohol which can cause snoring.
 
Sinus
One reason for snoring is sinusitis. The nasal passages get clogged due to the enlargement of the sinus. Not only this but increasing the sound of snoring also affects the nasal passages. In such a situation, the patient with sinus needs to take special precautions.
 
Winter
If you have a blocked nose for a long time, see a doctor because sleeping pills, anti-allergic medicines also make the muscles of the respiratory tract sluggish which results in snoring.
 
Other causes of snoring
The shortening of the lower jaw is also the reason for snoring. When a person's jaw is smaller than normal, his tongue turns backwards when he lies down which blocks the windpipe. In such a situation, pressure has to be applied to inhale and exhale. This causes vibration and snoring.
Snoring occurs even if there is Vata and Kapha dosha.
This disease is also genetic which passes from one person to another.
Nasal airway obstruction: Nasal deformities such as a curvature of the septum (the wall that divides the nasal passages) or small particles inside the nose can also cause airway obstruction. Apart from this, some people start snoring in the winters.
Even if the person's neck is too short, the sound comes with the breath while sleeping.
Problems caused by snoring
Daytime sleepiness.
Not being able to concentrate on anything.
Fall asleep anytime.
Suffering from high blood pressure.
Having heart disease.
Increased risk of heart stroke.
Home remedies to stop snoring
Peppermint Oil
Peppermint oil is a beneficial remedy to stop snoring. Take two to three drops of this oil in the palm daily and inhale it. Apart from this, taking a few drops of this oil in hot water and taking steam also opens the blocked nose due to which the problem of snoring is reduced.
 
Vitamin C rich food
Snoring is also possible due to low immunity. In this case, eat fruits and vegetables rich in vitamin C.
 
Fenugreek Powder
Fenugreek has antioxidant and antiviral properties which are helpful in curing snoring. It is believed that snoring also occurs due to not having a strong digestive system. In such a situation, drinking half a teaspoon of fenugreek powder with lukewarm water before sleeping at night provides relief from snoring.
 
Cardamom powder
Cardamom, which is rich in Ayurvedic properties, has also been considered right in the treatment of snoring. According to Ayurveda experts, cardamom powder with lukewarm water should be consumed before sleeping. This stops the snoring sound.
 
Turmeric
Turmeric has antiseptic and antibiotic properties which clear the nostrils and makes breathing easier. For this, drink turmeric cooked in milk every night before sleeping.
 
Steam
Every night, heat water in a bowl and add tea tree oil to it. After this, try to inhale the steam by taking deep breaths for 10 minutes. This removes nasal congestion and makes breathing easier.
 
How can snoring be stopped?
Maintain a sleeping schedule.
Before going to bed, clean your nose thoroughly.
Take the right measures to prevent a runny nose.
Avoid alcohol before sleeping.
Do not eat food before going to bed, eat it one or two hours before.
Sleep on a pillow with your head elevated for about 4 inches.
When to go to the doctor?
When you are suffering from the following problems due to snoring, you should see a doctor-
 
When you are sad.
When there is irritable behaviour.
Lack of concentration.
When there is lethargy even during the day.
When breathing stops during sleep.
If the problem of snoring increases.
When you feel tired after waking up in the morning.
Headache when you wake up in the morning.
When you are short of breath while sleeping or you are drenched with sweat after waking up.
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Symptoms, Causes and Prevention of Nose Bleeding

Posted 20 December, 2021

Symptoms, Causes and Prevention of Nose Bleeding

The problem of bleeding from the nose is called Nose Bleeding. This problem is usually not a major problem but sometimes can also be a sign of a serious illness. The problem of bleeding from the nose is due to many reasons like- respiratory problems, allergies, colds and not cleaning the nose carefully.

 

Why does the Nose Bleed?

There are many types of blood vessels in the nose. These blood vessels are very soft and covered with thin membranes which sometimes also breaks the nose while cleaning. Due to this, blood starts coming from the nose. This problem is mostly seen in children between 3 and 10 years old.

 

Types of Nose Bleeding

There are two types of nose bleeding which are classified based on the place of bleeding-

 

Anterior-

 

This is the most common type of nose bleeding in which the nose bleeds from the front part. During this time blood vessels inside the nose rupture due to which blood comes out from the nose. These blood vessels are known as Kiesselbach’s plexus.

 

Posterior-

 

In this, blood comes out from the back of the nose. This is the bleeding caused by the disease. This affects the inner nostrils of the nose and the nerves connecting with the brain. This problem is mostly seen in the elderly. This causes severe bleeding from the nose.

 

Symptoms of Nose Bleeding

  • Bleeding from one or both nostrils (nose hole).
  • Experience of fluid flow from the back of the throat.
  • Feeling like repeated swallowing.
  • Difficulty in breathing.
  • Irregular heartbeat.

Causes of Nose Bleeding

There are two common causes of bleeding from the nose which are as follows-

 

Dry air-

 

Dry air is the main cause of nose bleeding. Due to the excess heat, blood vessels get dilated because of which the nasal membranes become dry due to hot air, they become very susceptible to blood flow and infection.

 

Nose Picking-

 

Repeated nose picking, and putting things like pen, pencil, etc. in the nose is the main reason of nose bleeding in children. Due to this, the delicate blood vessels of the nose get hurt and the bleeding starts. Apart from this, persistent nose bleeding in children can also be a sign of haemophilia.

 

Reasons for Nose bleeding

  • Drying and cracking of the skin inside the nose in hot air or dry climate.
  • Nasal irritation due to problems like cold, sneeze and sinus.
  • Nose allergy or frequent runny nose.
  • Having high blood pressure.
  • Cleaning the nose with strength.
  • Nose of an insect or object.
  • Nose injuries.
  • Sinus or pituitary tumour surgery.
  • Divine septum disease.
  • Vitamin-K deficiency.
  • Consumption of blood thinners such as warfarin and heparin.
  • Excessive use of nasal sprays.
  • Oxygen treatment with Nasal Cannulas.

Rare Causes of Nose bleeding

  • Excessive alcohol consumption.
  • Consumption of cocaine or opium.
  • Liver disease.
  • Increased nasal flesh.
  • Blood Cancer.
  • Tumor in the nose.

Prevention of Nose Bleeding

  • If itching in the nose, do not put a sharp pencil like a pencil in the nose.
  • Keep hand nails short.
  • Do not use nasal spray too much.
  • Do wear protective items during the game. Which can protect the nose, ears and head.
  • Avoid smoking. This may cause dryness in the skin of the nose.
  • To reduce the dryness of the nose, stay hydrated and consume sufficient amount of fluid.
  • Stay away from heat when bleeding from the nose. Reduction in dry heat can reduce the risk of hemorrhage.
  • For any other reason like liver disease, chronic sinus, consult the doctor if bleeding from the nose.

Home remedies for Nose Bleeding

  • After bleeding from the nose, sit at one place for some time.
  • Now bend yourself slightly towards the front. So that the blood does not go to the throat.
  • Now try placing a cool and wet cloth on your nose. So that blood flow can stop due to contraction in the blood vessels.
  • If blood comes out from one nostril, press and hold the upper part of the nostril for at least 10 minutes. By doing this the blood will stop.
  • In addition, onion juice should be used to stop nose bleeding.
  • Smelling of onion also stops nose blood.
  • Blood is stopped by pouring basil juice at the place where it comes out.
  • The problem of nose bleeding is relieved by heating one or two drops in the nostrils after heating the cow's native ghee and cooling it.
  • The problem of nose bleeding is also cured by lukewarm mustard oil in the nose.
  • Applying 2-3 drops of lavender oil in cotton on the affected area stops nose blood.

When to go to the Doctor?

  • In case of frequent nose bleeding problems.
  • In case of vomiting of blood with nose bleeding.
  • Dizziness or nose bleeding with nose bleeding.
  • Bleeding from the nose after taking any medicine.
  • Rapid nose bleeding.
  • On nose bleed after chemotherapy.
  • Unable to prevent nose bleeding problem.
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नकसीर के लक्षण, कारण और बचाव

Posted 24 May, 2022

नकसीर के लक्षण, कारण और बचाव

नाक से खून बहने की समस्या को नकसीर (Nose Bleeding) कहा जाता है। यह समस्या आमतौर पर कोई बड़ी समस्या नहीं है। लेकिन कभी-कभी यह समस्या किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकती है। नाक से खून बहने की यह समस्या कई कारणों से होती है जैसे- सांस संबंधी समस्या, एलर्जी, सर्दी लगना और सावधानी से नाक की सफाई न करना आदि। 

 

क्यों आता है नाक से खून?

नाक में कई प्रकार की रक्‍त वाहिकाएं होती हैं। यह रक्त वाहिकाएं बहुत मुलायम और पतली झिल्ली से ढंकी होती हैं। जोकि कई बार नाक की सफाई करते वक्त फट भी जाती हैं। कारणवश नाक से खून आने लगता है। यह समस्या ज्यादातर 3 से 10 साल के बच्चों में देखने को मिलती है। 

 

नाक से खून आने के प्रकार;

नाक से खून बहने की समस्या दो प्रकार की होती है। जिसे खून बहने की जगह के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। 

 

एंटीरियर (Anterior)-

 

यह नाक से खून बहने का सबसे सामान्य प्रकार है। इसमें नाक के अगले हिस्से से खून बहता है। इस दौरान नाक के अंदर की रक्त वाहिनियां (Blood Vessels) फट जाती हैं। जिसके कारण नाक से खून निकलता है। इन रक्त वाहिनियां को किसेलबाक प्लेक्सस (Kiesselbach plexus) के नाम से जाना जाता है। 

 

पोस्टीरियर (Posterior)-

 

इसमें नाक के पिछले भाग से खून निकलता है। यह समस्या अधिकतर बुजुर्गो में देखने को मिलती है। यह बीमारी की वजह से होने वाली ब्लीडिंग होती है। इससे नाक की भीतरी और दिमाग से जुड़ने वाली नसें प्रभावित होती हैं। इस वजह से नाक से तेज खून बहता है। 

 

नकसीर के लक्षण;

  • एक या दोनों नथुनों (नाक के सुराख) से खून का आना।
  • गले के पिछले हिस्से में तरल पदार्थ बहने का अनुभव होना।
  • बार-बार निगलने जैसा महसूस होना।
  • सांस लेने में दिक्कतें होना। 
  • दिल का अनियमित धड़कना। 

नकसीर के कारण;

नाक से खून आने के दो सामान्य कारण होते हैं। जोकि निम्नलिखित हैं;

 

शुष्क हवा-

 

शुष्क हवा नकसीर का प्रमुख कारण है। अधिक गर्मी के कारण खून की नालियां (रक्‍त वाहिकाएं) फैल जाती हैं। क्योंकि गर्म हवा से नाक की झिल्‍ली शुष्क होकर खून के बहाव और संक्रमण के प्रति अति संवेदनशील हो जाती हैं। 

 

नाक में उंगली करना-

 

नाक में बार-बार उंगली करना, पेन, पेंसिल आदि चीजों से खुजली करना बच्‍चों में नाक से खून आने का सबसे प्रमुख कारण है। क्योंकि ऐसा करने से नात की नाजुक रक्त वाहिकाओं में चोट लग जाती है और रक्त स्राव होने लगता है। इसके अतिरिक्त बच्‍चों में लगातार नकसीर की समस्‍या का होना हीमोफीलिया का संकेत भी हो सकता है। 

 

नाक से खून आने के कारण;

  • गर्म हवा या शुष्क जलवायु में नाक के अंदर की त्वचा का सूखना और फटना।  
  • सर्दी, छींक और साइनस (Sinus) जैसी समस्या के वजह से नाक में होने वाली जलन।    
  • नाक में एलर्जी होना या बार बार नाक बहना। 
  • उच्च रक्तचाप होना। 
  • ताकत के साथ नाक की सफाई करना।
  • किसी कीड़े या वस्तु का नाक में चले जाना।
  • नाक में चोट लगना। 
  • साइनस या पिट्यूटरी ट्यूमर सर्जरी। 
  • डिविएट सेप्टम बीमारी का होना।। 
  • विटामिन-के की कमी होना। 
  • खून को पतला करने वाली दवाएं जैसे वार्फरिन (Warfarin) और हिपेरिन(Heparin) का सेवन करना। 
  • नाक के लिए दवा की तरह इस्तेमाल होने वाले स्प्रे का अधिक प्रयोग करना। 
  • नेसल कन्नुला (Nasal Cannulas) से ऑक्सीजन ट्रीटमेंट करना। 

नाक से खून आने के दुर्लभ कारण;

 
  • शराब का अत्यधिक सेवन करना। 
  • कोकीन या अफीम का सेवन का करना।
  • जिगर (liver) की बीमारी होना।। 
  • नाक का मांस बढ़ना। 
  • ब्लड कैंसर। 
  • नाक में ट्यूमर होना। 

नकसीर के बचाव;

  • नाक में खुजली होने पर पेन, पेंसिल जैसी कोई नुकीली नाक में न डालें. 
  • हाथ के नाखूनों को छोटा रखें।
  • नेजल स्प्रे का ज्यादा प्रयोग न करें। 
  • खेल के दौरान सुरक्षात्मक वस्तुओं को जरूर पहनें। जिससे नाक, कान और सिर का बचाव हो सके। 
  • धूम्रपान से बचें। इससे नाक की त्वचा में रूखापन हो सकता है। 
  • नाक के सूखेपन को कम करने के लिए हाइड्रेटेड रहने और पर्याप्‍त मात्रा में तरल पदार्थ का सेवन करें। 
  • नाक से खून आने पर गर्मी से दूर रहें। ड्राई हीट कम होने से नकसीर की आशंका को कम किया जा सकता है। 
  • किसी अन्य वजह जैसे लीवर रोग, पुरानी साइनस होने के कारण नाक से खून आने पर चिकित्सक से सलाह ले। 

नकसीर के प्राथमिक और घरेलू उपचार;

  • नाक से खून आने पर कुछ समय के लिए एक स्थान पर रुक कर बैठ जाएं। 
  • अब खुद को सामने की तरफ थोड़ा झुकाएं। ताकि खून गले में न जाए। 
  • अब नाक पर ठंडा और गीला कपड़ा रखकर देखें। ताकि रक्त नालिकाओं में संकुचन होकर खून का बहना रुक सके। 
  • यदि एक नथुने से खून निकले तो नथुने के ऊपरी भाग को कम से कम 10 मिनट तक दबाकर रखें। ऐसा करने से खून बंद हो जायेगा। 
  • इसके अलावा नाक के खून को बंद करने के लिए प्याज के रस का इस्तेमाल करें। 
  • प्याज को सूंघने से भी नाक का खून बंद हो जाता है।
  • तुलसी के रस को खून निकलने वाली जगह पर डालने से खून बंद होता है। 
  • नकसीर की समस्या में गाय के देशी घी को गर्म करके ठंडा होने पर नथुनों में एक या दो बूंद डालने से राहत मिलती है। 
  • सरसों के तेल को गुनगुना करके नाक में डालने से भी नकसीर की समस्या ठीक होती है। 
  • लैवेंडर के तेल की 2-3 बूंद को रुई में भिगोंकर प्रभावित जगह पर लगाने से नाक का खून बंद हो जाता है। 

कब जाएं डॉक्टर के पास? 

  • बार-बार नकसीर की समस्या होने पर।
  • नकसीर के साथ खून की उल्टी होने पर।
  • नकसीर के साथ चक्कर आने या सर घूमने पर। 
  • किसी दवा के सेवन करने के बाद नाक से खून आने प।र 
  • तेज गति से नाक से खून आने पर। 
  • कीमोथेरेपी के बाद नाक से खून पर। 
  • नकसीर की समस्या को रोकने में असमर्थ होने पर।
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Nutrition

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Interesting facts about Quinoa

Posted 30 June, 2022

Interesting facts about Quinoa

Quinoa is basically a seed, not a grain and known as a pseudo cereal. It belongs to the goosefoot family and is becoming popular all over the world. Although it must be imported, it is increasingly being used in the United States, Canada, Europe, and China.

Due to the numerous health benefits, this pseudo cereal is gaining rapid popularity as it is a great source of plant protein and fiber. Let us see the important nutrients found in quinoa in the next section.

Important nutrients in Quinoa

Quinoa seeds are packed with various vitamins and minerals such as-

  • B vitamins, namely B-1 (thiamine), B-6 (pyridoxine) and B-9 (aka folate). Folate is important for the formation of red blood cells and for healthy cell growth and function, especially during early pregnancy.
  • Thiamine helps convert carbohydrates into energy and plays a key role in nerve, muscle, and heart functioning.
  • Pyridoxine is important for normal brain development and for keeping the nervous and immune system healthy.
  • Iron is important for growth and development. It is also used in the production of hemoglobin, which helps carry oxygen from the lungs to all parts of the body.
  • Calcium is used primarily to build and maintain healthy bones. It is also used to support proper functioning of the heart, muscles and nerves.
  • Magnesium supports muscle and nerve function and energy production.
  • Phosphorus helps in the formation of bones and teeth and in the growth, maintenance and repair of cells and tissues.
  • Potassium helps nerve function, movement of nutrients within cells and waste products from cells, regulation of heart rate and muscle contraction.
  • Vitamin E supports your immune system and promotes cell regeneration.
  • Quinoa is rich in protein, having 14.1 grams of protein. Other protein-rich plant sources include buckwheat, couscous, oatmeal, brown rice, and spinach. Protein aids in weight loss and maintenance, muscle building and reduction in muscle loss. It increases metabolism and lowers blood pressure, among many other health benefits.

There are also traces of zinc, manganese, copper and selenium which helps the body function at its best.

Benefits of Quinoa

  1. Acts as a gluten-free diet: People on a gluten-free diet can safely consume quinoa. A study of celiac disease patients who consumed quinoa showed that quinoa has better nutrition than rice because it provides the necessary intake of protein, calcium, iron, and fiber.
  2. Prevents cancer: Quinoa is rich inantioxidants and is great for reducing cancer risk. Quinoa has three unique nutrients which helps to cause mutant cell death. The first of these nutrients, actually called ant nutrients, are saponins. The second active nutrient is lunasin, which is very effective because it only affects mutated cells and not healthy cells. Third one is an antioxidant called quercetin, which fights the buildup of free radicals in the body and controls the spread of lung cancer.
  3. Reduces bad cholesterol in the body: Quinoa has a positive effect on the body as it is known to reduce the adverse effects of fructose on glucose levels in the body which works to reduce the amount of bad cholesterol in the body.
  4. Prevents bone diseases: Quinoa contains antioxidant flavonoid called quercetin that has proven results to reduce cortisol levels, thereby protecting the bones.Regular consumption of quinoa can prevent the development of bone diseases such as osteoporosis. Quinoa increases bone density and maintains bone health.
  5. Reduces kidney stones: Quinoa is a gluten-free source of complete protein and is high in oxalates.It regulates the secretion of bile juice and prevents the accumulation of toxins in the body, thus, preventing the formation of gallstones and kidney stones.
  6. Treats diabetes: Quinoa is a rich source of dietary fibres and thus helps lower sugar levels.By lowering blood sugar levels, quinoa can be very beneficial for people with diabetes.

Side effects of Quinoa

  • Quinoa contains compounds known as saponins. When taken in large amounts, these saponins can affect the inner lining of the intestines and contribute to leaky gut syndrome.
  • It is recommended to consult a doctor before using quinoa during pregnancy.

Where is it found?

This plant is found in Andean region of South America, where it has been an important plant for thousands of years. Promoted for its health benefits, quinoa is now grown in a number of countries around the world including the United States, Canada, Italy, Sweden and India, but most are still grown in Peru and Bolivia.

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10 Amazing Benefits of Moong Dal That You Should Know

Posted 04 July, 2022

10 Amazing Benefits of Moong Dal That You Should Know

Moong dal or mugda is a commonly used pulse, also called green gram, It can be used as seeds and sprouts. Moong Dal is one of the favorite beans loved by Indians as it is packed with essential nutrients.

Importance of Moong Dal

Moong dal contains folic acid, niacin, pantothenic acid, riboflavin, thiamine, vitamin A, beta carotene, vitamin B12, vitamin B6, vitamin C, vitamin D, vitamin E, vitamin K. calcium, copper, iron, magnesium, manganese, phosphorus, potassium, selenium, sodium and zinc.

It has antioxidant, anti-inflammatory, anti-diabetic, anti-hyperlipidemic, anticancer, antimicrobial, anti-tumor, anti-mutagenic and antihypertensive properties which are useful in preventing and curing various diseases.

Benefits of Moong Dal

  • Helpful in reducing cholesterol and weight: Moong dal has hypocholesterolemia properties which are useful for lowering LDL (bad cholesterol levels) in the blood. In addition, fiber and protein are also found in moong dal which helps in weight loss by reducing appetite.
  • Useful in diabetes: Regular consumption of moong dal lowers blood sugar in patients with type 2 diabetes as it has antioxidant and antidiabetic properties which helps in reducing the amount of glucose in the blood.
  • Controls blood pressure: Due to the antihypertensive properties in moong dal, it relaxes the muscles of the heart and blood vessels. Adding this in your diet is very helpful in controlling blood pressure as it is rich in magnesium, potassium and fiber.
  • Helpful in heat stroke: The problem of heat stroke is usually observed during the summer. The main reasons are dehydration and overheating. Moong dal contains antioxidant properties that help in eliminating the risk of heat stroke. Drink moong dal soup in summer to reduce the chances of heat stroke.
  • Beneficial in pregnancy: Consuming moong dal during pregnancy is very helpful due to the presence of folic acid. It is considered to be necessary for the mother and baby during pregnancy as it reduces the chances of birth defects in the baby.
  • Improves digestion: Moong dal contains a good amount of fiber and protein and components such as trypsin inhibitors, hemagglutinins, tannins and phytic acid, which are very important for maintaining a healthy digestive system. These help in improving the digestive system by eliminating toxins present in the body.
  • Boosts immunity: Antioxidants found in moong dal are useful in fighting infection and provide protection against diseases by boosting the immune system.
  • Energy efficient: Including moong dal in a healthy breakfast is considered a good choice. The energy it provides to the body is enough to keep the body active throughout the day due to the presence of vitamin B, zinc, iron and magnesium.
  • Treats iron deficiency and anemia: Iron deficiency is considered the main cause of anemia (lack of red blood cells).Moong dal contains iron in abundance which is useful in treating iron deficiency in the body. Therefore, consuming moong dal also helps in eliminating the risk of anemia.
  • Beneficial for hair and skin: Moong dal contains antioxidants and vitamins A, C, E, D & B which are good for skin and hair.

Uses of Moong Dal

  • Moong dal is usually used to make soups and sprouts.
  • It is used to prepare delicious puddings or laddus.
  • In southern India, it is mainly used to make sambar and chutney.
  • Moong dal is also used as a face mask and hair mask.

Side effects of Moong Dal

  • Its consumption lowers high blood sugar because it has antidiabetic properties. Therefore, people with low blood sugar should avoid consumption.
  • It has antihypertensive properties which are useful in lowering high blood pressure. Therefore, its consumption is prohibited for people with low blood pressure.
  • Those with sensitive skin or allergies should avoid consuming moong dal.
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Why is wheat called the “King of Grains”?

Posted 20 May, 2022

Why is wheat called the “King of Grains”?

Wheat can grow in a wider variety of soils and climate than other grains and is also better suited for making bread and as a staple food. It is a common grain and is found in almost everything you eat like pastas, bagels, pastries, muffins and breads. Wheat is an essential part of almost every meal and is known as the king of grains.

Wheat is full of many nutrients that are good for your health. It contains catalytic elements, protein, vitamin E, vitamin B, mineral salts, copper, calcium, iodide, magnesium, zinc, potassium, manganese, sulphur, silicon, chlorine and arsenic, making it a great base for any diet. Its scientific name is Triticum aestivum vulgare.

Importance of Wheat in Ayurveda

Wheat remains an important food widely used in Ayurveda. It is highly recommended for vata and pitta species due to its nutritious properties, which provide more protein than rice and are better suited for colder climates or seasons. However, wheat should usually be avoided by aquatic species of kapha, which are prone to obesity and slow digestion.

Benefits of Wheat

  • Improves metabolism: A high intake of wheat lowers triglycerides, or fats, in the bloodstream. In addition, wheat shows benefits for insulin sensitivity and fat metabolism.
  • Controls obesity: Wheat contains dietary fibres therefore, regular consumption of whole grain like wheat can really help obese patients and lead to significant weight loss.
  • Prevents diabetes: Consuming wheat improves insulin sensitivity. In addition, whole grain fiber also promotes healthy blood sugar control by slowing the breakdown of starch in the small intestine and facilitating the rise of glucose in our bloodstream. Hence, wheat is useful in diabetes.
  • Improves heart health: Wheat and high-fiber foods have been shown to lower blood pressure, which reduces the chance of recurrent heart attacks.
  • Prevents breast cancer: A high-fiber diet is known to reduce the risk of breast cancer in women. Whole grains provide large amounts of fiber. Daily intake of 30g of wheat is enough for women to reduce the risk of breast cancer.
  • Improves digestion: Wheat helps soften stool and increase mass. It improves bowel regularity and reduces constipation, which contributes to better digestion.
  • Reduces gallstones: Excessive bile acids are the main cause of gallstones. Consuming wheat helps reduce gallstone formation.
  • Reduces inflammation: The bioactive compound in wheat that is responsible for reducing chronic inflammation is betanin content. Betanin reduces oxidative stress and inflammation.

Uses of Wheat

Wheat is used in a wide variety of foods that are consumed in daily life. One of the easiest ways to get wheat is to include bread in your diet.

You can use it to prepare delicious sandwiches. Another way to include it into your diet is to eat oats or corn flakes for breakfast. You can add some delicious fruit to the bowl to increase its nutritional value and taste. Wheat is used to produce animal feed&is also used to make beer.

Side effects of Wheat

  • People who are prone to allergic reactions are warned to avoid wheat as it can worsen the reaction. This can cause eczema, hives and skin rashes.
  • Wheat is also high in oxalates. Too much oxalate in your blood can cause many problems such as kidney stones, gallstones and gout.
  • Wheat can lead to non-celiac gluten sensitivity which can cause headaches, fatigue, and muscle pains.

Where is it cultivated?

China is the largest wheat producing country, followed by the United States, India and Russia. Kazakhstan and Canada also come in the list. In India, it is produced majorly in Punjab, Haryana, Uttar Pradesh, Madhya Pradesh & Rajasthan.

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Know about Saffron (Kesar): The Golden Spice

Posted 13 May, 2022

Know about Saffron (Kesar): The Golden Spice

Saffron, commonly known as Kesar,is a perennial plant belonging to the Iridaceae family. It comes from the Arabic word ‘zaffran’. Saffron is the golden coloured and sharp stigma of the autumn crocus, completely dried and used to flavour foods and other products. It has an exotic aroma with a bitter taste. Saffron is an expensive spice with an important culinary significance.

Saffron is a natural spice and flavouring ingredient for meals. Saffron adds a perfect aroma to a variety of cuisines around the world. For example, it is used in Spanish paella, Indian pulao, Iranian stews, seafood, and dessert recipes.

Nutritional Properties and Importance of Saffron (Kesar)

Saffron has a wide variety of nutritional values like Calcium, Iron, Potassium, Magnesium, Protein, Vitamin C, and Vitamin B6. Antioxidants like crocetin, crocin, safranal and kemperanol helps in reducing oxidative stress and providing a unique taste and aroma to the dishes.

In Ayurveda, saffron is useful for its healing properties. It is a best remedy to treat memory issues, inflammation, stomach disorders, and even depression. Saffron is also best for brightening, cleansing and restoring skin due to its therapeutic properties.

Benefits of using Saffron (Kesar)

Treats arthritis-

Crocetin and crocin found in saffron works as an anti-inflammatory agent which makes it easier to treat arthritis.

Improves digestion-

Saffron plays an important role in treating indigestion due to its radical scavenging and antioxidant effects. It also cures ulcerative colitis and heartburn.

Heals wounds-

Wounds can be healed with saffron. A paste of saffron mixedwith water and turmeric can be made andapplied directly to the wound area for better healing.

Treats respiratory problems-

Saffron is the best remedy to treat respiratory problems such as asthma due to the antioxidants present in it.

Helpful in insomnia-

Insomnia can be very annoying and make us very unproductive throughout the day. Daily consumption of saffron can cure insomnia and induce sleep in humans. It also regulates sleep patterns and makes the person feel healthier and more energetic.

Fights cancer-

Saffron is known to have cancer preventing properties. The compound in saffron known as crocin is useful in inhibitingthe growth of colon cancer cells. In skin cancer also saffron shows effective results.

Improves eyesight-

The natural compounds found in saffron helps in medical cases with retinal degeneration and vision loss. It strengthens the visual response.

Useful in hair treatment-

The antioxidants in saffron help in repairing damaged hair and promote its growth. You can mix a teaspoon of saffron strands with almond oil or coconut oiland massage your hair well for healthy growth.

For skin care-

Topical application of saffron brightens up your skin. You can use a saffron milk mask to moisturize and soften the skin. You can also use it to treat acne and blemishes.

Side effects of using Saffron

Saffron can have possible side effects-

  • Consuming saffron in high doses can cause diarrhea, dizziness, vomiting, mucous membranes, etc. In some cases, taking too much saffron can be toxic to health.
  • It should be avoided by people suffering from bipolar disorder. Saffron should be avoided by patients with low blood pressure and those with heart disease.
  • Pregnant women also should not consume it in excess.

Where is Saffron found?

Saffron originally came from Greece and was first grown there, but in present times, this spice is mainly grown in Iran, Greece, Morocco and India. In India, it is grown in Jammu and Kashmir.

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क्या है रागी? जानें, इसके फायदे और उपयोग

Posted 22 April, 2022

क्या है रागी? जानें, इसके फायदे और उपयोग

सेहत के लिए पौष्टिक युक्त अनाज का सेवन करना बहुत जरुरी होता है। यह शरीर को पोषण देने के अलावा कई शारीरिक और मानसिक बीमारियों से बचाने में मदद करता है। उन्ही सेहतमंद अनाजों में से एक रागी भी है। जिसमें तमाम मिनरल, विटामिन और कई अन्य आवश्यक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसलिए रागी को बहुत सी शारीरिक और मानसिक परेशानियों के लिए अच्छा माना जाता है।

रागी का पौधा लगभग1मीटर तक ऊंचा होता है। इसके फल गोलाकार, चपटे और झुर्रीदार होते हैं। इसकी बीज गोलाकार, चिकने एवं गहरे-भूरे रंग के होते हैं। रागी को मड़वा या मंडुआ भी कहा जाता है। इसके अलावा रागी को विभिन्न जगहों पर अलग-अलग नामों जैसे हिंदी में रागी, तमिल में केझवारगु, कन्नड़ और तेलगु में रागी नाम  से जाना जाता हैं। इसका वानस्पतिक नाम एलुसीन कोरकाना (Eleusine coracana) है।  

रागी के फायदे-

हड्डियों के विकास के लिए-

रागी कैल्शियम का एक अच्छा स्रोत माना जाता है। जो हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है। । इसके अलावा इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट, ऑस्टियोपोरोसिस और रूमेटोइड गठिया जैसी बीमारियों को रोकने में मदद करते हैं। साथ ही यह हड्डियों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है। इसलिए हड्डियों के विकास एवं मजबूती प्रदान करने के लिए अपने आहार में रागी को दलिया के रूप में सेवन करना लाभप्रद होता है। 

वजन कम करने के लिए-

रागी के दलिया का सेवन करना बढ़ते वजन को नियंत्रित करने में मदद करता है। क्योंकि रागी में ट्रीप्टोफन नामक एमिनो एसिड पाए जाते हैं। जिसमें एंटीओबेसिटी (वजन को कम करने वाला) गुण होता है।  यह एमिनो एसिड भूख को नियंत्रित करने का काम करता है। जिससे वजन को बढ़ने से रोका जा सकता है। इसलिए वजन घटाने के लिए रागी को एक अच्छे विकल्प के तौर पर देखा जाता है।

मधुमेह (डायबिटीज) के लिए-

रागी का आटा टाइप-2 डायबिटीज की समस्या को दूर करने के लिए लाभकारी साबित होता है। दरअसल रागी में लो ग्लाइसेमिक और एंटीडायबिटिक (ब्लड शुगर कम करने वाला) प्रभाव मौजूद होते हैं। जो टाइप-2 डायबिटीज में राहत पहुंचाने का काम करते हैं।  

कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए-

कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए रागी एक कारगर औषधी है। क्योंकि रागी में मौजूद एमिनो एसिड लिवर में जमा अतिरिक्त वसा को निकालता है। जिससे शरीर में मौजूद कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है। इसके अतिरिक्त रागी में थ्रेओनीन नामक एमिनो एसिड भी पाया जाता है। यह लिवर में अतिरिक्त वसा को इकठ्ठा नहीं होने देता है। परिणामस्वरूप शरीर में कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रहता है। 

एनीमिया के लिए फायदेमंद-

शरीर में आयरन की कमी का होना एनीमिया (लाल रक्त कोशिकाओं की कमी) का मुख्य कारण माना जाता है। दरअसल रागी आयरन से समृद्ध अनाज माना जाता है। इसलिए इसका सेवन एनीमिया के खतरे को दूर कर, शरीर में आयरन की कमी को पूरा करता है। इसके लिए रागी के आटे, दलिया अन्य व्यंजन के रूप में  प्रयोग किया जा सकता है।

हृदय स्वास्थ्य के लिए-

रागी ह्रदय स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। क्योंकि इसमें आयरन, मैग्नेशियम नामक  खास तत्व मौजूद होते हैं। जो बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करके उच्च रक्चाप को कम करने का काम करता है। साथ ही धमनियों से संबंधित समस्या के कारण हृदय रोग के जोखिमों को भी कम करता है। इसलिए रागी को हृदय स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।

पाचन शक्ति एवं कब्ज में लाभप्रद-

रागी की दलिया या आटा पाचन शक्ति को बढ़ाने में लाभकारी सिद्ध होता है। दरअसल रागी में मौजूद डायट्री फाइबर आतों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। वहीं, रागी में लैक्सेटिव (कब्ज से राहत देने वाला) प्रभाव मौजूद होता है। जो कब्ज की समस्या को दूर करने का काम करता है। इसलिए पाचन शक्ति को बढ़ाने और कब्ज की परेशानी को दूर करने में रागी का सेवन करने की सलाह दी जाती है।

एंटी कैंसर के रूप में सहायक-

 रागी का सेवन कैंसर से बचाव के लिए लाभकारी होता है। दरअसल, रागी में मेथिओनाइन, सिस्टीन एवं लायसिन जैसे एमिनो एसिड गुण पाए जाते हैं। यह सभी गुण कैंसर से बचाने का काम करते हैं। साथ ही कैंसर कोशिकाओं को भी नष्ट करते हैं। जिससे कैंसर होने की संभावना को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।  

स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए लाभप्रद-

स्तनपान करा रही महिलाओं को अपने आहार में रागी को अवश्य शामिल करना चाहिए। क्योंकि रागी में मौजूद पोषक तत्व मां के दूध को बढ़ाने सहायक होता है। साथ ही यह दूध में आवश्यक आयरन, कैल्शियम और एमिनो एसिड प्रदान करता है। यह पोषक तत्व मां के अलावा बच्चों के लिए भी बहुत जरुरी होते हैं।

मस्तिष्क के लिए फायदेमंद-

रागी में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट और एमिनो एसिड शरीर को आराम पहुंचाने का काम करते हैं। साथ ही इसमें पाए जाने वाला ट्रीप्टोफन एमिनो एसिड दिमाग को शांत करता है। इसके अलावा यह चिंता, तनाव, अवसाद, सिरदर्द एवं अनिद्रा जैसी समस्याओं को दूर करने में मदद करता है।   

त्वचा के लिए लाभदायक-

सेहत के अलावा त्वचा के लिए रागी का सेवन बेहद कारगर है। यह त्वचा की पूरी तरह से देखभाल करता है। इसमें मौजूद फेरुलिक एसिड पराबैगनी किरणों से होने वाली त्वचा की क्षति से बचाव करता है। इसके अलावा रागी में एंटी एजिंग गुण मौजूद होते हैं, जो समय से पहले बुढ़ापे (एजिंग) के लक्षणों को कम करते हैं। इसके लिए रागी को फेस मास्क के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

रागी के उपयोग-

●रागी के आटे से बने रोटियों या पराठों का सेवन किया जाता है। 

●रागी के दलिया को नाश्ते के रूप में खाया जाता है। 

●रागी से बने इडली या डोसा का सेवन किया जाता है। 

●रागी से बने रागी बॉल्स का सेवन किया जाता है। 

●रागी का इस्तेमाल फेस मास्क के तौर पर किया जाता है।

रागी के नुकसान-

●चूंकि रागी कैल्शियम का एक अच्छा स्रोत है। इसलिए इसका अधिक सेवन गुर्दे की पथरी का कारण बन सकता है।

●इसमें फाइबर की मात्रा अधिक पाई जाती है। इसलिए इसके अधिक सेवन से पेट संबंधी समस्या जैसे गैस, पेट फूलना, पेट में मरोड़ या ऐठन हो सकती है। 

●जिन लोगों को रागी या इससे बने उत्पाद से एलर्जी है। ऐसे में उन्हें इसके सेवन से बचना चाहिए।

रागी कहां पाया जाता है?

आमतौर पर रागी भारत, अफगानिस्तान की विभिन्न स्थानों पर उगाई जाने वाली मुख्य फसल है। विशेष रूप से भारत में इसकी खेती पर्वतीय क्षेत्रों में की जाती है। इसके अलावा यह उच्च पर्वतीय प्रदेशों में भी पाया जाता है।

 
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Health Benefits and Side effects of Pistachio

Posted 22 March, 2022

Health Benefits and Side effects of Pistachio

Pistachios are green colored unique nuts having a slightly sweet taste and are among the oldest nuts. These nuts are the oblong edible seeds of the Pistacia vera tree, which belongs to the Anacardiaceae, also known as the cashew family.

Pistachios are not only a great source of garnishing, they are also one of the healthiest foods. They are a powerful food pack that are loaded with antioxidants, including lutein, beta-carotene and gamma-tocopherol. Pistachios are high in protein, fibre, vitamin E, vitamin K, vitamin B6, thiamine, folic acid, vitamin B5, and minerals such as potassium, calcium, copper, phosphorus and manganese. Pistachios are also a rich source of essential fatty acids.

Health Benefits of Pistachio

Improves heart health-

Consuming pistachios can effectively improve your heart health. These nuts contain arginine (a type of amino acid). Arginine is also known to lower blood pressure. Along with this, pistachios are also rich in monounsaturated fatty acids, which help lower high blood pressure and bad cholesterol. Thus, it cleanses the heart vesselsand contributes to heart health.

Helps in weight loss-

Pistachios are rich in fibre and protein, which increase satiety and in turn can aid weight loss. The fiber in it increases the body's metabolism, which helps to reduce excess weight from your body. Pistachios are a good source of monounsaturated fat, which helps regulate weight. It is also known as a low-calorie snack, so it can be enjoyed when you feel hungry.

Promotes gut bacteria-

Pistachios contain a large amount of fiber, which can strengthen the digestive tract. Gut bacteria ferment the fiber in pistachios and convert it to a short-chain fatty acid - butyric acid. Therefore, they can significantly increase the concentration of bacteria in the gut. The higher amount of fiber also helps prevent constipation.

Control blood sugar levels-

Pistachio helps increase levels of peptides that regulate glucose levels in diabetics. Therefore it helps lower blood sugar levels and keep them under control.

Lowers cholesterol levels-

Pistachios are rich in antioxidants and have a cholesterol-lowering effect that helps lower bad cholesterol (LDL) and increase good cholesterol (HDL).

Works as an anti-inflammatory-

Pistachios are rich in monounsaturated fats which help fight inflammation. They help fight internal inflammation, especially in heart diseases.

Improves eyesight-

Pistachios are a good source of nutrients that are important for the health of your eyes. Antioxidants like lutein and zeaxanthin, are present in the human retina and in adequate intake of these antioxidants leads to vision problems such as refractive errors and cataracts. Pistachios help in fulfilling the insufficiency of these antioxidants. They are also high in zinc, which helps reduce the risk of impaired night vision.

Boosts immunity-

Consumption of pistachios every day can boost our immune system. They are rich in vitamin B6, which is important for better immune system functioning. It contains antioxidants that can help prevent infection.

Side effects of Pistachio

Following are the side effects of eating pistachios in excess-

Pistachios can affect the digestive system and cause digestive problems such as bloating, gas, upset stomach, diarrhea and constipation. The degree of discomfort depends on the number of nuts eaten. Higher the consumption, the bigger the problem.

Where are Pistachios found?

Pistachios are native to the Central Asian region, Iran and Afghanistan. In India, it is widely grown in Jammu and Kashmir. Archeology shows that pistachio seeds were discovered as early as 6750 BC.

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Process and Benefits of doing Marjari asana

Posted 23 November, 2022

Process and Benefits of doing Marjari asana

Due to the hectic lifestyle and the adoption of an unhealthy lifestyle, the problem of back and body pain has become very common. It has become so common that it is encountered more in children and young people than in elderly people. The main reasons for this problem are working on the computer for long hours, using the cell phone for a long time, and running etc. Therefore, to get rid of these problems, it is very important to include some kind of yoga in your daily routine. One of these asanas is Marjariasana, which is one of the simplest and most important asanas to be done while sitting. The shoulders and surrounding muscles get stretched by continuous practice of this asana. It provides relief from back pain, body pain, and headaches and makes the body flexible and disease free.

What is Marjari Asana?

Katichakrasana proves to be effective in reducing anxiety, stress, depression and other mental related problems. According to medical research, stress leads to a deficiency of neurotransmitters like serotonin, noradrenaline, and dopamine in the brain. This asana is helpful to get rid of these problems. Apart from this, doing this increases the self-confidence of the person.

Process of doing Marjari Asana

  • Lay a yoga mat on the floor or a flat surface and lie on it.
  • Now place your palms under your shoulders. Simultaneously raise your hips while putting weight on them.
  • Make sure the knee stays directly under the hip bone.
  • Now straighten your thighs up and make a 90 degree angle at the knees of your feet.
  • In this position, the chest should remain parallel to the floor. Thus, the person comes into the pose of a cat.
  • Now take a deep breath and release it slowly.
  • Breathe once again and pull the stomach down.
  • After this, push your navel up from the bottom and raise your tailbone (the lower part of your spine). Simultaneously press your buttocks.
  • Stay in this position for a few seconds.
  • Tilt your head down slowly while exhaling.
  • Try to touch the chin of your mouth to your chest.
  • Now look at the distance between your knees. Note that you do not bend the hand in this posture.
  • Take a deep breath once again.
  • After this, turn your head backwards and repeat this process.
  • Do this exercise about 10-20 times.

Benefits of doing Marjari asana

  • This asana stretches the muscles of the back, neck, and shoulders, which reduces the stiffness in the back.
  • It helps relieve back pain.
  • Marjari asana is beneficial in reducing belly fat as it increases metabolism.
  • This asana provides peace of mind by reducing anxiety, tension, and headaches.
  • Marjari asana is very beneficial for the spinal cord. Its regular practice makes the spinal cord flexible.
  • This asana is very beneficial for asthma patients.
  • Its continuous practice provides relief from pain in the hands, wrists, and shoulders.
  • Marjari asana is very beneficial for keeping the digestive system healthy as its practice puts a strain on the abdominal muscles, which helps in improving digestion by stimulating the abdominal organs.

Precautions while doing Marjari asana

  • In the initial phase, practice Marjari Asana only under the guidance of a yoga expert.
  • Putting too much pressure on your body while doing this asana may lead to injuries.
  • Do not do Marjari asana more than you can manage.
  • Avoid doing this asana in the case of any injury or acute pain in the neck.
  • People suffering from back or knee injuries should avoid doing Marjari asana.
  • Pregnant women should avoid this asana.
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What is Janu shirshasana? Learn about the method and benefits of doing it

Posted 21 November, 2022

What is Janu shirshasana? Learn about the method and benefits of doing it

Janushirshasana is a yoga posture composed by great sages and yoga gurus that is considered to be one of the latest asanas to be done while sitting. It is derived from three words of the Sanskrit language. The first is "janu", which means knee, second is "shirsh", which means head; and the third is "asana", which means the posture of sitting, standing or lying down. Regular practice of this asana keeps a person healthy. Apart from this, Janushirshasana has many other physical and mental benefits. Let us talk in detail about the way of doing Janushirshasan and its benefits through this article.

Method of doing Janu shirshasana

  • Lay a yoga mat in a clean environment and sit on it with your legs extended in front of you.
  • Now bend the right leg from the knees and keep the soles close to the thigh of the left leg.
  • After that, raise both your hands up.
  • Hold the toes of the left foot with both hands and pull it inwards, that is, towards the head.
  • After that, while bending the nose, touch the knees of the left foot.
  • Then while exhaling slowly, straighten the right leg.
  • Repeat the same process with the other leg.
  • Practice this asana at least 4-5 times.

Benefits of Janu shirshasana

  • This asana makes the shoulders, waist, thighs, and spine flexible and strong.
  • Back pain is cured by this yoga practice, as this pose stimulates blood flow to the spine.
  • Janushirshasana removes the stiffness in all the parts of the body.
  • This asana proves to be effective in the treatment of hump.
  • The practice of Janu shirshasana is very beneficial when there is pain or sprain in the knees and ankles.
  • This asana helps in calming the mind by removing stress and depression.
  • Its continuous practice improves the digestive system.
  • This asana stimulates the kidneys and liver, thereby improving their functioning.
  • It is very beneficial for problems like headaches, insomnia, high blood pressure, and sinusitis.
  • This asana reduces the symptoms of menopause in women. It also cures menstrual problems.
  • It is also effective in meningitis and leucorrhoea in women.

Precautions while doing Janushirshasana

  • Do not put excess pressure on the body beyond its physical capacity during yoga practice.
  • Avoid jerking or forcefully doing Janushirshasana.
  • People with acute lower back pain should not do it.
  • People suffering from ulcers should avoid this asana.
  • Patients with asthma and TB should practice Janushirshasana under the supervision of a yoga guru.
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What is Katichakrasana Yoga? Know its method, benefits and precautions

Posted 19 November, 2022

What is Katichakrasana Yoga? Know its method, benefits and precautions

Katichakrasana is a yoga asana which is made up of two words. The first is "kati,” which means waist, and the second is "chakra," which means wheel. In this mudra, the waist has to be rotated from left to right or from right to left. While doing this, the waist spins like a wheel. On the basis of these facts, it has been named Katichakra. Along with stretching the waist, this posture also brings flexibility. Apart from this, doing this asana provides many other physical and mental health benefits.

Procedure for doing Katichakrasana Yoga

  • To stand with them, stand straight.
  • At least there should be one and a half to two feet between the feet.
  • Spread both the hands in line with the shoulders.
  • After that place your left hand on the right shoulder and wrap the right hand from behind to the left side of the torso.
  • While breathing slowly, move the mouth towards the left shoulder.
  • Now stand in this position for some time and then repeat the action from the right side in the same way.
  • Repeat this process 4-5 times with both hands.

Benefits of Katichakrasana

Effective in reducing belly fat

Belly fat or other body fat is a harmful type of fat that gets stored around your organs. This asana helps in reducing the extra belly fat.

    Useful for acidity and constipation

    Acidity and constipation are relieved by regular practice of Katichakrasana. Constipation is a problem related to the digestive system that makes it difficult to pass stool. Due to constipation, the stool becomes hard and thick, which results in pain in the stomach and an urge to pass stool.

      Beneficial for diabetes

      Diabetes is a metabolic disease in which the amount of blood sugar in a person's blood exceeds the required level. This mudra is very beneficial for diabetic patients.

        Beneficial in digestion

        This asana helps in improving digestion. It is believed that disturbances in the digestive system of a person cause many physical problems, because most diseases originate from the stomach itself.

          Helpful in relieving stress

          Katichakrasana proves to be effective in reducing anxiety, stress, depression and other mental related problems. According to medical research, stress leads to a deficiency of neurotransmitters like serotonin, noradrenaline, and dopamine in the brain. This asana is helpful to get rid of these problems. Apart from this, doing this increases the self-confidence of the person.

            Other benefits of Katichakrasana are

            • This asana helps to tone up the waist and increase its flexibility.
            • It removes stiffness in the neck and back.
            • This asana makes the shoulders strong and broad.
            • By doing this asana, the body becomes light.
            • This removes the laziness of the body.

            Take these precautions while doing Katichakrasana yoga

            • Do not bend the knees and feet while rotating the waist.
            • Always do this yoga on an empty stomach in the morning.
            • Do not jerk the body in any way while doing yoga.
            • Do not lift the soles of your feet off the ground while doing this asana.
            • Do not do this asana if you have severe back or neck pain.
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            What is Makarasana? Know about the method and Benefits of doing it

            Posted 16 November, 2022

            What is Makarasana? Know about the method and Benefits of doing it

            Makarasana is derived from the Sanskrit word 'Makara', which literally means crocodile. In this asana, the person poses like a crocodile. That's why this asana is called Crocodile Pose. Performing this yoga practice in the right way provides many physical and mental benefits. Continuously practicing it brings flexibility in the muscles of the back and spine, due to which the problem of back pain is relieved.

            Apart from this, regular practice of Makarasana also provides spiritual benefits. Let us shed light on the method and benefits of doing Makarasana through this article.

            Method of doing Makarasana

            • First of all, choose an open area that is clean and serene.
            • Lie down on your stomach on a carpet or mat.
            • Now spread your legs straight and keep your body straight.
            • Now keep both your elbows on the ground.
            • Raise your head and shoulders. Keep in mind that during this, both elbows should remain on the ground.
            • Now stand with your palms in the shape of a cup and place your chin on it.
            • Now take a long breath and release it.
            • If there is more pressure on the waist in this process, then slightly spread both your elbows.
            • Now slowly move both your legs from bottom to top and then from top to bottom.
            • In this way, one cycle of Makarasana is completed.
            • Do this process about 10 times or as per your capacity.

            Benefits of doing Makarasana

            • This asana stretches the muscles of the back, neck, and shoulders, which relieves the stiffness in the back and provides relief from several problems related to the back.
            • This asana effectively relieves body pain.
            • Makarasana is very beneficial for the spinal cord. Regularly practicing it makes the spinal cord flexible.
            • Makarasana is extremely beneficial in the treatment of heart diseases.
            • This asana provides peace to the mind by reducing anxiety, tension, and headaches.
            • This asana is very beneficial for asthma patients.
            • Makarasana is very beneficial for keeping the digestive system healthy because its practice puts a strain on the abdominal muscles due to which all the abdominal organs are nourished. Thus, it helps in improving digestion by stimulating the abdominal organs.

            Take these precautions while doing Makarasana

            • Do not practice Makarasana repeatedly as it puts a strain on the muscles.
            • Do not practice this asana if there is any kind of injury or acute pain in the waist, back, or neck.
            • Avoid doing Makarasana in the case of injury to any part of the body.
            • People with high blood pressure should avoid this practice.
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            Procedure and Benefits of doing Natarajasana

            Posted 15 November, 2022

            Procedure and Benefits of doing Natarajasana

            According to Yoga Shastra, "Natarajasana" is one of the important asanas, also known as dancer's posture. Its continuous practice brings many health benefits to the body. The yoga practice of Natarajasan also provides good stretching for the body. Through this article, let us get a deep idea of the process, benefits, and precautions of doing Natarajasana.

            What is Natarajasana?

            Natarajasana is a form of yoga whose name is believed to be the dancer form of Lord Shiva mentioned in mythology. It is derived from three words of the Sanskrit language. The first is "nata," which literally means "dance," the second "raj," meaning "king," and the third "asana," which means posture. Nataraja Mudra is the dance posture of the Lord. Hence, it is known as Natarajasana. Apart from this, Natarajasana is also considered as one of the main postures of Indian classical dance Bharatanatyam. That's why this posture is also called Lord of the Dance Pose or Dancer Pose. To do this asana, it is very important to keep the body balanced.

            Benefits of doing Natarajasana

            • This asana balances the nervous system.
            • Its regular practice develops control over the body.
            • This asana strengthens the arms, shoulders, legs, and lower back by generating stretch.
            • This yoga practice strengthens the muscles of the thighs, calves, and ankles.
            • It also helps in increasing concentration & keeps the brain healthy.
            • By doing this asana, stress is reduced.
            • Natarajasana is also effective for knee pain.
            • Its regular practice helps in reducing weight.

            Process of doing Natarajasana

            • First of all, stand straight in a flat place.
            • Then take a long breath, bend the left leg from the knee, and take it backward. Simultaneously hold the toe with your left hand.
            • After this, raise your left leg as high as possible.
            • During this, balance the weight of the whole body on the right leg.
            • Then tilt your upper body forward.
            • Pay attention not to disturb the balance of the body during this time.
            • Now straighten your right hand forward and try to pull lightly.
            • Remain in this posture for a few seconds or as per your capacity.
            • Then slowly come back to your original position.
            • Repeat the same process with the other leg, i.e., from the opposite direction.
            • Do this asana cycle about 3 to 4 times.

            Take these precautions while doing Natarajasana

            • Do not put excess pressure on the body during any kind of yoga practice.
            • People with low blood pressure should avoid this asana.
            • If someone has pain in the neck or shoulders during this asana, then they should avoid doing this asana.
            • If there is any problem in the waist while doing this yoga practice, then immediately stop doing this asana and consult a yoga specialist.
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            What is Naukasana? Learn the benefits & process of doing it

            Posted 15 November, 2022

            What is Naukasana? Learn the benefits & process of doing it

            Naukasana derives from two Sanskrit words. The first is 'Nauka', which means boat, and the second, 'Asana', means posture or pose. Therefore, in Naukasana, the practice of this yogasana, the person's body comes into the posture of a boat. Hence, it is known as Naukasana or Boat Pose. This asana is a medium-grade yoga posture performed on the back, which has been practiced since ancient times.

            Naukasana is considered one of the asanas that provide strength and concentration. Apart from this, the practice of Naukasana also has many health benefits. This asana has many health benefits, ranging from reducing belly fat to strengthening the spine and improving the functioning of the lungs. Therefore, Naukasana must be included in your daily routine.

            Benefits of Naukasana

            • This asana strengthens the arms, thighs, and shoulders.
            • With its continuous practice, one gets rid of back and neck pain.
            • This yoga practice strengthens the abdominal muscles, hips, and spine and makes the body flexible.
            • This asana stimulates the kidneys, intestines, thyroid and prostate glands.
            • Regularly practicing this asana reduces physical fatigue, anxiety, and stress.
            • Naukasana also helps to burn fat, which helps in reducing weight.
            • Naukasana strengthens the digestive system. Along with this, it relieves many problems related to the digestive system, like constipation, gas, and acidity.

            Method of doing Naukasana

            • Lay a yoga mat on a flat surface and lie down on it.
            • Place your hands next to your thigh and keep your body straight.
            • Now stay in a relaxed position and breathe normally.
            • After this, take both your hands backwards and place them on the ground a little behind your hips.
            • Now while breathing slowly, try to lift your head, legs, and whole body up to 45 degrees from the ground.
            • Note that during this, the spine should be absolutely straight.
            • Now bring your thighs and navel closer together, such that the body comes into a boat position.
            • After this, lift your ankles and bring them in line with your eyes.
            • During this, the body will appear in the shape of a boat or V.
            • Now breathing normally, stay in this posture for about 10 to 20 seconds.
            • As the next step, exhale slowly and come back to your original position.

            Take these precautions while doing Naukasana

            • If someone has back pain or spinal disease, then they should avoid this practice.
            • Do not do this asana with the problem of hernia.
            • If a person has low blood pressure or any other heart related problem, then avoid this practice.
            • People suffering from asthma, severe headaches or migraines should avoid practicing this asana.
            • Women should not do this asana during pregnancy and menstruation.
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            कंधे में दर्द के कारण, लक्षण और घरेलू उपचार

            Posted 23 November, 2022

            कंधे में दर्द के कारण, लक्षण और घरेलू उपचार

            आज के दौर में कंधे दर्द की समस्या बेहद आम हो गयी है। इतनी आम कि यह बुजुर्गों की अपेक्षा बच्चों और युवाओं में अधिक देखने को मिलती है। इस समस्या के मुख्य कारण हैं- गलत मुद्रा में उठना, बैठना या सोना, गलत तरीके से भारी वजन उठाना और शारीरिक गति विधियां कम करना आदि होता है। इन अनियमित दिनचर्या के कारण कंधों की मांसपेशियों में अकड़न आ जाती है। जिससे कंधों में दर्द होना शुरू हो जाता है।

            कभी-कभी इसे छोटी समस्या मानकर नजर अंदाज कर देने से यह एक असहनीय दर्द का कारण बन जाता है। परिणामस्वरूप कंधे को हिला पाना भी मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा व्यक्ति के जीवन में और कई अन्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

            क्या होता है शोल्डर पेन?

            शोल्डर पेन एक हड्डियों से जुड़ी समस्या होती है। जिसके होने पर कंधों में गंभीर दर्द होता है। यह समस्या किसी को भी हो सकती है। आजकल लगभग सभी व्यक्तियों को कंधे के दर्द जैसी परेशानी से गुजरना पड़ता है। दरअसल कंधा एक बॉल और सॉकेट जॉइंट है जो हाथों को आगे-पीछे ले जाने का काम करता हैं। यह शरीर का सबसे गतिशील अंग है। जिसमें किसी कारणवश स्थिरता की कमी आती है। कंधे में स्थिरता की कमी के कारण यह चोट और दर्द का शिकार हो जाता है। कंधे का दर्द एक शारीरिक समस्या है जिसमें जोड़ या मांसपेशियां, टेंडन और जोड़ को सहारा देने वाले स्नायुबंधन प्रभावित होते हैं।

            रोटेटर कफ क्या है और रोटेटर कफ की चोट को कैसे पहचानें?

            रोटेटर कफ कंधे के जोड़ की रक्षा करता है और सिर के ऊपर बाजुओं की गति में मदद करता है। आमतौर पर यदि रोटेटर कफ में सूजन आ जाती है,तो इस स्थिति में दर्द सामने के हिस्से में या कंधे के बाहर होता है। यह दर्द आमतौर पर तब अधिक गंभीर होता है जब व्यक्ति अपने हाथ को सिर के ऊपर उठाता है। इसे दूर करने के लिए फिजियोथेरेपी या व्यायाम की आवश्यकता पड़ती है।

            कंधे दर्द के कारण

            खराब मुद्रा

            जब कोई व्यक्ति अपने शोल्डर को खराब मुद्रा में हिलाता हैं। इस स्थिति में कंधे के जोड़ की मांसपेशियों में सूजन आ जाती है। इससे कंधे में दर्द होता है।

            चोट या आघात

            गर्दन या बाजुओं की हड्डी में पुरानी चोट की वजह से भविष्य में व्यक्ति शोल्डर पेन से ग्रसित हो सकता हैं।

            बुढ़ापा या नेचुरल डिजनरेशन

            गठिया, क्षतिग्रस्त कफ रोटेटर एवं कार्टिलेज एक सामान्य अपक्षयी रोग है। गठिया एक प्रकार की अपक्षयी बीमारी है, जो शरीर के जोड़ों में सूजन का कारण बनती है। यह अक्सर शरीर के भार को वहन करने वाले जोड़ों, जैसे कूल्हों और घुटनों में होता है। कभी-कभी यह कंधे के जोड़ की सूजन हो सकती है। जिससे कंधो में असहनीय दर्द होता है।

            रेपेटिटिव ओवरहेड गतिविधि

            कंधे की मांसपेशियों एवं हड्डियों को एक ही दिशा और गति में दोहराते रहने से भी कंधे में दर्द शुरू हो जाता है। क्योंकि ऐसा करने से शोल्डर टेंडन्स और शोल्डर ब्लेड्स के बीच की दूरी कम होती जाती है। इसके अलावा पिंचिंग, जिसे अक्सर इंपिंगमेंट सिंड्रोम कहा जाता है। यह भी कंधे के दर्द का कारण होता है।

            किसी प्रकार की बीमारी

            मधुमेह, हाइपोथायरायडिज्म, रूमेटाइड गठिया, परिधीय न्यूरोपैथी जैसे रोगों से भी कंधे में दर्द उत्पन्न होते हैं।

            पुराने ऑस्टियोआर्थराइटिस

            यह गठिया का सबसे आम रूप है। यह व्यक्ति के कंधों सहित किसी भी जोड़ को प्रभावित कर सकता है। इस स्थिति में हड्डियों के बीच का कार्टिलेज टूट जाता है और एक दूसरे से रगड़ने लगता है। इससे कंधे में दर्द और अकड़न होती है।

            कंधे के दर्द के लक्षण-

            कंधे के दर्द में मुख्य रूप से कंधे के आसपास के क्षेत्रों में दर्द होता है। इसके अलावा अन्य लक्षण भी देखने को मिलते हैं जो इस प्रकार हैं:

            • कंधों को हिलाने में असमर्थता महसूस करना।
            • जोड़ों के आस-पास की त्वचा को छूने पर गर्माहट या दर्द का आभास होना।
            • मांसपेशियों में ऐंठन होना।
            • कंधों में अकड़न या खिंचाव होना।
            • लम्बे समय तक चक्कर आना।

            कंधे के दर्द की रोकथाम कैसे करें?

            • कंधे संबंधित कुछ व्यायाम रोटेटर कफ की मांसपेशियों और टेंडन को फैलाने में मदद करते हैं। इसलिए इसे किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करें।
            • यदि पहले कभी कंधे की समस्या रही है, तो भविष्य में होने वाली चोटों से बचने के लिए व्यायाम करने के बाद उस जगह पर 15 मिनट तक बर्फ लगाएं।

            कंधे के दर्द का इलाज

            एंटी इंफ्लेमेंटरी मेडिसिन

            कंधों के दर्द एवं सूजन को कम करने के लिए कुछ दवाएं जैसे एडविल (इबुप्रोफेन के लिए) और एलेव (नेप्रोक्सन के लिए) शामिल हैं। यह दोनों दवाएं डॉक्टर द्वारा निर्धारित हैं और लेबल के अनुसार उपयोग करने के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं।

            गर्म सिकाई करें

            किसी भी तरह के दर्द से राहत पाने के लिए गर्म पानी से सिकाई करना एक अच्छा विकल्प है। इससे रक्त का संचरण भी ठीक हो जाता है। गर्म पानी से शावर लेना भी कंधे के दर्द में फायदा करता है। इसके अलावा कंधे दर्द से राहत पाने के लिए इलेक्ट्रिक हीटिंग पैड का उपयोग किया जा सकता है। ध्यान रखें कि यदि इलेक्ट्रिक हीटिंग पैड का उपयोग कर रहे हैं, तो इसे उच्च ताप के बजाय मध्यम आंच पर सेट करें।

            आइस पैक

            आइस पैक (ice pack) कई तरह के दर्द में मदद करता है। इसलिए आइस पैक को प्रभावित अंग पर लगाने से काफी आराम मिलता है। इसके अलावा आइस पैक कंधे या शरीर के अन्य किसी हिस्से में दर्द के साथ सूजन को भी खत्म करता है।

            सेंधा नमक

            एक कटोरी एप्सम साल्ट (सेंधा नमक) को हल्के गर्म पानी से भरे बाथटब में डालें। जबतक पानी की गर्माहट रहे तब तक बाथटब में बैठे रहें। ऐसा करने से शोल्डर पेन में आराम मिलता है।

            मालिश करें

            अपने कंधे की नियमित मालिश और कुछ शोल्डर संबंधी व्यायाम करने से दर्द कम होता है।

            कंधे के दर्द का घरेलू इलाज

            मेहंदी और लौंग का तेल

            किसी पात्र में मेहंदी और लौंग के तेल को मिलाकर लगभग दो मिनट तक उबालें। फिर उसे आंच से हटाकर कुछ देर के लिए रख दें। हल्का गर्म होने पर एक रुई के टुकड़े को इस मिश्रण में डुबोएं। फिर इसे अपने कंधे पर हल्के हाथों से लगाकर उस जगह को अच्छी तरह से एक पट्टी से लपेट दें। ऐसा करने से कंधे के दर्द से राहत मिलती है।

            नींबू और शहद

            नींबू और शहद के मिश्रण को रोजाना खाली पेट लें। ऐसा करने से भी दर्द में सुधार होता है।

            मेन्थॉल क्रीम

            मेन्थॉल क्रीम या मलहम से कंधे की मालिश करने से निश्चित रूप से दर्द और इससे जुड़ी परेशानी से राहत मिलती है।

            कंधे दर्द के लिए कुछ शारीरिक व्यायाम

            नियमित व्यायाम और स्ट्रेचिंग आपके कंधों को मजबूत और लचीला बनाते हैं।

            पेंडुलम स्ट्रेच

            • सर्वप्रथम खड़े होकर कमर के बल झुकें।
            • इसके बाद अपने कंधे के दर्द वाले हाथ को सीधे नीचे की ओर लटकाएं।
            • अपनी गर्दन को आराम दें।
            • अपनी बाहों को एक सर्कल में 20 बार तक घुमाएं।
            • ऐसा दिन में लगभग 5 से 10 बार करें।

            ओवरहेड शोल्डर स्ट्रेच

            • इस स्ट्रेच को करने के लिए सर्वप्रथम सावधान मुद्रा में खड़े हो जाएं।
            • अब अपनी कोहनी मोड़ें और अपनी बाहों को अपने सिर के ऊपर उठाएं। इसके अलावा अपने हाथों को अपने सिर के ऊपर या पीछे भी रख सकते हैं।
            • इसके बाद अपनी कोहनी को पीछे ले जाने के लिए अपने कंधे के ब्लेड को धीरे से मोड़ें।
            • अब 20 बार घुमाएं। इसका अभ्यास दिन में 5 से 10 बार करें।

            अपर बॉडी स्ट्रेंथनिंग

            • इस स्ट्रेच को करने के लिए सर्वप्रथम पैरों के बीच दूरी बनाकर खड़े हो जाएं। इस दौरान अपने शरीर को सीधा रखें।
            • अब अपने दोनों हाथों में भार या डंबल पकड़ें।
            • फिर अपनी हथेलियों को नीचे की ओर रखते हुए उन्हें अपने कंधे के स्तर पर ले आने के लिए अपने हाथों को उठाएं।
            • इस स्थिति में 3-4 सेकंड तक रहे।
            • फिर अपनी मूल अवस्था में आ जाएं।
            • ऐसा कम से कम 5 से 10 बार करें।
            • ध्यान रखें इस स्ट्रेच को तब करें जब आपके कंधे का दर्द कम हो जाएं।

            कब जाएं डॉक्टर के पास?

            आमतौर पर हल्का कंधे दर्द को कुछ घरेलू उपाय करके या कुछ सावधानियां बरतकर ठीक किया जा सकता है। लेकिन यदि यह दर्द लगातार बना रहे या घरेलू उपाय करने पर इसमें कुछ सुधार न हो। इस स्थिति में तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।

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            Shoulder Pain: Causes, Symptoms and Home Remedies

            Posted 08 July, 2022

            Shoulder Pain: Causes, Symptoms and Home Remedies

            Shoulder is a complex ball and socket joint that can move in multiple directions. It is the most movable part of the body. With this great strength comes a lack of stability. The lack of stability in the shoulder makes it prone to injury and pain. Shoulder pain is a physical discomfort in the shoulder which includes the joint itself or the muscles, tendons, and ligaments that support the joint. It is protected by a rotator cuff.

            What is a rotator cuff & how to recognize a rotator cuff injury?

            A rotator cuff protects the shoulder joint and helps in the movement of arms over your head. If the rotator cuff is inflamed, the pain usually occurs in front part or outside the shoulder. This pain is usually more severe when you raise your hand or lift something above your head. The pain can be severe enough to prevent you from completing even the simplest of tasks. Pain at night is common and can be bad enough to wake you up. It can also get worse lying down or on one side.

            Causes of Shoulder pain

            • Poor postureWhen you perform a rounded shoulder stand or any poor posture, the shoulder joint is placed in a position that allows compression of the bursa, muscles, and tendons in the shoulder. It causes shoulder pain.
            • TraumaTrauma can cause shoulder pain. Outstretched arms or sides, falling from a two-wheeled vehicle, sudden movements while trying to avoid a fall, all of these can cause sudden injury and fracture or injure the ligaments of the shoulder. It can also cause shoulder dislocation, leading to shoulder pain.
            • Aging or Natural DegenerationA common degenerative disease is rotator cuff degenerative disease. Arthritis is a degenerative disease that causes inflammation in one of the joints in the body. It occurs most often in the weight-bearing joints of the body, such as the hips and knees. Sometimes inflammation of the shoulder joint can occur, causing severe pain and limitation of movement.
            • Repetitive overhead activityAs you reach overhead, the distance between the shoulder tendons and the shoulder blades decreases. The tendon can then be clamped under the shoulder blade. This pinching, often referred to as impingement syndrome, can be painful.
            • Medical illnessDiseases such as diabetes, hypothyroidism, rheumatoid arthritis, peripheral neuropathy have more diseases of the shoulder joint.
            • OsteoarthritisThis is the most common form of arthritis. It can affect any joint, including your shoulders. The cartilage between bones breaks down, and rubs against each other. This can cause pain and stiffness in the shoulder.
            • Heart attackIn case of a heart attack, the supply of blood to the muscles of the heart is blocked which results in severe chest pain that can spread into the shoulders, neck and back too. If your shoulder hurts and you have difficulty in breathing or experience chest tightness, you may need immediate medical attention.

            Symptoms of Shoulder pain

            • A little pain occurs while moving the shoulder which reduces the movement.
            • A feeling may arise that the joint is slipping backwards into the socket or that the shoulder is actually dislocated (displaced).
            • Lack of movement after shoulder dislocation.

            Treatment for Shoulder pain

            • Anti-inflammatory medicationsMedicines include Advil (for ibuprofen) and Aleve (for naproxen). Both are prescribed by a doctor and are relatively safe to use according to the label.
            • Apply heat to your shoulderYou can take a gentle hot shower to reduce shoulder pain for about 5 to 10 minutes. Often patients experience shoulder pain due to sleep. A good hot shower can certainly help with this pain or you can use an electric heating pad. If using an electric heating pad, set it to medium heat, not high heat.
            • Apply ice to your shoulderIce massage is good for treating shoulder pain. For this, Use an ice pack as ice should not be in direct contact with the skin for more than 5 minutes because of the real possibility of frostbite.
            • Salt bathRock salt is effective for shoulder pain or any pain or discomfort in the body. Therefore, fill a bathtub with warm water and add rock salt to it. Taking a bath with this helps to relieve shoulder pain.
            • MassageA regular massage to your shoulder and by doing some shoulder exercises might help in reducing the pain.

            Home remedies for Shoulder pain

          • Rosemary and Clove oilBoil rosemary and clove oil in a saucepan for two minutes. Remove from the stove and let it rest. Dip a cotton flake, in this mixture, place it on your shoulder and wrap the area well with a bandage. Leave it overnight to relieve shoulder pain.
          • Lemon and HoneyMix lemon and honey until you get a hard and homogeneous mixture. Take it on an empty stomach every day until you see improvement.
          • Menthol creamMassaging the shoulder with menthol cream or ointment will surely help in relieving pain and discomfort.
          • How to prevent shoulder pain?

            Some shoulder exercises can help stretch rotator cuff muscles and tendons. A physical therapist or occupational therapist can show you how to do it right.

            If you've had shoulder problems in the past, apply ice for 15 minutes after your workout to prevent future injuries.

            Once you have bursitis or tendinitis, doing a simple range of motion exercises every day can prevent your shoulder from freezing.

            Exercises for Shoulder pain

            Regular exercise and stretching can make your shoulders strong and flexible:

            Pendulum stretch

            • Stand up and bend at the waist.
            • Let your arm hang straight down on the injured side.
            • Keep your neck relaxed.
            • Wave your arms in a circle up to 20 times.
            • Do this 5 to 10 times a day.

            Overhead shoulder stretch

            • Sit or stand for this shoulder extension.
            • Bend your elbows and raise your arms above your head. You can also place your hands above or behind your head.
            • Gently bend your shoulder blades to move your elbows back.
            • Continue up to 20 repetitions. Practice it 5 to 10 times a day.

            Upper body strengthening

            • As pain reduces, try to lift weight machines or free weights.
            • Lie on your right side with your left hand on your side.
            • With the weight on the left arm and the forearm across the stomach, lift the forearm up.
            • Keep your elbow near your side.

            When to see a doctor?

            Unless you have a serious injury or the pain is sudden and persistent, you can usually treat shoulder pain without seeing a doctor. If after two weeks of self-medication you feel that the pain is not improving, you should see a doctor or physical therapist.

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            Pelvic Pain: Causes, Diagnosis and Treatment

            Posted 29 June, 2022

            Pelvic Pain: Causes, Diagnosis and Treatment

            Pelvic pain occurs mainly in the lower abdomen. The pain can be severe or mild depending upon its underlying causes and symptoms. It can either be a sharp or stabbing type of pain in a specific place or a dull ache that spreads.

            Pelvic pain is more common in females as compared to males. Most commonly females experience pelvic pain during menstrual cycle and second most common cause of pelvic pain in females is sexual intimation (also known as honeymoon syndrome). This type of pelvic pain can be a sign of problem with organs in your pelvic area, such as uterus, ovaries, fallopian tubes, cervix or vaginal tract. Whereas in males, the cause can be prostate problem,urinary bladder issues or any type of exertion to the pelvic floor muscles during sexual intercourse.

            Causes of Pelvic Pain

            Finding the cause of chronic pelvic pain can be a long process and involves several procedures for determining it. Common causes of pelvic pain include-

            • Menstrual cramps during menstruation or ovulation.

            • Endometriosis, a condition in which the tissue that normally covers the internal part of the cervix gets inflamed and grow in outer region of the cervical lip leading to swelling of cervix.

            • Pelvic inflammatory disease (PID), an infection of the reproductive organs that is often caused by sexually transmitted bacteria.

            • Adhesions or scar strips that can form as part of the healing process after an injury or surgery.

            • Interstitial cystitis (painful bladder syndrome), a condition associated with a sudden urge to urinate.

            • Uterine fibroids or tumors in the uterus.

            • Pelvic floor disorders, including muscle weakness that makes it difficult to control urination.

            • Irritable bowel syndrome or IBS, a condition characterized by abdominal pain or frequent bowel movements.

            • Urinary tract infection (UTI or bladder infection), an infection that causes inflammation of the urinary tract and bladder.

            • Kidney stones.

            • Food intolerance or other GI problems.

            • Vulvodynia or pain in the female external genitals.

            • Diverticulitis, a condition characterized by inflammation of the large intestine.

            • Prostatitis, inflammation of the prostate.

            • STIs, such as chlamydia and gonorrhea.

            • Appendicitis, or infection of the appendix.

            • Ectopic pregnancy, where the embryo attaches outside the uterus.

            • Ovarian cysts.

            Risk factors of Pelvic Pain

            Basically anyone can experience pelvic pain. Some conditions, such as endometriosis, are believed to have a genetic component, but most causes of pelvic pain come from external sources, such as bacteria, or isolated cases.

            Some of the factors that can increase the chances of pelvic pain are:

            • Longer menstrual cycle.

            • Irregular or heavy menstrual periods.

            • Smoking.

            • History of PID, miscarriage, sexual abuse, endometriosis, or sterilization.

            • Previous diagnosis of anxiety or depression.

            Diagnosis for Pelvic Pain

            Determining what is causing your chronic pelvic pain often involves a process of elimination, as many diseases can cause pelvic pain.

            Tests or exams your doctor might take-

            Pelvic exam-This may show signs of infection, abnormal growth, or tight pelvic floor muscles. Your doctor will examine the tender area. Tell your doctor if you experience any discomfort during this test, especially if the pain is similar to how you feel.

            Laboratory tests-During a pelvic exam, your doctor may ask a laboratory to check for infections such as chlamydia or gonorrhea. Your doctor may also order blood tests to check your blood count and urine tests to check for urinary tract infection.

            Ultrasound-This test uses high-frequency sound waves to create accurate pictures of structures inside your body. This procedure is very useful for finding lumps or cysts in the uterus, ovaries or fallopian tubes.

            Other imaging tests-Your doctor may recommend an abdominal X-ray, computed tomography (CT), or magnetic resonance imaging (MRI) to look for abnormal structures or growths.

            Laparoscopy-During this surgery, your doctor makes a small incision in your abdomen and places a thin tube attached to a small camera (laparoscope). A laparoscope allows your doctor to look at your pelvic organs and determine abnormal tissue or signs of infection. This procedure is very useful for detecting endometriosis and chronic pelvic inflammatory disease.

            Prevention

            Pelvic pain is very common and can be associated with menstruation. However, you can reduce your risk of pelvic pain by-

            • Practicing safe intercourse and using condoms and other barrier methods to prevent the transmission of STIs/STDs.

            • Use lubricants while having sexual intercourse to avoid high friction that can lead to pelvic pain.

            • Visit your doctor regularly and discuss any discomfort or other symptoms.

            • Avoiding smoking.

            • Discussing whether oral contraceptives could be an option for you.

            • Go for a more fibrous diet to make sure that excretion of stools remains easy and normal as constipation and applying excessive pressure while defecating can cause severe pelvic pain.

            • Profuse coughing can cause excessive pressure over pelvic muscles that can lead to severe pelvic pain as well as hernia.

            Treatment for Pelvic Pain

            Treatment for pelvic pain varies depending on the cause, intensity of pain, and how often the pain occurs. Sometimes pelvic pain is treated with medications like antispasmodics and painkillers. If the pain is the result of a problem with any of the pelvic organs, treatment may include surgery or other procedures. Physiotherapy can help if there is simple muscle stretch.

            Home Remedies for Pelvic Pain

            Pelvic pain is often treated with over-the-counter pain relievers, but be sure to consult your doctor before taking any medication.

            In some cases, rest can help. For others, gentle movement and light exercise are more beneficial. Try these tips:

            • Place a bottle of hot water on your abdomen to see if it helps relieve cramps, or take a warm bath.

            • Lift your legs. This can help relieve pelvic pain and pain affecting the lower back or thighs.

            • Try yoga, prenatal yoga, and meditation, which can also help with pain.

            • Take herbs such as willow bark, which can help relieve pain.

            Get your doctor's approval before trying the aboveduring pregnancy.

            When to see a doctor?

            Normal pelvic pain may not be a cause for concern. If the pain is severe or lasts more than a week, make an appointment with your doctor.

            You should see a doctor if you experience-

            • Blood in urine

            • Urine with an unpleasant smell

            • Difficulty urinating

            • Inability in bowel movement

            • Bleeding between periods

            • Fever

            • Chills

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            Heel Spurs: Symptoms, Causes and Home Remedies

            Posted 14 June, 2022

            Heel Spurs: Symptoms, Causes and Home Remedies

            Heel spurs (calcaneal spurs) are bony bumps (protrusions) of calcium deposits that form on the heel bone. They are often the result of long-term stress on the tendons that attach to the heel bone. The bumps often occur as a result of Achilles tendinopathy and plantar fasciitis, as the associated tendon attached to the heel bone repeatedly pulls on the bone. This causes micro-injury and the body tries to heal itself by growing abnormal bone growth and turns into calcified bumps known as heel spurs.

            Symptoms of Heel Spurs

            Common symptoms associated with this condition include-

            • Pain in the heel of one or both feet. The pain can be sharp, throbbing, or dull.

            • Pain while walking barefoot or having difficulty in walking.

            • Feeling of a small bony swelling at the bottom or back of the heel.

            • Tenderness.

            • Stiffness in the joints of the feet and ankles.

            • Pain while working or doing any activity.

            • Numbness, burning, and tingling when the nerves are affected by the spur.

            • Limited range of motion and mobility in the joints.

            Causes of Heel Spurs

            Heel spurs occur due to overuse or overtraining. This training puts extra stress on the muscles and ligaments around the heel and ankle, ultimately putting undue pressure on the heel bone and causing these spurs.

            The most common causes of heel spurs include-

            • Overuse and overtraining.

            • Inadequately worn shoes and high heels.

            • Low levels of strength, mobility, and flexibility in the legs.

            • Muscle dysfunction.

            • Stiff legs with poor mobility and flexibility, not enough to absorb shock.

            • Excessive pronation of the ankles and feet.

            • Leg length difference.

            • Knocked knees.

            • Abnormal walking and running patterns.

            • Achilles tendinopathy and plantar fasciitis.

            Risk Factors of Heel Spurs

            If you have plantar fasciitis or Achilles tendinitis for more than 6-8 weeks, you are at increased risk of developing heel spurs.

            There are certain groups of people who are more likely to develop heel spurs than others. These include-

            • Women who wear high heels can shorten the Achilles tendon over time.

            • Older people, as the flexibility of the plantar fascia decreases over time and the heel’s protective fat pad, which helps soften and protect the heel bone, also thinns.

            • Active runners, jumpers and joggers, as the heel bone experiences more stress during exercise, especially if you train on a hard surface for years.

            What if I ignore my Heel Spurs?

            It is important to pay attention to the cause of heel pain. If you ignore this pain for too long, you could end up in a severe condition or you may need surgery. You will also have a long recovery period that can prevent you from exercising and completing daily activities.

            Prevention

            There are a number of factors that you can follow to reduce your risk of developing heel spurs-

            • Wear shoes with soft and shock-absorbing soles that fit well.

            • Choose the right shoes for daily activities.

            • Warm up and stretch before exercising or doing activities.

            • Do not press on heel pain as this can cause long term problems. If you are in pain, rest and freeze the area and see a podiatrist if the pain persists.

            Diagnosis for Heel Spurs

            Heel spurs are not always painful and are not always visible to the naked eye. Sometimes heel spurs have no symptoms, the only way to tell if you have heel spurs is with an X-ray or another foot or ankle injury diagnosis.

            Treatment for Heel Spurs

            When podiatrists formulate a treatment for heel spurs, they try to reduce inflammation and irritation while preventing future injury. Here are some options for non-surgical treatment-

            • Ice or cold compress.

            • Night splints.

            • Cortisone injection.

            • Protective boots.

            • Anti-inflammatory and analgesic drugs.

            • Custom orthotics.

            • Rest.

            • Stretching.

            • Physical therapy.

            • Shoes for heel spurs.

            Podiatrists always seek conservative treatment options for your heel pain. However, in certain cases surgery may be needed to remove the heel spur or relax the plantar fascia.

            Home Remedies for Heel Spurs

            Epsom Salt Bath-

            Epsom salt is also called magnesium sulphate and is a helpful remedy in heel spurs. Magnesium is mostly stored in the bones of our body. For this, sprinkle some epsom salt in water and dip your feet in it. You can also gently massage your heels to get relief in heel spurs.

            Essential oils-

            Pure essential oils like rosemary or lavender are beneficial in reducing the pain and even coconut and olive oil are helpful due to their anti-inflammatory properties. Coconut oil also acts as a natural moisturizer that softens the heels.

            Apple cider vinegar-

            Apple cider vinegar can cure any pain related to skin problems. It is known to remove excess calcium from the bones and brings relief. For this, soak your feet in a warm bath with a few drops of apple cider vinegar.

            Baking soda-

            Baking soda is effective in reducing the heel pain. It also makes the skin brighter. For this, make a paste by mixing half a teaspoon of baking soda in water and apply it to your heels.

            Flaxseed oil-

            Flaxseed oil is rich in alpha-linolenic acid (a form of omega-3 fatty acid) that fights inflammation. For this, pour some flaxseedoil in warm water and soak a towel in it. Wrap a towel around your heels and place a heating pad over it. Leave it for at least an hour and avoid moving during this time.

            When to see a doctor?

            See your doctor or podiatrist right away if you have-

            • Severe pain and swelling near the heel, unable to bend your foot downward or walk normally.

            • Heel pain accompanied by fever, tingling or numbness in the heel.

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            Hand Pain: Know its Causes and Treatment

            Posted 03 June, 2022

            Hand Pain: Know its Causes and Treatment

            Hand is made up of muscles, bones, blood vessels, nerves and skin. Muscles provide movement while the nerves control sensation and movement of the hand. The blood vessels provide constant blood flow to and from the fingertips throughout the hand.

            Hand pain Hand pain may be described as throbbing, tingling, numbness, soreness, or stiffness including any kind of discomfort in the tissues or joints of the hands. A burning or tingling sensation in the hands is often called paresthesias. Paresthesias are caused by temporary or permanent damage or pressure on the nerves that carry sensation messages from the hands to the spinal cord.

            Causes of Hand Pain

            Arthritis-

            Arthritis is the main cause of hand pain. It can appear anywhere in the body but is often found in the hands and wrists.

            Osteoarthritis usually affects older people. Joint cartilage is a slippery tissue that covers the ends of bones and allows joints to move smoothly. When reduced, painful symptoms may develop.

            Rheumatoid arthritis is a chronic condition that can affect many parts of the body. This causes inflammation in the joints, which leads to pain and stiffness. It often starts in the hands and affects the same joints on both sides of your body.Carpal tunnel syndrome-

            Carpal tunnel is a narrow canal made of ligaments and bone located at the base of the arm. It contains the median nerve and tendon which is responsible for finger movement.

            Carpal tunnel syndrome can be caused by irritated tendon thickening, inflammation, or anything that can cause swelling in the area.

            Symptoms of carpal tunnel syndrome begin gradually and can worsen if not treated. Signs include frequent burning and itching in the palms and fingers. Pain is felt around the thumb, index and middle finger.

            De Quervain's Tenosynovitis-

            De Quervain's tenosynovitis is a painful condition that affects the tendons around the thumb. Swelling of the two tendons around the base of your thumb causes inflammation in the area. This inflammation puts pressure on nerves, causing pain and tingling around the base of the thumb.

            Gout-

            Gout, a complex form of arthritis, is a very painful disease that can affect anyone. People with gout experience attacks of joint pain that are sudden and severe. Gout mostly affects the joint at the base of the big toe, but it can occur anywhere in the feet, knees, arms, and wrists.

            When you have gout in your hands, you experience attacks of biting type pain, burning, redness, and tenderness. Gout often wakes up people at night. You can feel your hands burning.

            Lupus-

            Lupus is an autoimmune disease, meaning that your immune system mistakenly attacks healthy cells and damages healthy tissue. Joint pain and stiffness are the first signs of lupus.

            When lupus breaks out, inflammation occurs throughout the body. This inflammation causes the thin lining around the joints to thicken, resulting in pain and swelling in the hands and feet.

            Traumatic Injury-

            Hand injuries are very common during sports, construction, and falls. Hand fractures can heal poorly if not treated properly. Fractures that don't heal properly can permanently change the structure and performance of the hand.

            Peripheral Neuropathy-

            Peripheral neuropathy is a disease that causes weakness, pain, and numbness in the hands. Peripheral neuropathy happens when the peripheral nerves are damaged.

            Several factors can cause peripheral nerve damage, including diabetes, traumatic injury, infection, and metabolic problems.

            Treatment for Hand Pain

            The treatment of hand pain is based on the cause of the pain. Therefore, treating the cause helps to relieve the pain in the hand.

            Common treatments for arthritis include-

            • Medicines to treat signs of pain and swelling.
            • Long-term anesthesia or steroid injections.
            • Joint splint.
            • Surgery.
            • Occupational therapy / physiotherapy methods.
            • Hot compressors.

            Common treatments for carpal tunnel syndrome include-

            • Splint.
            • Avoid uncomfortable activities.
            • Use ice or an ice pack.
            • Over-the-counter (OTC) pain relievers.
            • Receiving injections of anesthetics or steroids.
            • Take oral steroids.
            • Exercise and stretching.
            • Acupuncture.
            • Surgery.

            Common treatments for De Quervain's tenosynovitis include-

            • Splint.
            • Apply ice or cold compress.
            • Taking over-the-counter pain relievers, such as ibuprofen or aspirin.
            • Avoid painful areas and pinching movements.
            • Doing physical therapy or occupational therapy.
            • Surgery.

            Common treatments for Gout include-

            Several medications are available to treat painful gout attacks, including nonsteroidal anti-inflammatory drugs (NSAIDs) and colchicine and along with medicines one can go for hot oil massage(medicated) or compressors.

            Common treatments for lupus include-

            There is no cure for lupus, but there are many treatments that can help you manage the symptoms. These are-

            • Hot or cold compress.
            • Over-the-counter pain relievers.
            • NSAID.
            • Physiotherapy or occupational therapy.
            • Avoid painful activities.
            • Peripheral Neuropathy.

            Common treatments for peripheral neuropathy include-

            • Prescription drugs used to treat nerve pain.
            • Over-the-counter pain relievers.
            • Prescription painkillers.
            • Anti- epileptic  medication.
            • Antidepressants.

            Home remedies for Hand Pain

            Turmeric-

            Turmeric is an effective anti-inflammatory. You can take turmeric milk or simply take a turmeric supplement.

            Sunlight-

            Try getting sunlight to help your body produce vitamin D as it protects your joints from osteoarthritis damage.

            Green tea-

            Drinking 3 to 4 cups of green tea daily is very effective in fighting arthritis and reduces hand pain due to its antioxidant and anti-inflammatory properties.

            Swimming-

            Swimming is a low-impact form of resistance training that engages the entire body. It is a soothing way to improve your health and reduce pain.

            Hot and cold compress-

            Taking hot and cold compresses is an effective way to relieve pain in your hand (depending on the type of pain in your hand).

            Massage-

            Try massaging the painful area and the muscles around it. Sometimes massaging your arm or hands can help relieve pain.

            When to visit a doctor?

            You should immediately see a doctor if-

            • You experience severe, persistent, or recurring pain in your hand.
            • Pain doesn’t improve with home treatment.
            • It occurs with other symptoms, such as arm pain, fever, or fatigue.
            • If there is any loss of movement in any of the affected joints.
            • If there are some boney deformations like abnormal nodular growth or abnormal permanent bending there.
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            Leg pain: Types, Causes, Symptoms and Home remedies

            Posted 12 April, 2022

            Leg pain: Types, Causes, Symptoms and Home remedies

            Our legs help the body bear the weight of the whole body. Carrying out daily activities such as working while standing for long hours causes leg pain. Sometimes this pain increases so much that it is very difficult to bear. Usually, the main cause of leg pain is muscle fatigue. Due to the lack of nutrients in the body, the problem of foot pain begins.

            Leg pain means that there is tension, pressure and numbness in the leg muscles that makes it difficult for a person to move.

            Types of leg pain

            Neurological Pain-

            Leg pain due to any damage related to the nervous system is known as neurological pain. In addition, leg pain is caused by damage to the sciatic nerve (the longest nerve in the body that runs through the spine to the legs) and other nerves.

            Vascular Pain-

            Vascular pain is a type of pain caused by deep vein thrombosis (DVT-blood clots in veins) and peripheral artery disease (blockage of blood flow due to varicose veins). Leg pain due to arterial problems is also of this type.

            Musculoskeletal Pain-

            Musculoskeletal pain is a type of pain caused by problems related to  the muscles, joints, bones and ligaments (tissues that connect two bones).

            The following conditions arise in musculoskeletal pain;

            • Stiffness of muscles due to excessive pressure or tension.
            • Muscles swelling due to deep injury.
            • Problems related to joint pain.
            • Bone fractures or bone diseases such as osteoporosis (fragility of bones).

            Causes of Leg pain

            • Due to shin splints (overuse of the outer part of the lower leg bone).
            • The hairline fracture in the bone.
            • Taking diuretics or cholesterol-lowering drugs.
            • Muscle damage caused by injury.
            • Deficiency of calcium, potassium, sodium and magnesium in the blood.
            • Having dehydration
            • Due to muscle fatigue or tension due to excessive exercise or sitting in one place.

            Other causes of Leg pain

            • Inflammation in the joints caused by arthritis
            • Cellulitis (infection of the skin and soft tissues)
            • Peripheral artery disease (a disorder related to blood flow to the legs)
            • Blood clotting due to prolonged bed rest
            • Due to varicose veins ( enlarged veins)
            • Osteomyelitis (infection of the bones)
            • Due to nerve damage (common in diabetics and those who use alcohol and cigarettes)

            Symptoms of Legpain

            • Pain while walking, standing, moving and at rest
            • Prickling in the affected area
            • Swelling of feet
            • Muscle cramps
            • Burning sensation in the affected area
            • Stiffness in the body
            • Discomfort and pain in moving the legs
            • Difficulty sitting in the toilet
            • Stinging feeling in the affected area

            Home remedies for Leg pain

            Rock salt-

            Rock salt works by regulating nerve signals and relaxing muscles. To do this, take warm water in a bucket and add one to two teaspoons of rock salt. Now keep the legs in this water for some time. By doing this you will get relief in leg pain.

            Mustard oil-

            Leg pain starts when the muscles are tense or tired. In such a situation, massaging the leg proves to be a comfortable option which gives instant effect. Mustard oil can be used for massage directly or by cooking oregano and garlic in it.

            Turmeric-

            Turmeric is rich in many medicinal properties. Therefore, mixing one spoon of turmeric powder in a glass of milk and drinking it in the morning and evening provides relief in leg and knee pain. Apart from this, mixing two spoons of turmeric in sesame oil and applying the prepared paste on the leg for half an hour also provides relief in pain. This also strengthens the bones.

            Clove-

            Clove is very beneficial in tooth and gum pain as well as knee and leg pain. For this, massage the leg lightly with clove powder or clove oil on the painful area.

            Fenugreek-

            The use of fenugreek seeds is effective for the pain of knees and legs. It is analgesic and anti-inflammatory in nature. Therefore, after eating half to one spoonful of fenugreek powder in the morning and evening, it provides relief in the pain of knees and feet.

            Eucalyptusoil-

            Eucalyptus oil helps in reducing neuralgia. Smelling this oil or mixing it with any other oil provides relief in leg pain.

            Ice pack-

            Leg pain can also be relieved by the use of ice. To use, take 2-3 pieces of ice in a cloth. Now massaging the legs with this bundle gives relief in pain.

            Exercising-

            According to research conducted by NCBI, breathing exercises help in getting rid of pain in hands, legs and nerves.

            When to go to the doctor?

            According to experts, use home remedies for pain in legs and knees. But if the problem and pain persists and there is no proper benefit from them, go to the doctor without any delay. Apart from this, if the pain is due to fracture or if the pain is accompanied by swelling, redness, warmth, fever and weight loss, then see an orthopedic doctor immediately.

             

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            Skin disease

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            Causes, Symptoms and Treatment methods of Rabies

            Posted 02 July, 2022

            Causes, Symptoms and Treatment methods of Rabies

            Rabies is a viral disease, treatment should not be delayed at all because doing so increases the risk of further spread. Rabies is transmitted to humans through bites or scratches from infected animals. It is generally believed that rabies is only caused by dog ​​bites but this is not the case.

            Rabies virus can be found in the saliva of any warm-blooded animal. This virus is found especially in animals like dogs, cats, monkeys, bats etc. Apart from biting and scratching these animals, this virus can also affect the central nervous system by reaching the human body on licking due to which the body gets traumatized gradually. Rabies is called Jalantak and Alark in Hindi. Let's talk about how rabies affects a person and what are its symptoms, causes and home remedies.

            What are the Causes of Rabies?

            Rabies is caused by the Lisa virus. It is mainly a disease of animals which spreads from infected animals to humans. This virus lives in the saliva of infected animals and when these infected animals (especially dogs or bats) bite humans, the virus enters the human body. Apart from this, even if the saliva of an infected animal comes in contact with the human eye, mouth, nose or any wound on the body, the rabies virus starts growing in humans which affects the salivary glands and nervous system of humans.

            What are the symptoms of Rabies?

            Most symptoms of rabies take several years to appear but the initial symptoms begin to appear within 1 to 3 months after a bite or scratch from an infected animal. The initial symptom of rabies is feeling of tingling in the muscles of the area where the animal bites or scratches. After this the virus starts reaching the brain through the nerves in the body which causes the following symptoms:-

            • Constant headache.
            • Frequent fever.
            • Feeling exhausted.
            • Stiffness and pain in muscles and joints.
            • Irritability and fiery temper.
            • Constant disturbance.
            • Strange thoughts come to mind.
            • Loss of appetite.
            • Bad taste in mouth.
            • Excessive production of saliva and tears.
            • Irritation from bright light and sound.
            • Difficulty speaking.
            • Abnormal change in behavior.

            When the infection increases, then the following symptoms start to appear:-

            • Multiple vision.
            • Difficulty moving the muscles of the mouth.
            • Excessive production of saliva and foam in the mouth.
            • Appearance of paranoid symptoms in the victim.

            How to prevent or control Rabies?

            • Pets Vaccination: Animals such as dogs, cats and monkeys should be vaccinated against rabies.
            • Limit pet outings: Keeping pets indoors and supervising them when going out helps to avoid the pets coming in contact with wild animals.
            • Keep small pets safe: Small pets such as rabbits cannot be vaccinated against rabies. So keep these animals indoors and away from wild animals.
            • Report wild animals: Report feral dogs and cats to your local animal control authorities.
            • Do not contact with wild animals: Stay away from any animal that appears to be suffering from any kind of disease.
            • Rabies vaccination: Get vaccinated when traveling to a country or state where the risk of rabies is high or take the advice of your doctor.

            Home remedies of Rabies

            • Tetanus injection: This is usually a simple and early treatment for rabies. In case of an animal bite or confirmation of rabies, a tetanus injection should be administered within 24 hours to control the infection.
            • Lukewarm water: In case of any animal bite and its saliva getting on the body, wash the affected area thoroughly with lukewarm water. This helps to remove the virus to a great extent.
            • Kiwi fruit: Kiwi fruit proves to be effective in rabies disease because vitamin C is found in this fruit, which is beneficial in rabies. For this, two to three kiwis should be consumed daily.
            • Cumin: Cumin also proves to be very effective when bitten by a dog or other animal. For this, grind two tablespoons cumin and twenty black peppercorns, mix light water in it and make a paste and apply on the affected area. Doing this helps the wound to heal faster.
            • Lavender: Lavender has antiseptic properties which proves beneficial in any type of wound. Infection can also be avoided by applying a paste of lavender on the bitten part.
            • Water and soap: First of all wash the affected area thoroughly with water and soap after coming in contact with an animal suffering from any type of disease. Apart from this, after washing the wound with soap and water, contact the doctor immediately if the animal has bitten and scratched, without delay.
            • Vitamin: Vitamin-rich foods are very beneficial in case of rabies infection. Therefore, consume a good amount of spinach, orange juice, tomato etc.
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            Know the Causes, Symptoms and Diagnosis of Leprosy

            Posted 25 February, 2022

            Know the Causes, Symptoms and Diagnosis of Leprosy

            Infectious diseases should be treated without wasting time. Failure to do so may increase the risk of spreading diseases. One such infectious disease is leprosy which affects the person's skin, eyes, respiratory system and peripheral nerves. It is a disease that spreads through air or breathing which is caused by bacteria called Mycobacterium leprae. This bacterium was discovered in 1873 by a Norwegian physician Gerhard Hansen. It is also called 'Henson's disease' after his name.

            How is Leprosy spread?

            Leprosy is a disease that spreads through bacteria called Leprae present in the air. These bacteria come into the air only from a sick person. It takes about 4 to 5 years for this bacteria to grow in the body of a healthy person. In many cases it takes up to 20 years for the bacteria to grow (incubation). Ignoring the symptoms of leprosy at the primary stage can lead to disability. It is a contagious disease but it does not spread through human touch but staying with an infected person for a long time can cause this infection. If the patient is given medicine regularly, then there is no possibility of infection.

            Causes of Leprosy

            • Weakening of the body's immune system.
            • Lack of nutritious food.
            • Long-term use of contaminated food and beverages.
            • Consuming spicy and oily food.
            • Loss of blood in the body.
            • Consuming drugs.

            Symptoms of Leprosy

            The most important identification of leprosy is that it causes white rashes on the body. These marks are numb i.e., they do not have any kind of sensation. Apart from this, there are some other symptoms as well. These other symptoms are listed below-

            • Change in skin color.
            • Loss of touch, pain and feeling on the skin.
            • Wounds do not heal for weeks and months.
            • Discharge of pus and fluid from the affected part.
            • Continuous bleeding.
            • Gradually wilting and destruction of organs and skin.
            • Muscle weakness.
            • Dry skin.
            • Stuffy and bleeding nose.
            • Ulcers on the soles of the feet.

            Types of Leprosy

            It is mainly of three types, which are as follows-

            Tuberculoid Leprosy-

            Tuberculoid Leprosy, also known as paucibacillary leprosy is a mild and less severe form of leprosy in which a person has only a few patches of pale and flat colored skin. The affected area of skin may have absence of sensation because of nerve damage. Tuberculoid leprosy is usually less contagious than the other forms of leprosy.

            Lepromatous Leprosy-

            Lepromatous Leprosy, also known as multibacillary leprosy, is a more severe form in which there are skin bumps and rashes on the whole-body including numbness and muscle weakness. It may also affect the nose, kidneys, and reproductive organs in men.

            Borderline Leprosy-

            This is a mixed form in which the symptoms of both the tuberculoid and lepromatous leprosy exist.

             

            Ways to avoid Leprosy

            • Avoid coming in contact with a person infected with leprosy.
            • Keep yourself clean to avoid any kind of infection.
            • Eat nutritious food like pulses, gram, milk, green vegetables, and fruits which keeps the immunity of the body strong.
            • Do not take astringent things like potato, brinjal, lentils, red chili, kachalu, meat-fish etc.
            • To avoid leprosy, get the Bacillus Calmette-Guerin vaccine.

             

            Home remedies for Leprosy

            • Taking bath after boiling neem leaves in water and grinding neem leaves in cow's milk and applying it on the infected area cures leprosy. Apart from this, sleeping under neem leaves is very beneficial for leprosy patients.
            • Taking the juice of henna leaves containing honey every morning purifies the blood. It is beneficial in skin diseases i.e., leprosy.
            • Taking Chaulmoogra oil regularly with hot milk is beneficial.
            • Mixing equal quantities of neem and chaulmoogra oil and applying it on the affected part cures skin diseases within a few days.
            • Leprosy is destroyed by regular consumption of decoction (Kwath) made from Vijayasar wood.
            • Grinding the leaves of Nirgundi and mixing it with water, taking it on an empty stomach in the morning is beneficial. Apart from this, applying the paste of its leaves on the affected area cures skin diseases.
            • Taking the powder made from the bark of Champa thrice a day helps in all types of skin disorders.
            • Taking equal quantities of amla and neem leaves with honey is beneficial in leprosy.
            • Grinding the bark of Aak root with vinegar and applying it on the affected part is beneficial in leprosy.

             

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            साइनसाइटिस के कारण, लक्षण और घरेलू उपचार

            Posted 24 May, 2022

            साइनसाइटिस के कारण, लक्षण और घरेलू उपचार

            सर्दी लगना, सिरदर्द होना आमतौर पर कोई बड़ी समस्या नहीं है। लेकिन कभी-कभी यह समस्या किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकती है। इसमें से एक साइनसाइटिस भी है जो एक गंभीर समस्या की श्रेणी में आता है। साइनसाइटिस की समस्या कई कारणों से होती है जैसे- साइनस में संक्रमण, प्रदूषण, एलर्जी, सर्दी लगना और बैक्टीरिया संक्रमण आदि।

            साइनसाइटिस या साइनस क्या है?

            नाक के आसपास चेहरे की हड्डियों के अंदर हवा से भरी छोटी-छोटी गुहा रूपी संरचनाएं होती हैं। जिसे 'वायुविवर' या साइनस (sinus) कहते हैं। साइनस पर उसी श्लेष्मा झिल्ली की परत होती है। जब किसी व्यक्ति को जुकाम या एलर्जी होता है तो साइनस ऊतक यानी श्लेष्मा झिल्ली में सूजन आ जाती हैं। इस स्थिति को साइनसाइटिस कहा जाता है। यह सूजन किसी संक्रमण के कारण होती है। जो आम सर्दी-जुकाम के रूप में शुरू होता है। उसके बाद एक बैक्टीरियल, वायरल एवं फंगल इंफेक्शन के रूप में पूरी तरह से विकसित हो जाता है। जिससे व्यक्ति को सिरदर्द, चेहरे में दर्द और नाक बंद जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

            साइनस के प्रकार-

            वायुविवरशोथ यानी साइनस रोग को संक्रमण की  अवधि के आधार पर वर्गीकृत किया गया है,जो निम्नलिखित हैं :

            तीव्र साइनस संक्रमण(Acute sinus infection)-   

            साइनस का यह प्रकार सबसे कम अवधि वाला होता है। आमतौर पर यह संक्रमण वायरल इंफेक्शन की वजह से होता है। जो 3 से 4 हफ्तों तक या उससे कम समय तक ही रहता है।

            कम तीव्र साइनस संक्रमण(Sub sinus infection)-

            साइनस के इस प्रकार के लक्षण 3 महीने तक रहते हैं। इस प्रकार के संक्रमण होने की मुख्य वजह बैक्टीरियल इंफेक्शन या मौसमी एलर्जी होती है।

            क्रॉनिक साइनस संक्रमण(Chronic sinus infection)-

            साइनस का यह प्रकार लंबे समय तक रहता है। आमतौर पर क्रॉनिक साइनस के लक्षण लगभग 12 हफ्तों अर्थात 3 महीने तक रहते हैं। इसका मुख्य कारण एलर्जी, इंफेक्शन, म्यूकस एवं सूजन से होता है। 

            रिकरंट एक्यूट साइनसाइटिस(Recurrent acute sinusitis)-

            साइनस का यह प्रकार बार-बार होता है। यह संक्रमण एक साल में करीब 4 से 5 बार हो सकता है। साथ ही इसके लक्षण हर बार कम से कम 1 हफ्तों तक रहते हैं। बार-बार होने के कारण इसे रिकरंट एक्यूट साइनसाइटिस कहा जाता है।

            साइनस के सामान्य लक्षण-

            •  बार-बार नाक बहना।
            • नाक बंद हो जाना। 
            • सांस लेने में तकलीफ होना।
            • गंध एवं स्वाद का पता न चलना।
            • नाक, आंख, गला, सिर के आसपास सूजन एवं दर्द का आभास होना।

            साइनस के अन्य लक्षण-

            • कान दर्द होना।
            • दातों और ऊपरी जबड़ों की सतह पर दर्द महसूस करना।
            • गले में खराश होना।
            • रात में खांसी का बढ़ना।
            • सांसों से दुर्गंध आना।
            • थकान या कमजोरी महसूस करना।
            • जी मिचलाना।
            • चिड़चिड़ापन महसूस करना।

            साइनस होने के कारण-

            • सर्दी-जुकाम का होना।
            • वायरस, फंगस एवं बैक्टीरिया संक्रमण का होना।
            • नाक में एलर्जी होना।
            • प्रदूषित वातावरण का होना।
            • रासायनिक धुआं एवं धूल के संपर्क में आना।
            • जानवरों के संपर्क में आना।
            • नाक की हड्डी का नुकीले आकार में बढ़ना।

            साइनस होने पर बरतें यह सावधानियां-

            • अच्छे से आराम करें।
            • धूम्रपान करने से बचें।
            • खूब पानी पिएं।
            • प्रचुर मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन करें।
            • गुनगुने फेसियल पैक का उपयोग करें।
            • नियमित रूप से भाप लेते रहें।
            • धूल- मिट्टी जैसी जगहों पर जाने से बचें।
            • चिंता, तनाव और अवसाद से दूर रहें। 
            • भोजन करने से पूर्व हाथों को अच्छी तरह से धोएं।
            • छींकने, खांसने के बाद या शौचालय से आने के बाद हाथों को अच्छी तरह से धोएं।
            • संक्रमित एवं प्रदूषित वातावरण में जाने से बचें।

            साइनस के घरेलू उपाय-

            एसेंशियल ऑयल-

            साइनस होने पर एसेंशियल ऑयल का उपयोग अरोमा थेरेपी के रूप में करना लाभदायक होता है। यह थेरेपी साइनस रोग में होने वाली सूजन और बैक्टीरिया को नष्ट करने में मदद करती है। इसके लिए तुलसी, पेपरमिंट, गुलमेहंदी, यूकलिप्टस,लोबान या इनमें  भी एसेंशियल ऑयल की 2 से 3 बूंदों को डिफ्यूजर में डालकर इसकी खुशबू को सूंघें। ऐसा करने साइनस में होने वाले सूजन से राहत मिलती है। इसके अलावा इसकी कुछ बूंदों को हाथों में लेकर नाक और सिर की हल्के हाथों से मसाज करने से भी लाभ मिलता है।

            सेब का सिरका-

            सेब का सिरका साइनस में होने वाले भारीपन के लिए अच्छी दवाओं में से एक है। क्योंकि इसमें एसिटिक एसिड होता है जिसमें एंटीमाइक्रोबियल होता है, जो बैक्टीरिया और वायरस संक्रमण से लड़ता है। इसके लिए एक चम्मच एप्पल साइड विनेगर को गर्म पानी में डालकर भाप लेने से आराम पहुंचता है।  

            लेमन बाम-

            लेमन बाम साइनस के इलाज में कारगर उपाय माना जाता है। दरअसल इसमें एनाल्जेसिक गुण पाया जाता है। जो साइनस के कारण होने वाले सिरदर्द से राहत दिलाने का काम करता है। इसके लिए लेमन बाम के तेल को हाथ में लेकर सिर,नाक और गले की मसाज करें। इसके अलावा लेमन बाम की कुछ पत्तियों को पानी में उबालकर काढ़े के रूप में इस्तेमाल करना भी फायदेमंद होता है।  

            टी एवं हर्बल टी-

            साइनस होने पर शहद युक्त चाय या हर्बल टी साइनस के लिए अच्छे घरेलू उपचारों में से एक है। क्योंकि यह साइनस के लक्षणों को कम करने में मदद करती है। इसलिए साइनस होने पर यह चाय कारगर साबित होती है।

            अदरक चाय-

            अदरक में एनाल्जेसिक और एंटी बैक्टीरियल गुण पाया जाता है। जो सूजन और दर्द को दूर करता है। इसलिए शहद युक्त अदरक चाय या किसी भी रूप में अदरक का इस्तेमाल करना साइनस के लिए फायदेमंद होता है।

            लहसुन-

             लहसुन में एंटी-बैक्टीरियल गुण मौजूद होते हैं। जो साइनस के लक्षणों को दूर करने में मदद करते हैं। इसके लिए लहसुन की 4 से 5 कलियों को पीसकर गर्म पानी में डालकर सूप बना लें। हल्का गुनगुना होने पर इस सूप को पिएं। इससे साइनस में आराम मिलता है। इसके अलावा लहसुन की 2 से 3 कलियों को अपने दातों के बीच रखकर इसका रस चूसने से फायदा होता है। 

            टी ट्री ऑयल-

            टी ट्री ऑयल में एंटीसेप्टिक, एंटी माइक्रोबियल एवं एंटी इंफ्लेमेंटरी गुण पाए जाते हैं। जो साइनस की वजह से होने वाले सिरदर्द को दूर करता है। इसके लिए टी ट्री ऑयल की 4 से 5 बूंदों को गरम पानी में डालकर भाप लें। ऐसा दिन में दो से तीन बार करने से राहत मिलती है।

            दालचीनी-

            दालचीनी साइनस के उपचार में प्रभावी होती है। यह साइनस पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों को नष्ट करती है। इसके लिए एक गिलास गर्म पानी में एक छोटा चम्मच दालचीनी चूर्ण को मिलाकर सेवन करें। ऐसा कुछ दिनों तक करने से राहत मिलता है।

            मेथी दाना-

            साइनस के इलाज में मेथी दाना भी कारगर होती है। इसके लिए मेथी के दानें को पानी में उबालें। उसके बाद उस मिश्रण को छानकर चाय की तरह दिन में दो से तीन बार पिएं। ऐसा नियमित रूप से कुछ दिनों तक करने से साइनस से छुटकारा मिलती है।

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            What is Cerebral Malaria? Know its Symptoms, Causes and Remedies

            Posted 17 March, 2022

            What is Cerebral Malaria? Know its Symptoms, Causes and Remedies

            Cerebral Malaria is the most dangerous and deadly form of malarial fever that affects the brain. If malaria parasites reach the brain, they prove to be very fatal. This condition is called cerebral malaria or meningitis. According to the WHO (World Health Organization), there are five types of malaria parasites. The most deadly of these is falciparum malaria. If this parasite reaches the brain through blood circulation, then it can have fatal consequences. It is the most serious neurological complication caused by Plasmodium falciparum (a protozoan parasite). Plasmodium is transmitted to the human body through the bite of an infected mosquito. Patients suffering from this have neurological (nervous system), memory loss and behavioral difficulties. Apart from this, cerebral malaria is one of the main causes of neurological disability and epilepsy in children. However, it is not yet known how the parasite of blood vessels becomes lethal to the brain. Falciparum malaria is a leading cause of neuro-disability and death in tropical countries. Many children around the world are affected by it.

             

            In cerebral malaria, fluid leaks from the brain of the infected person and the person slips into coma. It infects more than 575,000 people every year out of which 20 percent of people die and 80 percent of the survivors develop long-term neurodevelopmental symptoms including seizures and mental disorders. It affects young children more.

             

            Symptoms of Cerebral Malaria

            The symptoms of cerebral malaria are few that are common in both children and adults, such as-

             
            • Loss of consciousness.
            • Impulse and neurological abnormalities.
            • Coma (which can last up to three days)
            • Persistent orthostatic hypotension freezing.
            • Muscle pain.
            • Low blood pressure.
            • Mild jaundice.
            • Enlargement of liver and spleen.
            • Kidney damage.
            • Blood in urine.
            • Increase in intracranial pressure.
            • Confusion and seizures.
            • Increase in respiratory rate.

            The symptoms usually occur in three stages:

            Cooling stage:

            It can last for 1-2 hours.

             

            Hot stage:

            It is characterized by headache, vomiting and seizures in young children and high fever up to 107°F. It can last for 3-4 hours.

             

            Sweat phase:

            It causes sweating and fatigue. This phase can last for 2-4 hours.

             

            Causes of Cerebral Malaria

            Malaria is caused by a type of parasite which is called plasmodium. There are several types of plasmodium parasites but only five of these parasites cause malaria in humans. Plasmodium parasites are mainly transmitted by female Anopheles mosquitoes. They bite mainly at dusk and at night. When an infected mosquito bites a human, it spreads the parasite into the bloodstream and as soon as it reaches the brain, the person becomes a victim of cerebral malaria.

             

            Measures to Prevent Cerebral Malaria

            • Use a mosquito net while sleeping.
            • Do not use mosquito repellent coils in a closed room.
            • Do not allow water to accumulate in the house.
            • If there is standing water somewhere around, then spread it or put oil in it so that mosquitoes do not breed in it.
            • Consult a doctor if there is even a slight fever.

            Treatment of Cerebral malaria

            There are many medicines available in the market for Cerebral Malaria but do not take any medicine without the doctor's advice because taking medicine without the advice of a doctor can cause serious harm to health.

             
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            जानें, फंगल इंफेक्शन कारण, लक्षण और निदान

            Posted 24 May, 2022

            जानें, फंगल इंफेक्शन कारण, लक्षण और निदान

            फंगल इंफेक्शन एक प्रकार की त्वचा संबंधी बीमारी होती है। जो शरीर के किसी भी हिस्से जैसे उंगलियों के बीच में, सिर पर, हाथों पर, बालों में, मुंह में या शरीर के गुप्तांगों में आसानी से हो सकता है। इसका मुख्य कारण किसी संक्रमित वस्तु या संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आना होता है। जब फंगस (कवक) शरीर के किसी क्षेत्र में आक्रमण करते हैं तो कुछ समय में ही वहां की त्वचा पर लाल धब्बे, दाद, त्वचा पर घाव और खुजली जैसे लक्षण दिखाई देने लगते है।

             

            फंगल इंफेक्शन क्या है और कैसे फैलता हैं?

            आस पास के वातावरण में कई तरह के फंगस विद्यमान रहते हैं। यह रोगाणुओं की तरह ही होते हैं। यह कवक (फंगस) हवा, पानी, मिट्टी आदि स्थानों पर विकसित एवं पर्यावरण के प्रभाव के कारण निरंतर बढ़ते हैं। वहीं कवक मानव शरीर में भी रहते हैं। जो शरीर को बिना नुकसान पहुंचाए बने रहते हैं। मशरूम, मोल्ड, फफूंदी आदि इसके उदाहरण है। इसके अलावा कुछ फंगस शरीर के लिए हानिकारक भी होते हैं। यही हानिकारक फंगस जब शरीर पर आक्रमण  करते हैं तो उन्हें खत्म करना मुश्किल होता है। क्योंकि वह हर तरह के वातावरण में जीवित रहने में सक्षम होते हैं। परिणामस्वरूप शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इनसे लड़ने में कमजोर पड़ने लगती है। जिससे व्यक्ति फंगल इंफेक्शन से संक्रमित हो जाता है।

             

            फंगल इन्फेक्शन के प्रकार और उनके लक्षण-

            फंगल इंफेक्शन की सबसे अहम पहचान है, इससे शरीर के प्रभावित पर लाल रंग के धब्बे, दरारे, रैशेज, त्वचा में पपड़ी का जमना, खाल का झड़ना या सफ़ेद रंग के चूर्ण जैसे पदार्थ निकलने लगता है। इसके अलावा भी कुछ अन्य लक्षण होते हैं। जो फंगल इंफेक्शन के प्रकार पर आधारित होते हैं। आइए बात करते हैं फंगल इंफेक्शन के प्रकार एवं अन्य लक्षणों के बारे में;

             

            एथलीट्स फुट-

            यह पैरों में होने वाले संक्रमण है। जो पैरों के उंगलियों के बीच में होता है। यह कवक गरम एवं नम वातावरण में पनपते हैं। वहीं, मुख्य रूप से जूते, स्विमिंग पूल और सार्वजनिक नमी वाले वातावरण में तेजी से बढ़ते हैं। इसी कारण यह आमतौर पर गर्मियों में और नम जलवायु वाली जगहों पर पाए जाते हैं। इसके अलावा जूते पहनने वाले व्यक्तियों के पैरों में भी एथलीट्स फंगल को देखा जा सकता है। आइए बात करते हैं इनके लक्षणों के बारे में-

             
            • त्वचा का लाल होना या छिल जाना।
            • त्वचा पर खुजली और जलन होना।
            • पैरों के तलवों पर अल्सर होना।
            • घाव का ठीक न होना और लगातार खून का रिसाव होना।
            • प्रभावित अंग से मवाद जैसे द्रव का बहना।

            नेल फंगल इंफेक्शन-

            इस प्रकार का कवक संक्रमण नाखूनों में देखने को मिलता है। जिसे ओनिकों माइकोसिस (onychomycosis) के नाम से जाना जाता है। यह संक्रमण हाथ के नाखूनों के अलावा पैर के नाखूनों में भी हो सकता है।

             

            नेल फंगल संक्रमण के लक्षण-

            • नाखून के रंग में परिवर्तन जैसे पीला, भूरा या सफेद होना।
            • नाखून की परत का मोटा होना।
            • टूटे या फटे हुए नाखूनों का होना।

            फंगल स्किन इंफेक्शन-

            फंगल स्किन इंफेक्शन को सामान्य भाषा में दाद कहा जाता है। इस तरह के फंगल लगभग गोल आकार की होता हैं। इसमें त्वचा लाल रंग के गोलाकार में ऊपर की ओर उठी हुई दिखाई देने लगती है। जिसके कारण इसे रिंगवर्म भी कहा जाता है। इस तरह के कवक संक्रमण होने पर त्वचा पर लाल और खुजलीदार चकत्ते पड़ जाते हैं। यह स्किन इंफेक्शन ज्यादातर हाथों-पैरों, गुप्तांगों और स्कैल्प में होता है। ऐसी मान्यता है कि फंगस की लगभग 40 ऐसी प्रजातियां हैं, जो स्किन इंफेक्शन की वजह होती हैं।

             

            फंगल स्किन इन्फेक्शन होने के लक्षण-

            • त्वचा में तेज खुजली होना।
            • शरीर पर लाल और गोल चकत्तों का पड़ना।
            • पपड़ीदार एवं फटी त्वचा का होना।
            • बाल झड़ना आदि।

            यीस्ट इंफेक्शन-

            यह कैंडिडा एलबिकंस या कैंडिडायसिस फंगस के कारण होता है। यह एक प्रकार का संक्रमण है, जो मुंह, आंत पथ और योनि में पाया जाता है। कैंडिडायसिस संक्रमण ज्यादातर महिलाओं में देखने को मिलता है। जब योनि के अंदर कैंडिडा की संख्या बढ़ने लगती है तो महिलाएं इससे ग्रसित हो जाती है। इस अवस्था में ग्रसित महिलाओं को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

             

            यीस्ट फंगल इंफेक्शन के लक्षण-

            • गुप्तांगों में खुजली या दर्द का होना।
            • संभोग के दौरान दर्द होना।
            • पेशाब करते समय तकलीफ या दर्द होना।
            • योनि से अधिक रक्तस्राव का होना।

            मुंह एवं गले में कैंडिडा संक्रमण-

            यह संक्रमण भी कैंडिडा फंगस के कारण होता है। जब मुंह एवं गले में कैंडिडा की संख्या बढ़ जाती है, तो मनुष्य इस संक्रमण से पीड़ित हो जाते हैं। मुंह और गले के कैंडिडा संक्रमण को थ्रश या ऑरोफरीन्जियल कैंडिडिआसिस (oropharyngeal candidiasis) भी कहा जाता है।आम तौर पर यह समस्या एड्स या एचआईवी से संक्रमित लोगों में देखी जाती है। इस तरह फंगल इंफेक्शन से पीड़ित व्यक्तियों को अधिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है।

             

            मुंह एवं गले में कैंडिडा संक्रमण के लक्षण-

            • मुंह में खटास महसूस होना।
            • मुंह के कोनों में रैशेज और लालपन होना।
            • मुंह में सूजन का अहसास होना।
            • स्वाद का पता न चलना।
            • भोजन करते या निगलते समय दर्द का अहसास होना।
            • मुंह की आंतरिक हिस्सों और गले में सफेद चकत्ते का होना।

            फंगल संक्रमण होने के कारण-

            • फंगल इंफेक्शन होने का अहम कारण है गरम एवं नमीयुक्त वातावरण का होना।
            • जिन लोगों को पहले से ही फंगल संक्रमण है उनके संपर्क में आने पर।
            • अधिक वजन या मोटापा होने पर।
            • शरीर में अधिक पसीना होने पर।
            • लंबे समय तक साइकिल चलाने या जॉगिंग करने पर।
            • शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का किसी कारणवश कमजोर होना।
            • कैंसर, डायबिटीज, एड्स, एचआईवी, आदि जैसी बीमारियां होने पर।
            • महिलाओं का सेनेटरी पैड का ज्यादा देर तक इस्तेमाल करने पर।
            • बच्चों को अधिक समय तक गिले नैपी पैड या गीले कपड़े पहनाने पर।
            • मानसून के दौरान हल्की बूंदा-बांदी में भीगने और त्वचा को गिला छोड़ देने पर।
            • फंगस से प्रभावित पालतू जानवर जैसे बिल्ली, कुत्ता, बकरी, गाय, घोड़े या सूअर के संपर्क में आने पर।
            • अधिक धूम्रपान करने पर।
            • एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक उपयोग करने पर।
            • गर्भनिरोधक दवाइयों का अधिक सेवन करने पर। 

            फंगल इंफेक्शन से बचने के उपाय-

            • कवक संक्रमण से संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से बचें।
            • किसी भी तरह के संक्रमण से बचने के लिए स्वयं को साफ-सुथरा रखें।
            • फंगल संक्रमण से बचने के लिए त्वचा को सूखा और स्वच्छ रखें।
            • केवल सूती कपड़ों का प्रयोग करें।
            • बरसात के मौसम में बालों को गीला न छोड़े।
            • पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं।
            • पौष्टिक आहार जैसे दाल, चना, दूध, हरी सब्जियां और फल-फूल का सेवन करें। जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहती है।
            • आलू, बैंगन, मसूर की दाल, लाल मिर्च, कचालू, मांस-मछली आदि का सेवन न करें।

            फंगल इंफेक्शन के घरेलू उपचार-

            नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर स्नान करने और गाय के दूध में नीम की पत्तियों को पीसकर संक्रमित हिस्से पर लगाने से फंगल इंफेक्शन ठीक हो जाते हैं। इसके अलावा फंगल इंफेक्शन से पीड़ित व्यक्ति के लिए रात में नीम पेड़ के नीचे सोना बेहद फायदेमंद होता है।

             
            • चालमोगरा के तेल को गर्म दूध के साथ नियमतः सेवन करने से फंगल इंफेक्शन में फायदा होता है।
            • नीम और चालमोगरा के तेल को समान मात्रा में मिलाकर प्रभावित अंग पर लगाने से फंगल इंफेक्शन ठीक हो जाता है।
            • कपूर और केरोसिन का तेल मिलाकर प्रभावित हिस्सों पर लगाने से फंगल इंफेक्शन में आराम मिलता है।
            • हल्दी पाउडर में शहद मिक्स करके प्रभावित अंग का लेप करने से फंगल इंफेक्शन एवं सभी प्रकार के चर्म रोगों में फायदा होता है।
            • रोज़ाना दो या तीन लहसुन की कलियों का सेवन करने से सभी प्रकार के कवक संक्रमण नष्ट हो जाते हैं।
            • शहद युक्त मेहंदी पत्तों के रस का रोज सुबह सेवन करने से खून साफ होता है। इससे किसी भी हर प्रकार के कवक संक्रमण रोगों में लाभ मिलता है।
            • चंपा की छाल से बने चूर्ण का दिन में तीन बार सेवन करने से सभी प्रकार के चर्म विकार नष्ट हो जाते हैं।
            • पीपल की पत्तियों को थोड़े पानी में उबालकर, इससे प्रभावित हिस्सों को धोने से कवक संक्रमण विकार ठीक हो जाता है।
            • खुजली या फंगल इंफेक्शन होने पर प्रतिदिन सुबह एक कप पानी में ताजे नींबू का जूस निचोड़कर पीने से आराम मिलता है।
            • पुदीने की पत्तियों को पीसकर पेस्ट बनाकर प्रभावित जगहों पर लेप करने से फंगल इंफेक्शन ठीक हो जाता है।
            • आंवला और नीम की पत्तियों को समान मात्रा में शहद के साथ सेवन करने से इस रोग में लाभ होता है।
            • सेब का सिरका खुजली के लिए बहुत ही पुराना उपाय है। इसके लिए एक चम्मच सेब के सिरका, शहद और नींबू को एक गिलास पानी में मिलाकर पीने से में फायदा होता है।
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            सोरायसिस के लक्षण, प्रकार और उपचार

            Posted 24 May, 2022

            सोरायसिस के लक्षण, प्रकार और उपचार

            त्वचा शरीर के नाजुक हिस्सों में से एक है। जो दूषित वातावरण और गलत खानपान के चलते बहुत जल्दी संक्रमण की चपेट में आ जाती है। त्वचा संबंधी बहुत से रोग जल्दी ठीक हो जाते हैं तो कुछ रोग लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़ते। इन्हीं रोगों में से एक रोग है सोरायसिस। यह चर्म रोग त्वचा को बुरी तरह प्रभावित करता है। इस रोग के दौरान स्किन लाल और पपड़ीदार हो जाती है। जिसमें कभी-कभी खुजली, जलन और सूजन भी देखने को मिलती है।

             
             

            क्या है सोरायसिस?

            सोरायसिस एक त्वचा संबंधी बीमारी है। जो त्वचा पर अधिक कोशिकाओं के बढ़ने के कारण होती है। यह कोशिकाएं नीचे से बढ़ती हुई पूरी त्वचा को घेर लेती हैं। त्वचा पर लगातार कोशिकाएं विकसित होने के कारण त्वचा की नमी कम होने लगती है और त्वचा रूखी हो जाती है। परिणामस्वरूप त्वचा में लालिमा, सूजन और जलन उत्पन्न होने लगती है। देखने में सोरायसिस लाल मोटे चकत्ते होते हैं। जिनमें कभी-कभी दरारें पड़कर खून भी आने लगता है। आम भाषा में सोरायसिस को छाल रोग भी कहा जाता है।

             
             

            क्यों होता है सोरायसिस?

            वैसे तो सोरायसिस हर उम्र के लोगों को अपनी चपेट में ले सकता है। लेकिन 15 से 35 और उससे अधिक उम्र के लोगों में इसके अधिक मामले देखे जाते हैं। सोरायसिस क्यों होता है? या कहें कि इस चर्म रोग के क्या कारण हैं? तो इसके लिए निम्नलिखित कारणों को शामिल किया जा सकता है-

            • शुष्क त्वचा और शुष्क हवा का होना।
            • अधिक धूप या सनबर्न।
            • वायरस और बैक्टीरिया संक्रमण।
            • त्वचा का कटना एवं त्वचा पर चोट लगना।
            • किसी कीड़े का काट लेना।
            • कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली।
            • अधिक तनाव एवं चिंता।
            • किसी दवाई का साइड इफेक्ट।
            • एड्स जैसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त होना आदि।
             
             

            सोरायसिस के लक्षण-

            सोरायसिस या त्‍वचा संबंधी कई समस्‍याओं के लक्षण भिन्न-भिन्न लोगों में भिन्न-भिन्न तरह से दिखाई पड़ते हैं। कई बार यह लक्षण इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि किस व्यक्ति को किस तरह का सोरायसिस है? शुरुआत में सोरायसिस सिर और कोहनी जैसे त्वचा के छोटे स्थानों को ही अपना शिकार बनाता है।

            सोरायसिस के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं;

            • त्वचा की सूजन और लाल चकत्ते।
            • लाल चकत्तों पर सफेद पपड़ी पड़ना।
            • त्वचा के लाल चकत्तों में दर्द होना।
            • चकत्तों पर या उसके आसपास खुजली और जलन होना।
            • त्वचा के रूखेपन के साथ उसमें दरारे पड़ना और उन दरारों से खून आना।
            • मोटे नाखून होना और उनमें दाग-धब्बों का पड़ना।
            • जोड़ों में सूजन और दर्द होना।
             
             

            सोरायसिस के प्रकार

            सोरायसिस रोग कई तरह का होता है। जोकि निम्नलिखित है-

            एरिथ्रोडर्मिक- इसमें सोरायसिस त्वचा के बड़े क्षेत्र को कवर करता है। जिसकी लालिमा काफी तीव्र होती है।

            पस्टुलर- इस स्थिति में त्वचा पर पीले मवाद से भरे छाले पड़ने लगते हैं।

            प्लाक- इसमें त्वचा लाल धब्बेदार और सख्त हो जाती है। जिसपर एक समय बाद सफेद पपड़ी पड़ने लगती है।

            इनवर्स- यह शरीर के सामान्य हिस्सों जैसे कोहनी और घुटनों की वजाय बगल और कमर जैसे हिस्सों में होता है। इसमें त्वचा लाल पड़ जाती है। जिसमें एक समय के बाद जलन भी होती है।

            गुट्टेट- इसमें त्वचा पर छोटे लाल-गुलाबी धब्बे दिखाई पड़ते हैं। यह खासकर बच्चों में देखने को मिलता है। जोकि स्ट्रेप संक्रमण (बैक्टीरियल संक्रमण, गले में खराश व खरोंच के कारण) से संबंध रखता है।

             
             

            सोरायसिस (छाल रोग) के घरेलू उपचार-

            हल्दी-

             

            सामग्री:

            हल्दी पाउडर दो चम्मच

            पानी एक चौथाई कप

            कैसे करें इस्तेमाल?

            पानी में हल्दी को मिलाकर गर्म करते हुए गाढ़ा पेस्ट बना लें।

            पेस्ट को ठंडा करके प्रभावित हिस्से पर लगाएं।

            पेस्ट के सूखने पर त्वचा को साफ करें।

            कितनी बार प्रयोग करें?

            हल्दी के इस पेस्ट का इस्तेमाल दिन में दो बार जरुर करें।

            कैसे है लाभदायक?

            हल्दी एक आयुर्वेदिक औषधि है। जो एंटीइंफ्लेमेटरी, एंटीबैक्टीरियल, एंटीऑक्सीडेंट और घाव को जल्दी भरने वाले गुणों से संपन्न होती है। इसलिए इसका इस्तेमाल सोरायसिस से प्रभावित वाले हिस्से पर खुजली, जलन, बैक्टीरिया आदि को कम करने के लिए किया जाता है।

             
             

            अदरक-

            सामग्री:

            जैतून का तेल

            अदरक का तेल

            कैसे करें इस्तेमाल?

            अदरक तेल की कुछ बूंदों को हाथ पर लेकर प्रभावित त्वचा पर लगाएं।

            त्वचा के संवेदनशील होने पर अदरक तेल के साथ जैतून तेल को मिलाकर इस्तेमाल करें।

            कितनी बार प्रयोग करें?

            इस प्रक्रिया का दिन में दो बार इस्तेमाल किया जा सकता है।

            कैसे है लाभदायक?

            अदरक का तेल सोरायसिस रोग के इलाज में काफी मददगार साबित होता है। क्योंकि अदरक के तेल में एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं। जो सोरायसिस पर प्रभावी असर डालने का काम करते हैं। जिससे यह समस्या जल्दी ठीक होती है।

             
             

            ग्रीन टी-

             

            सामग्री:

            ग्रीन टी एक बैग

            गर्म पानी एक कप

            कैसे करें इस्तेमाल?

            पांच मिनट के लिए ग्रीन टी बैग को गर्म पानी में डालकर रखें।

            ग्रीन टी बैग को पानी में से निकाल दें और प्राप्त चाय का सेवन करें।

            कितनी बार प्रयोग करें?

            छाल रोग के समय दिन में दो से तीन कप ग्रीन टी का सेवन करें।

            कैसे है लाभदायक?

            ग्रीन टी में एंटीऑक्सीडेंट गुण मौजूद होते हैं। जो छाल रोग के लक्षणों को दूर करने में सहायता करते हैं। दरअसल ग्रीन टी विषाक्त पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने का काम करती है। जो खुजली और जलन का कारण होते हैं।

             
             

            एलोवेरा-

            सामग्री:

            एलोवेरा का पत्ता मध्यम आकार का

            कैसे करें इस्तेमाल?

            एलोवेरा के पत्ते को साफ पानी से धोकर कुछ समय के लिए फ्रिज में रख दें।

            कुछ देर बाद फ्रिज से एलोवेरा को निकालकर चाकू की मदद से उसकी ऊपरी परत हटाकर जेल को किसी बाउल में निकाल लें।

            अब इस जेल को प्रभावित त्वचा पर 20-25 मिनट तक लगाकर रखें। उसके बाद त्वचा को ठंडे पानी से धो लें।

            कितनी बार प्रयोग करें?

            इस प्रक्रिया को दिन में दो बार किया जा सकता है।

            कैसे है लाभदायक?

            एलोवेरा एक प्राकृतिक औषधि है। जो त्वचा की जलन को शांत करती है। एलोवेरा में मौजूद एंटीबैक्टीरियल और एंटीइंफ्लेमेटरी गुण त्वचा को सूजन और जीवाणु संक्रमण से आजादी दिलाते हैं। इसके अतिरिक्त एलोवेरा में एक ब्रैडीकाइनस नामक एंजाइम भी पाया जाता है। जो स्किन की सूजन को ठीक करने का काम करता है। इसलिए एलोवेरा के इस्तेमाल को सोरायसिस का सफल माना है।

             
             

            नीम-

            सामग्री:

            नीम तेल

            कैसे करें इस्तेमाल?

            नीम तेल की बूंदों को उंगलियों या रुई बॉल पर डालकर प्रभावित त्वचा पर लगाएं

            कितनी बार प्रयोग करें?

            इस प्रक्रिया को दिन में दो बार दोहराया जा सकता है।

            कैसे है लाभदायक?

            नीम तेल प्रयोग सोरायसिस की दवा के रूप में किया जा सकता है। नीम तेल में एंटी फंगल और एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं। जो त्वचा के जीवाणु संक्रमण को जल्दी ठीक करने का काम करते हैं।

             
             

            नारियल तेल-

            सामग्री:

            नारियल का तेल

            कैसे करें इस्तेमाल?

            नारियल तेल की कुछ बूंदें हाथ पर लें और प्रभावित त्वचा पर लगाएं।

            कितनी बार प्रयोग करें?

            यह प्रक्रिया को दिन में दो से तीन बार दोहराएं।

            कैसे है लाभदायक?

            आयुर्वेद में नारियल तेल को त्वचा के लिए बेहद अच्छा माना गया है। क्योंकि यह मॉइस्चराइजिंग गुण से संपन्न होता है। जो खुजली और पपड़ीदार त्वचा को शांत करते है। इसके अतिरिक्त नारियल तेल एंटीसेप्टिक ऑयल भी होता है। जो सोरायसिस संक्रमण को कम करता है।

             
             

            टी ट्री तेल-

            सामग्री:

            एक चम्मच टी ट्री तेल

            जैतून का तेल एक बड़ा चम्मच

            कैसे करें इस्तेमाल?

            टी ट्री तेल में जैतून तेल को मिलाकर प्रभावित त्वचा पर लगाएं।

            कितनी बार प्रयोग करें?

            दिन में दो से तीन बार इस तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है।

            कैसे है लाभदायक?

            टी ट्री ऑयल त्वचा पर एंटीसोरायसिस के रूप में कार्य करता है। यह एंटीइंफ्लेमेटरी गुण से भी भरपूर होता है। जो सूजन और जलन को शांत करने का काम करते हैं। इसके अतिरिक्त यह तेल चर्म रोगों से भी छुटकारा दिलाता है।

             
             

            जैतून का तेल-

            सामग्री:

            जैतून का तेल

            कैसे करें इस्तेमाल?

            जैतून तेल की कुछ बूंदों को हथेली पर लेकर प्रभावित त्वचा पर लगाएं।

            कितनी बार प्रयोग करें?

            इस तेल को दिन में तीन से चार बार त्वचा पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

            कैसे है लाभदायक?

            जैतून का तेल सोरायसिस के लिए एक प्रभावी विकल्प है। यह तेल में एंटीऑक्सीडेंट और एंटीइंफ्लेमेटरी गुणों मौजूद होते हैं। जो घाव को शीघ्र भरने और त्वचा संबंधी समस्याओं से दूर करने का काम करते हैं।

             
             

            अलसी का तेल-

            सामग्री:

            अलसी का तेल

            कैसे करें इस्तेमाल?

            तेल की कुछ बूंदों को हथेली पर लेकर प्रभावित त्वचा पर लगाएं।

            कितनी बार प्रयोग करें?

            इस तेल को दिन में तीन से चार बार त्वचा पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

            कैसे है लाभदायक?

            अलसी के तेल का इस्तेमाल सोरायसिस की दवा के रूप में किया जा सकता है। अलसी का तेल ओमेगा-3 फैटी एसिड, अल्फा-लिनोलेनिक एसिड, बीटा-कैरोटीन और टोकोफेरोल जैसे एंटीऑक्सीडेंट से संपन्न होता है। यह त्वचा के पीएच को संतुलित और हाइड्रेट रखता है। इसके अतिरिक्त यह तेल सोरायसित के लक्षणों को शांत करने में भी मदद करता है।

             
             

            सेब का सिरका-

            सामग्री:

            सेब का सिरका एक चौथाई कप

            गुनगुना पानी तीन चौथाई कप

            कॉटन बॉल

            कैसे करें इस्तेमाल?

            सिरके को गुनगुने पानी में अच्छी तरह मिलाएं।

            प्रभावित हिस्से के अनुसार कॉटन बॉल का चुनाव करें।

            अब कॉटन बॉल को सिरके वाले गुनगुने पानी में डुबोकर थोड़ा निचोड़ें और प्रभावित हिस्से पर लगाएं।

            कॉटन बॉल को एक से दो मिनट प्रभावित हिस्से पर रखकर हटा दें।

            कितनी बार प्रयोग करें?

            बार-बार होने वाली खुजली और जलन से छुटकारा पाने के लिए इस प्रक्रिया को प्रतिदिन चार से पांच बार करें।

            कैसे है लाभदायक?

            सेब का सिरका एंटीएलर्जिक, एंटीफंगल, एंटीमाइक्रोबियल, एंटीवायरल और एंटीइंफ्लेमेटरी जैसे गुणों से भरपूर होता है। जो त्वचा से खुजली, जलन और चकत्तों को हटाने में मदद करते हैं। इसलिए सोरायसिस के इलाज लिए सेब के सिरके का इस्तेमाल किया जाता है।

             
             

            वेदोबी सोरायसिस तेल-

             

            वेदोबी सोरायसिस तेल त्वचा और छाल रोग आदि का इलाज करने के लिए तैयार किया गया एक आयुर्वेदिक ऑयल है। जिसमें जोजोबा तेल, करेले के तेल से प्रभावित जैतून का तेल, मैरीगोल्ड (गेंदे का फूल), केले के पत्ते, तेज पत्ता, तिल का तेल, नारियल का तेल, बावची (बाकुची) का तेल, काले जीरे का तेल, चालमोगरा (तुबरक या तुवरक) का तेल, करंज का तेल, तमानु का तेल और जुनिपर बेरी एसेंशियल ऑयल, लोबान का तेल, टी ट्री ऑयल, देवदार का तेल, लैवेंडर का तेल, अजवायन के फूल का तेल और नीम का तेल आदि प्राकृतिक अवयवों का संयोजन मौजूद है। यह तेल जीवाणुरोधी और कवक विरोधी है। जो खोपड़ी और त्वचा में सोरायसिस संक्रमण को ठीक करता है।

             
             

            कैसे करें इस्तेमाल?

            • वेदोबी सोरायसिस तेल का इस्तेमाल स्नान करने के बाद, लोशन की तरह पूरे शरीर, चेहरे और खोपड़ी पर करें।
            • इसे तेल को नियमित मालिश के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
            • वेदोबी सोरायसिस तेल को सोते समय भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

            कितनी बार प्रयोग करें?

            शीघ्र और बेहतर परिणामों की प्राप्ति के एस तेल को दिन में दो से तीन बार प्रभावित त्वचा पर लगाएं।

             

            कैसे है लाभदायक?

            वेदोबी सोरायसिस तेल में उपयोग होने वाले विभिन्न तत्व त्वचा पर सुखदायक प्रभाव डालते हैं और त्वचा को सूखेपन और खुजली से राहत प्रदान करते हैं। यह तेल त्वचा को मुलायम बनाता है। क्योंकि इसके सलूशन में प्रयुक्त सामग्री सूखी और दरार वाली त्वचा को ठीक करने का काम करती है। यह तेल सोरायसिस के लक्षणों को कम करते हुए त्वचा की चमक को बढ़ावा देता है। जिससे त्वचा की हीलिंग होती है। वेदोबी सोरायसिस तेल 100% प्राकृतिक अवयवों के साथ तैयार किया गया है। इसलिए साइड-इफेक्ट्स की चिंता किए बिना इसका उपयोग किया जा सकता है।

             

            सोरायसिस के समय बरतें यह सावधानियां-

            • तेज धूप से बचें। इसलिए सोरायसिस के समय बाहर जाने पर छतरी का इस्तेमाल करें।
            • त्वचा पर कोई घाव या संक्रमण होने पर उसे अनदेखा न करें अथार्त उसपर पूरा ध्यान दें।
            • प्रतिदिन नहाएं और त्वचा को अच्छे से साफ रखें।
            • खुजली होने पर त्वचा को खरोंचे से बचें।
            • सोरायसिस के समय घरेलू उपाय या डॉक्टर की सलाह जरुर लें।
             

            सोरायसिस में आहार-

            सोरायसिस के समय से भोजन में एंटीइंफ्लेमेटरी, एंटीबैक्टीरियल, विटामिन-सी, विटामिन-ई और विटामिन-डी से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करें। फल और हरी-सब्जियों का अधिक सेवन करें। शरीर को हमेशा हाइड्रेट रखें। इसके लिए जूस और नारियल पानी का प्राप्त सेवन करें।

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