Symptoms, Causes and Remedies of Physical Weakness

Posted 20 December, 2021

Symptoms, Causes and Remedies of Physical Weakness

The feeling of tiredness and lethargy all the time is physical weakness. It may also happen that the person feeling weakness is unable to move any part of his body or he feels jerks or cramps in that part. Some people feel weakness in any part of their body like hands or feet while others feel it due to bacterial infection or viral infections such as influenza or hepatitis.


Physical weakness usually occurs for some time but in some cases, it may also remain for a long time. To treat weakness it is necessary to first identify its cause. Based on which its symptoms should be treated.


Types of Physical Weakness

There are mainly two types of physical weakness. One is neuromuscular weakness and the other is non-neuromuscular weakness.


Neuromuscular weakness-

Muscle strength is reduced due to any damage in neuromuscular weakness which reduces his ability to work.


Non-neuromuscular weakness-

In non-neuromuscular weakness, you feel weakness while doing any work. Whereas in fact, the muscle is normal.


Symptoms of Physical Weakness

  • Feeling weakness in one part of the body or unable to move that part properly.
  • Delay in doing any work with the affected limb or feeling tremor in the affected limb.
  • Muscle spasms and feeling tired throughout the day.
  • Feeling weakness all the time without exhaustion.
  • Fever, flu-like symptoms and pain in the affected limb.
  • Weakness and sudden unconsciousness.
  • Difficulty speaking and swallowing.
  • Mental state changes or anxiety.

Causes of Physical Weakness


Depression is considered to be the main cause of fatigue and weakness because worrying too much or living in depression has a very bad effect on the standard of living and working. For this reason, when a person is under stress, he experiences symptoms of weakness. Unfortunately, most such cases are not diagnosed because they are not easily identified.



Muscles become weak over time due to a sedentary lifestyle and lethargy due to which the body feels weak.



As age increases, the ability of the body's cells and tissues to keep pace with each other keeps decreasing. This is why the body of older people saves their energy by remaining less active, otherwise, they experience weakness.


Infections and long-lasting diseases-

If the body constantly has to fight infections then there is a lack of energy in the body. The patient also feels tired due to long-term infections in the body such as TB and Hepatitis. One reason for this is that the muscles become weak due to these diseases. Similarly, due to Diabetes and insomnia disease, the sufferer starts feeling very weak.


Vitamin deficiency-

Lack of vital vitamins leads to a decrease in the formation of red blood cells(RBCs) due to which the formation of energy in the body is reduced and the body feels weak.


Other causes of physical weakness-

  • Flu
  • Thyroid
  • Anemia (it may be due to excessive bleeding during menstruation)
  • Lack of sleep
  • Diabetes
  • Heart failure
  • Vitamin B-12 deficiency
  • Medications' side effects
  • Chemotherapy
  • Cancer
  • Stroke
  • Heart attack
  • Injury to nerves or muscles
  • Diseases affecting the nerves or muscles 

Weakness prevention measures

  • Avoid consuming caffeine and alcohol.
  • Avoid excessive exercise or dieting.
  • Be sure to get enough sleep at night.
  • Include calcium, protein, and low-fat food in your diet.
  • Eat a diet rich in nutrients, it keeps the energy in the body and reduces fatigue.
  • Try to walk outside in an open environment for at least thirty minutes daily. It brings peace to mind and body, reduces stress, and has a positive effect on mental health. 

Treatment of Physical Weakness

Weakness caused by infection-

The lost energy can be recovered with the help of antibiotics prescribed by the doctor to fight the infection.


Weakness caused by depression-


This type of fatigue can be cured with antidepressant medications.


Weakness due to vitamin deficiency-


A vitamin whose level is low is given to correct metabolic abnormalities caused by vitamin deficiency. Most of the fatigue is due to a deficiency of vitamin B12 and folate. This can be cured by fulfilling the deficient nutrients.


Weakness due to overwork-


If there is a weakness in the muscles due to overwork then it can be treated by making lifestyle changes.


When to go to the doctor?

  • Excessive dizziness.
  • When one feels anxious.
  • Facing trouble while speaking.
  • When there is a change in eyesight.
  • In case of chest pain.
  • In case of breathing difficulties.
  • Irregular heartbeat.
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स्मृतिलोप (भूलने की बीमारी) के लक्षण, कारण और बचाव

Posted 24 May, 2022

स्मृतिलोप (भूलने की बीमारी) के लक्षण, कारण और बचाव

मस्तिष्क की क्षति या किसी मस्तिष्क रोग के कारण याद करने की क्षमता में आने वाली कमी को स्मृतिलोप (Amnesia) या भूलने की बीमारी कहते हैं। ऐसा मुख्य रूप से मस्तिष्क की क्षति, मस्तिष्क संबंधित रोग, दर्द कम करने वाली औषधि आदि का अधिक इस्तेमाल करने से, नींद की दवाओं के ज्यादा उपयोग या मनोवैज्ञानिक विकार आदि की वजह से होता है। धीरे-धीरे याददाश्त जाना और संज्ञानात्मक क्षमता में कमी भूलने की समस्या पैदा करते हैं। अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 40 लाख लोग इससे पीड़ित हैं। इन 40 लाख लोगों में से लगभग 16 लाख लोग अल्जाइमर के शिकार हैं। अल्जाइमर जैसे तंत्रिका सम्बंधी विकार भी स्मृतिलोप को जन्म देते हैं। भूलने की बीमारी मस्तिष्क के उन क्षेत्रों को नुकसान पहुंचने से होती है जो याददाश्त के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। भूलने की बीमारी स्थायी हो सकती है। इसका कोई विशेष उपचार नहीं है, लेकिन याददाश्त बढ़ाने और मनोवैज्ञानिक तकनीकों से भूलने की बीमारी से पीड़ित लोगों की सहायता की जा सकती है।


भूलने की बीमारी के प्रकार-

स्मृतिलोप मुख्यतः दो प्रकार का होता है। पहली प्रतिगामी भूलने की बीमारी (रेट्रोग्रेड एमनेसिया) और दूसरी अग्रगामी भूलने की बीमारी (एंटेरोग्रेड एमनेसिया)


रेट्रोग्रेड (प्रतिगामी भूलने की बीमारी)-

भूलने की बीमारी के रेट्रोग्रेड प्रकार में रोगी मौजूदा पहले की यादें खो देता है। इस प्रकार की भूलने की बीमारी पहले हाल ही (recently) की यादों को प्रभावित करती है। पुरानी यादें, जैसे बचपन की यादें, आमतौर पर धीमी गति से प्रभावित होती हैं। डिमेंशिया जैसे रोग भूलने की बीमारी के रेट्रोग्रेड प्रकार के कारण ही बनते हैं।


एन्टेरोग्रेड (अग्रगामी भूलने की बीमारी)-

भूलने के बीमारी का एन्टेरोग्रेड प्रकार में रोगी नई यादें नहीं बना पाता। यह प्रभाव अस्थायी और स्थायी दोनों प्रकार से हो सकता है। उदाहरण के लिए बहुत अधिक शराब पीने से ब्लैकआउट के दौरान ऐसा अनुभव होता है। इस प्रकार की भूलने की बीमारी होने से लोग लंबे समय तक चीजों को याद नहीं रख पाते हैं। यह दोनों प्रकार परस्पर अलग नहीं हैं। मरीज में यह दोनों एक ही समय में हो सकती हैं।


भूलने की बीमारी के कारण-


कई अवसादरोधी दवाइयों जैसे एंटीडिप्रेससेंट, एंटीहिसटामाइंस, स्ट्रेस निवारक दवाइयां, मांसपेशियों को ढीला करने वाली दवाइयां, ट्रांक्विलाइज़ेर्स, नींद की गोलियां और सर्जरी के बाद दी जाने वाली दर्द की दवाएं याददाश्त कमजोर कर सकती हैं।


धूम्रपान और शराब पीने से-

अत्यधिक शराब पीने से भूलने की बीमारी हो सकती है। धूम्रपान मस्तिष्क में ऑक्सीजन की मात्रा को कम कर स्मृति को हानि पहुंचाता है।


नींद में कमी-

नींद की मात्रा और गुणवत्ता दोनों ही स्मरणशक्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। बहुत कम नींद लेने या रात में अक्सर जागने से भूलने की समस्या पैदा हो सकती है।


अवसाद और तनाव-

अवसाद होने से ध्यान बनाए रखने में परेशानी होती हैं, जो स्मृति को प्रभावित करती है। तनाव और चिंता एकाग्रता में बाधक बनकर स्मृति की क्षमता पर बुरा असर डालते हैं।


पोषक तत्वों की कमी-

अच्छे और उच्च क्वालिटी वाले प्रोटीन और वसा मस्तिष्क के कार्यों को ठीक रखने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। विटामिन बी 1 और बी 12 की कमी विशेष रूप से स्मृति को प्रभावित करती हैं।


सिर में चोट-

कई बार सिर की गंभीर चोट मस्तिष्क को घायल कर देती है और छोटी व लंबी अवधि तक स्मृति को प्रभावित करती है।



जब मस्तिष्क में रक्त वाहिका में रुकावट या वाहिका में ब्लॉकेज होने के कारण रक्त की आपूर्ति बंद हो जाती है तब स्ट्रोक होता है। स्ट्रोक अक्सर अल्पकालिक स्मृति हानि करता है।


भूलने की बीमारी के लक्षण-

  • एन्टेरोग्रेड (Anterograde) भूलने की बीमारी में नई जानकारी सीखने की क्षमता खराब हो जाती है।
  • रेट्रोग्रेड (Retrograde) भूलने की बीमारी में पिछली घटनाओं और पहले की परिचित जानकारी को याद रखने की क्षमता में कमी आ जाती है।
  • अकल्पनीयता में झूठी यादें बन सकती हैं या वास्तविक यादों में गड़बड़ी हो सकती है।
  • स्मृतिलोप के कारण भ्रम या भटकाव जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
  • एडियों में रक्त-संचार कम हो तो इससे स्मृति प्रभावित हो सकती है। इसलिए नियमित रूप से एड़ियों की जांच करें।
  • शारीरिक संकेत जैसे पढ़ने में समस्या, सूंघने में परेशानी, दूरी के बारे में भ्रम आदि भी भूलने की बीमारी के लक्षण होते हैं।

भूलने की बीमारी से बचाव एवं उपचार-

  • भूलने की बीमारी से बचने के लिए शारीरिक क्रियाएं जैसे जॉगिंग, डांसिंग, एरोबिक्स, बास्केटबॉल, स्विमिंग और साइकिलिंग करना बेहद फायदेमंद होता है। क्योंकि इससे शरीर में रक्त संचार सुचारू होता है और दिमाग को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है। इससे ऊर्जा बनी रहती है और स्मृतिलोप का खतरा कम होता है।
  • डाइट में हरी सब्जियां, फल, फिश, नट्स, ऑलिव ऑयल और विनेगर आदि शामिल करें। ग्रीन टी, कॉफी, डार्क चॉकलेट दिमाग की खुराक है। इनके सेवन से मस्तिष्क की कार्य क्षमता में सुधार होता है।
  • प्रतिदिन 7-8 घंटे की नींद जरूर लें। कम सोने से हिप्पोकैंपस (मस्तिष्क का एक हिस्सा) में नए न्यूरोंस का विकास प्रभावित होता है। इससे स्मृति, एकाग्रता एवं निर्णय लेने की क्षमता में कमी आती है। साथ ही शरीर में मौजूद प्रोटीन एमिलॉयड बीटा को असंतुलित करता है। जिससे अल्जाइमर्स हो सकता है। इसलिए भूलने की बीमारी से बचने के लिए पर्याप्त नींद लेना आवश्यक है।
  • ब्रेन गेम-सुडोकू या पहेली, क्विज, शतरंज, लॉजिकल या इलेक्ट्रॉनिक खेल भी दिमाग को तेज करने के हथियार हैं। रोज 15-20 मिनट गेम्स खेलने से दिमाग की एक्सरसाइज होती है।
  • प्राणायाम व ध्यान करें। इससे तनाव दूर होता है, एकाग्रता आती है, ब्रेन को पर्याप्त ऑक्सीजन, रक्त व पोषक तत्व मिलते हैं।
  • भूलने की बीमारी का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि आपको किस कारणवश यह बीमारी है जैसे - रासायनिक रूप से प्रेरित भूलने की बीमारी (उदाहरण के लिए शराब से) को विषहरण के माध्यम से ठीक किया जा सकती है। जैसे ही ड्रग शरीर से बाहर जाता है, याददाश्त की समस्याएं कम हो जाती हैं।
  • सिर की चोट से भूलने की बीमारी आमतौर पर समय के साथ उपचार के बिना ठीक हो जाती है। गंभीर सिर की चोट से हुई भूलने की बीमारी ठीक नहीं होती। हालांकि, सुधार आमतौर पर छह से नौ महीने के भीतर होते हैं।
  • डेमेंशिया से हुई भूलने की बीमारी का अक्सर इलाज नहीं होता है। हालांकि डॉक्टर सिखने की क्षमता और याददाश्त बढ़ाने के लिए कुछ दवाइयां दे देते हैं।
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वायरल बुखार के लक्षण, कारण और घरेलू उपाय

Posted 24 May, 2022

वायरल बुखार के लक्षण, कारण और घरेलू उपाय

सामान्यतः मनुष्य के शरीर का तापमान लगभग 98.6 ° F (37 ° C) होता है। जब तापमान इससे एक डिग्री भी ऊपर चढ़ता है तो मनुष्य बुखार से पीड़ित हो जाता है। चिकित्सक के मुताबिक फीवर अक्सर एक संकेत देता है कि शरीर किसी प्रकार के बैक्टीरिया या वायरल संक्रमण से लड़ रहा है। वायरल बुखार एक अंतर्निहित वायरल बीमारी (शरीर के अंदर वायरस के संक्रमण) के कारण होता है। वायरस बहुत छोटे संक्रामक एजेंट होते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं के भीतर संक्रमण फैलाते हैं। कई वायरस तापमान में बदलाव के प्रति संवेदनशील होते हैं, जिससे शरीर के तापमान में अचानक वृद्धि होती है। वायरल बुखार, अंतर्निहित संक्रमण के आधार पर 99 ° F से लेकर 103 ° F (39 ° C) तक के तापमान में होते हैं। सामान्य रूप से वायरल संक्रमण की एक किस्म मनुष्यों को सर्दी से लेकर फ्लू तक प्रभावित करती है। लो-ग्रेड बुखार कई वायरल संक्रमणों का एक लक्षण है। लेकिन कुछ वायरल संक्रमण, जैसे डेंगू बुखार उच्च बुखार का कारण बन सकते हैं।


क्या होते हैं वायरल बुखार के लक्षण?

वायरल बुखार के लक्षण सामान्य बुखार की तरह ही होते हैं। लेकिन इनको नजरअंदाज करने से यह गंभीर रूप ले सकते हैं। इलाज के अभाव में वायरस के पनपने की संभावना अधिक रहती है। ज्यादातर वायरल फीवर बरसात के मौसम में होता है। क्योंकि यह दूषित हवा और पानी से फैलने वाला संक्रमण है। आइए चर्चा करते हैं कुछ वायरल बुखार के सामान्य लक्षण के बारे में जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

  • थकान महसूस होना।
  • शरीर का तापमान बढ़ना।
  • ठंड लगना।
  • पसीना आना।
  • निर्जलीकरण (शरीर में पानी की कमी)।
  • सिरदर्द।
  • मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द।
  • कमजोरी की भावना।
  • भूख में कमी।
  • आंखों में लाली एवं जलन होना।
  • त्वचा के ऊपर रैशेज होना।

क्या होते हैं वायरल बुखार के कारण?

ऐसे कई कारण हैं जिनसे लोग वायरस से संक्रमित हो सकते हैं। आइए जानते हैं इसके कुछ कारणों के बारे में-


यदि कोई वायरल संक्रमण वाला व्यक्ति आपके आस-पास छींकता या खांसता है तो उसके मुंह से तरल पदार्थ के छोटे फुहारे निकलते हैं। जो सांस द्वारा सामने वाले के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। वायरस के विषय में यह कहा जाता है कि यदि एक वायरस भी शरीर में प्रवेश करता है तो वह 16 से 48 घंटे में पूरे शरीर को संक्रमित कर देता है।

  • वायरस वाला दूषित भोजन और जल का प्रयोग करना।
  • प्रदूषण के कारण दूषित वायु में मौजूद सूक्ष्म कणों का शरीर के भीतर जाना।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना।
  • वायरल बुखार का एक कारण मौसम परिवर्तन भी है।
  • इलाज के दौरान दूषित रक्त चढ़ाने से।
  • खून चूसने वाले कीट जैसे मच्छर, पिस्सू और किलनी आदि।

वायरल बुखार के समय बरतें यह सावधानियां

  • साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।
  • वॉशरूम यूज करने के बाद हैंडवॉश का खास ख्याल रखें।
  • खांसते या छींकते समय हमेशा रुमाल या टिशू से मुंह और नाक को ढकें।
  • बारिश के मौसम में उबले हुए पानी का इस्तेमाल करें।
  • खाना खाने से पहले हाथों को साबुन से अच्छी तरह से धोएं।

वायरल बुखार के कुछ घरेलू उपाय:

गिलोय वायरल बुखार से छुटकारा दिलाने में मददगार-

गिलोय ज्वरनाशी है अर्थात पुराने से पुराने बुखार के इलाज में गिलोय का सेवन करना एक बेहतर विकल्प है। गिलोय में आक्सीकरण रोधी गुण होते हैं, जो स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और खतरनाक बीमारियों से लड़ने में सहायक होते हैं। गिलोय शरीर के रक्त प्लेट्स को बढ़ाता है। साथ ही वायरल इन्फेक्शन और डेंगू बुखार के लक्षणों को कम करता है। इसके लिए 4-6 सेमी लम्बी गिलोय को लेकर 400 मि.ली. पानी में तबतक उबालें जबतक पानी का लगभग एक तिहाई हिस्सा जल न जाए। उसके बाद उस पानी को पिएं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है और बार-बार होने वाली सर्दी-जुकाम व बुखार से छुटकारा दिलाता है।


वायरल बुखार के लिए तुलसी है फायदेमंद-

खांसी, जुकाम, दस्त या अन्य वायरल इंफेक्शन होने पर तुलसी का उपयोग घरेलू उपचार के रूप में किया जाता है। यह शरीर के वायरस को खत्म करती है। तुलसी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को बढ़ाती है। इसके लिए एक चम्मच लौंग का चूर्ण और दस से पंद्रह तुलसी के ताजे पत्तों को करीब एक लीटर पानी में डालकर तबतक उबाले जब तक वह आधा न हो जाए। अब उसके काढ़े को छान ले और चाय की तरह पिएं। ऐसा करने से वायरल फीवर से जुड़ी तमाम परेशानियों से छुटकारा मिलता है। इसके अलावा जुकाम होने पर तुलसी को पानी में उबाल कर भाप लेने से भी फायदा होता है।


हल्दी और सोंठ-

सोंठ यानि सूखी अदरक जिसमें जीवाणुरोधी गुण पाए जाते हैं, जो शरीर में संक्रमण फ़ैलाने वाले जीवाणुओं का खात्मा करते हैं। इसके लिए एक चम्मच काली मिर्च के चूर्ण में एक छोटी चम्मच हल्दी, एक चम्मच सौंठ का चूर्ण और थोड़ी सी चीनी मिलाएं। अब इसे एक कप पानी में डालकर गर्म करें और ठंडा करके पिएं। इससे वायरल फीवर को खत्म किया जा सकता है।


नींबू और शहद से-

आयुर्वेद के अनुसार नींबू और शहद दोनों में ही इम्यूनिटी बढ़ाने वाले गुण पाए जाते हैं। इसीलिए आयुर्वेदिक चिकित्सक वायरल बुखार होने पर नींबू और शहद के उपयोग की सलाह देते हैं। क्योंकि यह मिश्रण शरीर को डिटॉक्स करता है और इम्यूनिटी को बढ़ाता है। इसके लिए एक गिलास गुनगुने पानी में नींबू का रस और शहद मिलाकर सेवन करें। इससे वायरल संक्रमण से जल्द निजात मिलती है।


अजवाइन, नमक और नींबू-

अजवाइन और एक छोटा चम्मच सफेद नमक को एक साथ भून लें। इसके बाद इसमें एक गिलास पानी मिला कर एक नींबू निचोड़ें। इसे मरीज को दिन में दो से तीन बार पिलाएं। ऐसा करने से वायरल संक्रमण जैसे खांसी, जुकाम, सर्दी, सिरदर्द से शीघ्र निजात मिलती है।


धनिया की चाय-

धनिया के बीज वायरस और बैक्टीरिया से लड़ने के लिए शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाते हैं। धनिया वायरल बुखार जैसे कई रोगों को खत्म करता है। इसके लिए एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्मच धनिया पाउडर, थोड़ा-सा दूध और चीनी डालकर चाय बनाकर रोगी को दिन में दो बार पिलाएं। इस रूप में बुखार को खत्म करने के लिए धनिया चाय बहुत ही असरदार औषधि का काम करती है।


लहसुन का तेल है फायदेमंद-

वायरल बुखार होने पर अंगों में दर्द और ऐंठन की समस्या होने लगती है। ऐसे में लहसुन के साथ पकाए हुए सरसों के तेल से गले, सीने या पूरे शरीर पर हल्के हाथ से मालिश करें। ऐसा करने से वायरल संक्रमण जैसे खांसी, जुकाम, सर्दी, सिरदर्द में राहत मिलती है।

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What is Chiropractic: A medical practice or a therapy?

Posted 20 December, 2021

What is Chiropractic: A medical practice or a therapy?

Chiropractic is an alternative treatment method. It is used to treat pain in muscles, bones, joints, and associated tissues such as cartilage, tendons, and ligaments. It is a type of treatment that goes into the nervous system of the body and disorders of the bone system, without operating.


In chiropractic therapy, therapists (chiropractor) press the spinal cord with the help of hands to get the bone system in the right shape without any surgery or medication. By which the body itself heals the pain. This pressure is used to remove the discomfort caused by moving the joints due to an accident in the tissue such as an injury due to falling or sitting without backing.


Method of chiropractic treatment

Before performing chiropractic treatment, the chiropractor therapist asks some health-related questions and also performs a chiropractor X-ray, a physical examination focused on the spine.


After this, some chiropractors use the technique of twisting with strength for treatment, while some use a more gentle method in contrast. In this, the spine is slightly stirred. In addition, chiropractor therapists also use methods for treating cold or hot compresses, electric simulations (creating stimulation in cells by light current), spinal cord stretch devices, and ultrasound to heat tissues.  


Most of the techniques for treatment are used on a padded and adjustable table. Therapists begin treatment, usually by sitting or sleeping in a fixed position. The chiropractors then try to bend the joints more than normal by using sudden force on the joints in a reasonable range. While doing this, the sound of bones is also heard many times.


Diseases cured by chiropractic treatment

  • Bruxism (dental disorder)
  • Bursitis
  • Menstrual cramps
  • Sciatica
  • Headache
  • Joint pain
  • Tension
  • herniated disc
  • Labyrinthitis
  • lower back pain
  • Stiff neck

Disadvantages of chiropractic treatment

  • Some people may experience problems such as headaches, fatigue, or pain.
  • Those who have osteoporosis, spinal cord compression or inflammatory arthritis, or those who are taking blood-thinning medications, should not undergo chiropractic treatment.
  • Those who have problems with numbness, tingling, and weakness in the hands or feet should also not get this treatment.
  • Cancer patients should talk to their doctor before taking this therapy and should use this therapy only with their permission.
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Amnesia: Symptoms, Causes and Prevention

Posted 20 December, 2021

Amnesia: Symptoms, Causes and Prevention

Brain damage or a decrease in the ability to remember due to brain disease is called Amnesia. This is mainly due to brain damage, brain-related diseases, excessive use of pain-reducing drugs, excessive use of sleeping medicines, or psychological disorders, etc. Gradual memory loss and loss of cognitive ability cause forgetting problems. It is estimated that about 4 million people in India suffer from amnesia. Of these 4 million people, about 1.6 million are victims of Alzheimer's disease. Neurological disorders like Alzheimer's also lead to amnesia. Amnesia is caused by damage to areas of the brain that are important for retaining memory. Though there is no specific treatment, people with amnesia can be helped by memory enhancement and psychological techniques.


Types of Amnesia

There are mainly two types of amnesia. One is Retrograde Amnesia and the other is Anterograde Amnesia-


Retrograde Amnesia-

In the retrograde type of amnesia, the patient loses existing memories. This type of amnesia affects recent memories. Old memories, such as childhood memories, are usually affected by slow motion. Diseases such as dementia are caused by the retrograde type of amnesia.


Anterograde Amnesia-

In the anterograde type of amnesia, the patient is unable to make new memories. This effect can be both temporary and permanent. For example, drinking too much alcohol leads to such an experience during a blackout. Due to this type of amnesia, people are unable to remember things for a long time. These two types are not mutually distinct. In the patient, both of these can occur simultaneously.


Causes of Amnesia


Many antidepressants such as antihistamines, stress preventive medications, muscle relaxants, tranquilizers, sleeping pills, and post-surgery pain medications can weaken memory.


Smoking and drinking-

Excessive drinking can lead to amnesia. Smoking damages memory by decreasing the supply of oxygen in the brain.


Sleep deprivation-

Both quantity and quality of sleep are extremely important for memory. Getting too little sleep or waking up often at night can cause problems of forgetting.


Depression and Stress-

Having depression causes trouble in paying attention, which affects memory. Stress and anxiety affect the ability of the brain and acts as a barrier to concentration.


Nutritional deficiencies-

Good and high-quality proteins and fats are important to maintain brain functions. Vitamin B1 and B12 deficiency specifically affect memory.



Many a time severe head injury injures the brain and affects memory for short and long periods.



Stroke occurs when the blood supply is shut off in the brain due to blockage of the blood vessel. Stroke often causes short-term memory loss.


Symptoms of Amnesia

  • Anterograde impairs the ability to learn new things in amnesia.
  • Retrograde amnesia reduces the ability to remember past events and previously familiar information.
  • Unimaginable or false memories can be created or disturb real memories.
  • Amnesia can cause problems such as confusion or disorientation.
  • If there is less blood circulation in the heel (back part of the foot, just below the ankle), it can affect memory. So check it regularly.
  • Physical signs such as problems in reading, difficulty in smelling, confusion about distance, etc. are also symptoms of amnesia.

Prevention and Treatment of Amnesia

  • Physical activities like jogging, dancing, aerobics, basketball, swimming, and cycling are very beneficial to avoid amnesia. These improve the blood circulation in the body and the brain gets ample oxygen. This helps maintain energy and reduce the risk of amnesia.
  • Include green vegetables, fruits, fish, nuts, olive oil, and vinegar, etc. in the diet. Green tea, coffee, dark chocolate are brain supplements. Consumption of these improves brain function.
  • Take 7-8 hours of sleep daily. Sleeping less affects the development of new neurons in the hippocampus (a part of the brain). This leads to loss of memory, concentration, and decision-making ability. At the same time, the protein in the body imbalances the amyloid-beta which can cause Alzheimer's. Therefore, it is necessary to get enough sleep to avoid amnesia.
  • Brain games - Sudoku or puzzle, quiz, chess, logical or electronic games are also great brain-boosting games. The brain is exercised by playing these games for 15-20 minutes every day.
  • Do pranayama and meditation. This relieves stress, helps to attain concentration, and the brain gets enough oxygen, blood, and nutrients.
  • The treatment of amnesia depends on what causes you to have the disease, such as- Drug-induced amnesia (e.g., from alcohol) can be cured through detoxification. As soon as the drug is flushed out of the body, memory problems decrease.
  • Amnesia from a head injury usually resolves over time without treatment. Amnesia caused by a severe head injury is not cured. However, It can show improvements usually within six to nine months.
  • Dementia-related amnesia is often not treated. However, doctors give some medicines to increase the ability to learn and memorize.
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मल में रक्त आने के कारण और घरेलू उपचार

Posted 24 May, 2022

मल में रक्त आने के कारण और घरेलू उपचार

जीवन में भागदौड़ और गलत लाइफ स्टाइल के कारण आप और हम लोग अपनी सेहत और खान-पान की चीजों पर ध्यान नहीं दे पाते। जिसके कारण शरीर में कई बीमारियां उत्पन्न होने लगती है। वैसे भी इस बदलते परिवेश में करीब सभी लोगों को कब्ज और गैस की शिकायत रहती है। जिससे कारण खाना समय पर हजम नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप शौच करते समय बेहद परेशानी होती है। भोजन को ठीक से न पचा पाने और कब्ज होने के कारण ही मल सख्त और मोटा हो जाता है। जिसके कारण मल पास करते समय शरीर के एनस (मलद्वार) में अधिक दवाब पड़ता है और परिणामस्वरूप मल द्वार से खून आने लगता है।


खूनी मल कैसा दिखता है?

  • मल के साथ मिश्रित लाल रक्त।
  • लाल रक्त से ढका मल।
  • काला मल
  • मल के साथ मिश्रित गाढ़ा रक्त।

कहां से होता है रक्तस्राव ?

रक्तस्राव गुदा मार्ग में कहीं से भी आ सकता है। जिसके सामान्य नियम निम्नलिखित हैं-


मलाशय या गुदा से रक्तस्राव होने पर-

इसमें रक्त लाल और चमकदार दिखता है। क्योंकि यह रक्त मल के साथ मिश्रित नहीं हो पाता परंतु कभी-कभी मल-त्याग करने के बाद रक्त या रक्त की बूंदों से ढका मल हमे देखने को मिलता है। जैसे- गुदा के फटने और बवासीर से रक्तस्राव होना आदि।


बृहदान्त्र से रक्तस्राव होने की स्थिति में-

 इसमें रक्त मल के साथ मिश्रित रहता है और रक्त का रंग गहरा लाल हो सकता है। उदाहरण के लिए- बृहदांत्रशोथ (Colitis), डिवेंचरिक्यूलर बीमारी और आंत्र ट्यूमर (Intestinal tumor) से रक्त बहना।


छोटी आंत से रक्तस्राव होने पर-

रक्त को शरीर से बाहर निकलने से पहले लंबी यात्रा से गुजरना पड़ता है। इस दौरान रक्त का रंग गहरा होकर मल के साथ मिश्रित हो जाता है। इससे मल का रंग काला हो जाता है।


इसलिए इसे रुधिर काला मल भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए- पेट से होने वाला रक्तस्राव और ग्रहणी संबंधी अल्सर (Duodenal ulcer)।


क्या होते हैं मल में रक्त आने के कारण?

मल में खून आने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। यह कारण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति पर अलग-अलग होते हैं। कुछ मामलों में यह कारण सामान्य हो सकते हैं तो कुछ मामलों में यह गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकते हैं। बात करते हैं मल में रक्त आने के इन कारणों के बारे में;


आंतों में इंफेक्शन (Intestinal Infection)-

आंतों में इंफेक्शन होने से कई बार मल में खून आने लगता है। आंतों में होने वाली इस समस्या को गैस्ट्रोएंटेरिटिस (Gastroenteritis) कहते हैं। यह बीमारी वायरस, बैक्टीरिया, फूड प्वॉइजनिंग जैसे कारणों से होती है।


पेट में अल्सर (Stomach Ulcer)-

पेट में अल्सर होने से मल त्यागने में लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। कुछ लोगों में यह डायरिया (दस्त) का कारण भी होता है। पेट के अल्सर को पेप्टिक अल्सर कहते हैं। जो आंतों में घाव या छाला होने की वजह से होता है। यह मुख्य रूप से पाचन तंत्र की लाइनिंग में होता है। पेट के साथ यह कई बार छोटी आंत में भी हो जाता है। इस प्रकार पेट में अल्सर होना भी मल में रक्त आने की एक वजह होती है। इसके होने पर मल का रंग गाढ़ा, डायरिया, कम भूख लगना, पेट में जलन जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं।


इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (Inflammatory Bowel Disease)-

जब डाइजेस्टिव ट्रैक्ट (पाचन मार्ग) में क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन होता है तो इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (पेट दर्द रोग) होता है। जिसके कारण मल में खून आने के साथ डायरिया की दिक्कत भी हो सकती है। कई बार इन परेशानियों की वजह से मल में मवाज (पस) या श्लेष्मा (म्यूकस) भी दिखता है।


बवासीर (Piles)-

 बवासीर एक प्रकार की सूजन है। जो गुदा वाले निचले हिस्से (मलाशय) में होती है। गुदा और निचले मलाशय के भीतर अंदर की ओर छोटी-छोटी रक्त वाहिकाओं (नसों) का नेटवर्क होता है। कभी-कभी यह नसें अधिक चौड़ी हो जाती हैं और इनमें सामान्य से अधिक रक्त भर जाता हैं। तब यह नसें और ऊपर की ऊतकें (Tissues) बवासीर नामक सूजन को उत्पन्न करती हैं। बवासीर कुछ लोगों में बहुत आम और कुछ लोगों में अधिक रक्तस्राव विकसित करता हैं। शौचालय जाने पर रक्तस्राव होना इसका सबसे आम लक्षण है। लेकिन बड़ा बवासीर शौचालय जाने पर श्लेष्म का रिसाव (Mucus leakage), दर्द, जलन और खुजली उत्पन्न कर सकता है।


एनल फिशर (Anal Fissure)-

यह मलद्वार के चारों ओर होने वाला एक प्रकार का कट या दरार होती है। जो तेज दर्द और मल से खून आने का कारण बनती है। कई बार कब्ज से मलद्वार पर पड़ने वाले दबाव के कारण भी एनल फिशर (गुदा में दरार) की समस्या होती है। एनल फिशर एनस की लाइनिंग टूटने की वजह से होता है। गुदा में दरार पड़ना वास्तव में गुदा की त्वचा का फटना होता है। गुदा का फटना आमतौर पर छोटा परंतु बहुत दर्दनाक होता है। अक्सर गुदा में दरार होने पर थोड़ी मात्रा में रक्तस्राव भी होता है। जिसे मल त्यागते समय देखा जा सकता है।


फिस्टुला (Fistula)-

मलद्वार के मध्य भाग में गुदा ग्रंथियां होती हैं। जिनमें कभी-कभी संक्रमण हो जाता हैं। जिससे गुदा पर फोड़ा हो जाता है और कुछ समय बाद उससे मवाद (पस) आने लगता है। इसके लक्षण निम्न है-

  • यह कैंसर, रेडिएशन, ट्रामा, क्रोहन रोग आदि का कारण हो सकता है।
  • यह मोटापे और लंबे समय तक बैठने से भी हो सकता है।
  • मुंह से मवाद आना, सूजन, दर्द आदि के रूप में इसकी पहचान की जा सकती है।
  • एंटीबायोटिक दवाओं से इसका इलाज किया जा सकता है।

मल में खून आने पर निम्न बातों पर ध्यान दें

  • प्रतिदिन करीब 8 से 10 गिलास पानी जरूर पीएं।
  • प्रतिदिन स्नान करें और गुदा क्षेत्र को ठीक से साफ करें।
  • चाय, कॉफी, धूम्रपान आदि का सेवन करने बचें।
  • मल त्यागते समय अधिक जोर न लगाएं।
  • शराब के सेवन से दूरी बनाएं।

क्या हैं इसके घरेलू उपाय?

  • आयुर्वेद में बवासीर और फिस्टुला जैसी बीमारी के इलाज में छाछ का सेवन औषधि की तरह काम करता है।
  • पाइल्स की शुरुआती दौर को खानपान के बदलाव से ठीक किया जा सकता है। इसलिए ऐसे समय पर खानपान का विशेष ध्यान रखें।
  • आयुर्वेद में मल में खून आना, कम भूख लगने जैसी समस्या में चावल और मूंग दाल का पानी पीने की सलाह दी जाती है।
  • भोजन में हरी सब्जियां, दाल, सोयाबीन, दानामेथी, अलसी के बीज इत्यादि फाइबर और प्रोटीन युक्त चीजों का प्रयोग करना चाहिए।
  • कब्ज, एनस (गुदा) में मवाद, मल की समस्या में तला-भुना, तेज मिर्च-मसाले और मैदा आदि का सेवन न करें।
  • बीज युक्त सब्जियों का सेवन कम से कम करें।
  • प्रतिदिन रात को सोते समय एक चम्मच त्रिफला चूर्ण को गुनगुने पानी के साथ लें। इसके प्रयोग से कब्ज आदि समस्याओं में राहत मिलती है।
  • छोटी हरड़ को घी में फुलाकर, उसका पाउडर बनाकर पानी के साथ लेने से फायदा होता है।
  • दूध में शहद डालकर पीने से मल में खून आने वाली समस्याओं में लाभ मिलता है।
  • इसके अतिरिक्त शहद के साथ ओट्स, कॉर्न फ्लेक्स, हर्बल-टी आदि का सेवन करना भी अच्छा होता है।
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जानें, पेट दर्द के प्रकार, कारण और घरेलू उपाय

Posted 24 May, 2022

जानें, पेट दर्द के प्रकार, कारण और घरेलू उपाय

वर्तमान समय में पेट दर्द एक आम समस्या बन गई है। इसका मुख्य कारण है लोगों की अनियमित जीवन शैली। जिसका सीधा असर उनके पाचन तंत्र पर पड़ता है। घंटो तक बैठ कर काम करना, समय न मिलने के कारण जंक फूड का अधिक सेवन करना, ठीक तरह से नींद न लेना आदि कारणों से बदहजमी या पेट संबंधी समस्याएं पैदा होती हैं। जो पेट दर्द का मुख्य कारण बनते हैं।   


क्या होता है पेट दर्द?

पेट में सुई या कील की चुभन जैसा महसूस होना पेट दर्द कहलाता है। यह किसी व्यक्ति के पेट के ऊपरी या निचले हिस्से में होता है। जिसकी तीव्रता कभी हल्की तो कभी बहुत तेज़ होती है। पेट का यह दर्द थोड़ी देर से लेकर काफी देक तक हो सकता है। यह दर्द पेट के ऊपरी और निचले हिस्से में दाएं या बाएं किनारे पर और मध्य हिस्से में होता है। 


पेट दर्द के प्रकार;


पेट दर्द मुख्यत: तीन प्रकार के होते हैं। पहला सामान्य पेट दर्द, दूसरा स्थानीय पेट दर्द और तीसरा ऐंठन (क्रैम्पिंग) का दर्द।


सामान्य पेट दर्द- यह दर्द पेट के आधे या उससे अधिक हिस्से में होता है। जो अलग-अलग बीमारियों की वजह से होता है और कुछ देर में बिना उपचार के खुद ठीक हो जाता है। अधिकांश सामान्य पेट दर्द अपच जैसी समस्याओं के कारण होता है।


स्थानीय पेट दर्द - यह दर्द पेट के एक हिस्से में होता है। जो अचानक शुरू होता है और समय के साथ बढ़ने लगता है। कई बार स्थानीय पेट दर्द एक गंभीर समस्या का लक्षण भी होता है। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है- अपेंडिसाइटिस (पथरी) का दर्द। जो पेट के एक स्थाई हिस्से में होता है और कुछ समय के बाद एक बड़ी बीमारी बन जाता है। अधिकांश पेप्टिक अल्सर (पेट के छाले) का दर्द भी पेट के एक हिस्से में शुरू होता है और धीरे-धीरे गंभीर हो जाता है। इस रूप में स्थानीय पेट दर्द, पेट के किसी अंग की सूजन का लक्षण भी होता है।


ऐंठन (क्रैम्पिंग) का दर्द - ऐंठन के दर्द को क्रैम्पिंग भी कहा जाता है। जो आता-जाता रहता है। अधिकांश क्रैम्पिंग का दर्द सामान्य ही होता है। जो ठीक से मल पारित न होने और पेट में गैस बनने की वजह से होता है। कई महिलाओं में यह मासिक धर्म के दौरान भी होता है। वैसे तो ऐंठन का दर्द चिंता का विषय नहीं है। लेकिन 24 घंटे या उससे अधिक समय तक रहने पर यह एक गंभीर समस्या का कारण बन सकता है।


पेट दर्द के कारण;


कई कारणों से पेट दर्द होता है। जो सामान्य गैस बनने से लेकर अपेंडिसाइटिस जैसे गंभीर बीमारी भी हो सकते हैं। इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान भी महिलाओं को पेट दर्द होता है। आइए जानते हैं पेट दर्द के मुख्य कारणों को-

  • फूड पॉइजनिंग।
  • फूड एलर्जी।
  • अपच।
  • पेट का अल्सर या फोड़ा।
  • कब्ज इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम।
  • अपेंडिसाइटिस।
  • पाचन तंत्र की सूजन (Crohn's disease)।
  • पित्ताशय की पथरी।
  • मूत्र-पथ के संक्रमण।
  • पेट का फ्लू (गैस्ट्रोएन्टराइटिस)।
  • एंडोमेट्रिओसिस।
  • अल्सरेटिव कोलाइटिस (बड़ी आंत में सूजन आना)।
  • मासिक धर्म में ऐंठन।
  • लैक्टोज असहिष्णुता (lactose intolerance)।

पेट के दर्द के कुछ अन्य कारण-

  • ज्यादा भोजन करना।
  • ज्यादा पानी पीना।
  • अधिक समय तक तेल और तेज मिर्च मसाला वाला खाना खाना।
  • गंदा पानी पीना।
  • पिज्जा, बर्गर, आइसक्रीम, समोसा जैसी चीजों को ज्यादा खाना।
  • अधिक समय तक खाली पेट काम करना।
  • बासी खाना खाना।
  • ड्राई मीट खाना।

पेट दर्द से बचने के घरेलू उपाय;


पेट दर्द को कम करने के लिए लोग सबसे पहले घरेलू नुस्खों का सहारा लेते हैं। क्योंकि घरेलू नुस्ख़े जल्दी मिल जाते हैं। जो दर्द से शीघ्र राहत दिलाने में मदद करते हैं। चलिए जानते हैं इन घरेलू उपचारों के बारे में-


काला नमक-


काला नमक, यवक्षार (Yavakshar), अजवायन, सोंठ और हिंग को समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। अब सुबह नाश्ते और रात को खाने के बाद गुनगुने पानी से आधा चम्मच चूण का सेवन करें। इससे पेट की गुड़गुड़ाहट और पेट की ऐंठन में राहत मिलती है।




अजवायन और सोंठ को समान मात्रा में अच्छी तरह पीसकर चुर्ण बना लें। अब इस चूर्ण का सेवन गुनगुने पानी के साथ खाली पेट या नाश्ते के बाद करें। यह चूर्ण पेट दर्द को कम करने और भूख को बढ़ाने का काम करता है।


लहसुन का रस-


एक छोटा चम्मच लहसुन के रस में तीन छोटे चम्मच सादा पानी मिलाकर एक हफ्ता तक सेवन करने से गैस और पेट दर्द में लाभ मिलता है।




पुदीना के रस में, शहद और नींबू का रस मिलाकर ताजे पानी के साथ सेवन करने से पेट दर्द में आराम मिलता है।


नींबू का रस-


नींबू के रस में काली मिर्च और सोंठ के चूर्ण को मिलाकर गरम पानी के साथ दो दिनों तक लेने से पेट दर्द और उल्टी में राहत मिलती है।


सूखी अदरक-

  • सूखी अदरक, काली मिर्च, हींग, सेंधा नमक को पीसकर पेस्ट बना लें। अब नाभि के चारों ओर गीले आटे की कटोरी जैसी आकृति बनाएं और इस पेस्ट को हल्के गुनगुने पानी में मिलाकर नाभि में डालें। यह क्रिया उदरशूल (Abdominal colic) और पेट दर्द से राहत दिलात में मदद करती है।
  • गुड में अजवायन कूट कर उसके दो भाग कर लें। इसके एक भाग को सुबह और दूसरे भाग को शाम में खाने से उल्टियां रुकती हैं और पेट का फूलना भी कम होता है।
  • अजवायन और हींग को मिलाकर गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से पेटदर्द, गैस, जी मिचलाना आदि समस्याओं में आराम मिलता है।

जायफल और नींबू-


जायफल को नींबू के रस में मिलाकर चटाने से पेट दर्द और गैस की समस्या में आराम मिलता है।




हरड़, काला नमक, पिप्पली और अजवायन को अच्छी तरह पीसकर गरम पानी के साथ सुबह नाश्ते और रात को खाने के बाद लेने से पेट की गैस कम होती है। साथ ही पेट भी अच्छे से साफ हो जाता है।


पेट दर्द होने पर ध्यान रखने वाली बातें;   

  • अधिक तैलीय चीजों का सेवन कम करें।
  • मैदा और बेसन से बनी चीजों का सेवन कम करें।
  • चाय और कॉफी का सेवन कम करें।
  • व्यायाम के बाद ज्यादा पानी न पिएं।
  • रात के समय हल्का भोजन करें। जो आसानी से पच सकें और गैस न बनाएं।
  • तेज मिर्च-मसालों वाला खाना न खाएं।
  • समय से भोजन करने की आदत डालें।
  • रात के समय पूरी नींद लें।
  • सुबह उठकर एक से दो गिलास गुनगुना पानी पिएं। जिससे पेट अच्छी तरह से साफ हो सके।
  • मल को ज्यादा देर तक न रोकें।

कब जाएं डॉक्टर के पास?

  • पेट में असहनीय दर्द होने पर।
  • पेट दर्द के साथ उल्टी होने पर।
  • पेट में सूजन महसूस होने पर।
  • पेट में तेज जलन होने पर।
  • खाना पचाने में अधिक दिक्कत होने पर।
  • दवा खाने के बाद भी पेट दर्द सही न होने पर।
  • पेट दर्द के साथ यदि मल में खून आने लगे और कब्ज की अधिक दिक्कत होने लगे तो इस स्थिति में तुरंत डॉक्टर से सम्पर्क करें। क्योंकि ये यूटेरस कैंसर का संकेत भी हो सकता है।
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जानें, क्या होता है माइग्रेन? इसके लक्षण और उपचार के बारे में

Posted 24 May, 2022

जानें, क्या होता है माइग्रेन? इसके लक्षण और उपचार के बारे में

माइग्रेन एक प्रकार का सिरदर्द है, जो मस्तिष्क में तंत्रिका तंत्र (Nervous system) के विकार के कारण होता है। यह दर्द बहुत तकलीफ दायक होता है। माइग्रेन होने पर व्यक्ति के अंदर उल्टी, मतली, प्रकाश तथा ध्वनि के प्रति संवेदनशीलता (Sensitivity) बढ़ जाती है। इसके दर्द की अवधि कुछ घंटों से लेकर कई दिनों तक हो सकती है। माइग्रेन को आनुवांशिक (Genetic) भी माना जाता है।


माइग्रेन क्या है?


माइग्रेन को हिंदी में अधकपारी कहा जाता है। यह मूल रूप से तंत्रिका-विज्ञान (Neurological) से जुड़ी एक जटिल समस्या है। माइग्रेन अक्सर कष्टदायक सिरदर्द होता है। इसमें सिर की एक ओर या कभी कभी दोनों तरफ झनझनाहट वाला असहनीय दर्द होता है। माइग्रेन के समय सिर के नीचे की धमनियां बढ़ जाती हैं और कभी-कभी दर्द वाले हिस्से में सूजन भी आ जाती है। सामान्यतः यह समस्या युवावस्था में आरम्भ होती है।


आयुर्वेदिक डॉक्टरों के अनुसार माइग्रेन दिमाग या चेहरे की रक्त वाहिनियों ( Blood vessels ) में हुई गड़बड़ी से होने वाला दर्द है। इसके अलावा माइग्रेन खान-पान में बदलाव, तनाव में बढ़ोतरी या ज्यादा सोने से भी हो सकता है।


माइग्रेन के कारण;


हार्मोनल परिवर्तन के कारण होता है माइग्रेन-


महिलाओं के शरीर में होने वाले प्रमुख हार्मोनल परिवर्तन माइग्रेन सिरदर्द की शुरुआत का कारण बन सकते हैं। मासिक धर्म, गर्भावस्था और रजोनिवृत्ति (Menopause) जैसे विभिन्न कारणों से के शरीर में बहुत सारे हार्मोनल परिवर्तन होते हैं। अस्थिर हार्मोनल स्तर भी कभी-कभी सिरदर्द का कारण हो सकता है। एक मेडिकल अध्ययन के अनुसार हार्मोनल परिवर्तन के कारण माइग्रेन पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अधिक प्रभावित करता है।


वातावरण में बदलाव के कारण होता है माइग्रेन-


वातावरण में बदलाव होना भी माइग्रेन का एक मुख्य कारण माना जाता है। कभी-कभी बहुत तेज ध्वनि, अस्थिर रोशनी, अधिक बदबू और शोर के कारण  संवेदनात्मक उत्तेजना बढ़ जाती है। जिससे माइग्रेन सिरदर्द हो सकता है। तापमान में परिवर्तन जैसे तेज धूप, अत्यधिक गर्मी या अत्यधिक ठंड आदि भी माइग्रेन का कारण होते हैं।


शराब-धूम्रपान का दुष्परिणाम है माइग्रेन-


शराब पीने के बाद होने वाला हैंगओवर या अत्याधिक धूम्रपान भी माइग्रेन को पैदा करने का काम करता है। इसके अलावा मीठे पदार्थ और बेहद मसालेदार आहार भी माइग्रेन को उत्पन्न (Trigger) कर सकते हैं। 


कैफीन के अत्यधिक सेवन से होता है माइग्रेन


कैफीन का अत्याधिक प्रयोग करने वाले लोग अगर अचानक कैफीन लेना बंद कर दें तो उन्हें सिर दर्द की शिकायत रहती है। अर्थात कॉफी का अत्यधिक सेवन अचानक से बंद करना भी माइग्रेन का एक कारण हो सकता है।


माइग्रेन के लक्षण;

  • सिर के एक हिस्से में या कभी-कभी दोनों तरफ तेज झनझनाहट के साथ असहनीय दर्द होना माइग्रेन का प्रमुख लक्षण है।
  • माइग्रेन सिरदर्द से पीड़ित लोगों को अक्सर नियमित गतिविधियों को करने में असमर्थता, आंखों में दर्द, मतली और उल्टी का अनुभव होता है।
  • माइग्रेन से पीड़ित लोग प्रकाश, ध्वनि और गंध परिवर्तनों के प्रति अति संवेदनशील हो सकते हैं।
  • माइग्रेन के दौरान आंखों में भयानक दर्द होता है और पलकें झपकाने में भी जलन होती है।
  • माइग्रेन सिरदर्द के कारण मूड में परिवर्तन बहुत तेजी से होता है। ऐसे में कुछ मरीज अचानक बिना किसी कारण के बहुत ही उदास महसूस करते हैं या ज्यादा उत्साहित हो जाते हैं।
  • नियमित गतिविधियों जैसे घूमना या सीढ़ियों पर चढ़ने से माइग्रेन का दर्द और अधिक बढ़ जाता है।
  • बार-बार पेशाब आना भी माइग्रेन का लक्षण हो सकता है। पर यह लक्षण हर किसी में देखने को नहीं मिलता।

माइग्रेन के लिए घरेलू उपाय;


शुरूआती माइग्रेन की समस्या से छुटकारा पाने के लिए आमतौर पर निम्न घरेलू उपायों का प्रयोग किया जाता है।


आइस पैक से मिलती है माइग्रेन में राहत-


आइस पैक की मदद से माइग्रेन के कारण सूजी हुई मांसपेशियों को रिलैक्स करने में फायदा पहुंचता है। इस घरेलू उपचार के लिए एक साफ तौलिए में आइस के कुछ टुकड़े रखें और उससे सिर, गर्दन और माथे के पीछे 10-15 मिनट सिकाई करें।


सिर की मालिश करने से दूर होता है माइग्रेन-


तनाव को दूर करने के लिए सिर की मालिश करना बहुत कारगर उपाय है। ऐसा करने से शरीर में रक्त संचार बढ़ता है। जिससे माइग्रेन का दर्द कम होता है।  माइग्रेन से पीड़ित व्यक्ति के सिर के पीछे वाले हिस्से की मालिश करने से उसे दर्द में राहत मिलती है।


पिपरमिंट है माइग्रेन से राहत दिलाने में फायदेमंद-


पिपरमिंट (पुदिना) में सूजन को कम करने के गुण पाए जाते हैं। यह मन को स्थिर और शांत करने में भी मदद करता है। पिपरमिंट से बनी चाय और पिपरमिंट ऑयल की कुछ बूंदों को शहद के साथ पानी में मिलाकर पीने से माइग्रेन में लाभ मिलता है। इसके अलावा पिपरमिंट ऑयल से सिर और माथे पर मालिश करने से भी रोगी को फायदा होता है।


अदरक के सेवन से मिलता है माइग्रेन में लाभ-


माइग्रेन के जी मचलाने या उल्टी होने जैसे लक्षणों से राहत दिलाने में अदरक सहायता करता है। इसके अलावा अदरक के प्रयोग से माइग्रेन के कारण हुई सूजन और दर्द में भी राहत मिलती है। अदरक के टुकड़ों को पानी में उबालकर ठण्डा कर लें और इस पानी में शहद और नींबू की कुछ बूंद डालकर पीने से माइग्रेन में राहत मिलती है।


तुलसी का तेल है माइग्रेन में असरदार-


तुलसी का तेल मांसपेशियों को आराम देता है। जिससे तनाव कम होता है और दर्द से राहत मिलती है। इसी कारण तुलसी के तेल का इस्तेमाल करने से माइग्रेन के दर्द में काफी आराम मिलता है


माइग्रेन से बचाव के उपाय;

  • बदलते तापमान से बचने की कोशिश करें। गर्मियों के दिनों में एयरकंडिशनर का इस्तेमाल हुए, एक दम ठण्डे से गर्म में न निकलें।
  • गर्मी के मौसम में बाहर निकलते समय सूरज की सीधी रोशनी से बचें तथा चश्में (Sun glasses) या छाते का इस्तेमाल करें।
  • ज्यादा मिर्ची या बेहद तेल-मसाले वाले खाने से दूरी बनाएं।
  • नियमित रूप से 30 मिनट तक योगासन या व्यायाम जरूर करें।
  • शराब और धूम्रपान के सेवन से बचें।
  • प्रतिदिन सुबह नंगे पांव घास पर चलने की आदत डाले। यह तनाव को काम करने के साथ हॉर्मोन को भी बैलेंस करता है। जिससे माइग्रेन का खतरा कम होता है।

माइग्रेन के प्रकार;


माइग्रेन दो प्रकार के होते हैं- क्लासिक माइग्रेन और नॉन क्लासिक माइग्रेन। 


क्लासिक माइग्रेन-


क्लासिक माइग्रेन में बहुत सारे ऐसे लक्षण होते हैं, जो रोगी को माइग्रेन का दौरा पड़ने का संकेत देते हैं। जैसे सिर दर्द की शुरुआत से पहले धुंधला दिखाई देना, कुछ मामलों में कंधे में जकड़न व जलन के लक्षण भी देखने को मिलते हैं। क्लासिक माइग्रेन की अवस्था में मरीज के शरीर की रक्तवाहिनियां सिकुड़ने लगती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से तुरन्त सम्पर्क करना अच्छा होता है।


नॉन क्लासिक माइग्रेन-


नॉन क्लासिक माइग्रेन में समय-समय पर सिर में तेज दर्द होता है, किंतु अन्य लक्षण नजर नहीं आते। नॉन क्लासिक माइग्रेन के दौरान सिर दर्द की शुरुआत के साथ ही दर्द निवारक दवा लेना मरीज को आराम पहुंचाता है।


कब जाएं डॉक्टर के पास?


आमतौर पर माइग्रेन कुछ दिनों के अंदर खुद ठीक हो जाता है। लेकिन निम्नलिखित गंभीर लक्षणों का अनुभव होने पर तुरंत चिकित्सक के पास जाना चाहिए।

  • सिर के एक हिस्से में असहनीय सिरदर्द होने पर।
  • मानसिक भ्रम और कठोर गर्दन के साथ सिरदर्द होने पर।
  • सीढ़ियां चढ़ने और आने-जाने जैसी सामान्य गतिविधियों में कठिनाई होने पर।
  • तेज धूप के कारण आंखे चुंधियाना या तेज आवाज, बदबू आदि के कारण तेज सिर दर्द होने पर।
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अधिक ठंड लगने के कारण और उससे बचने के घरेलू नुस्खे

Posted 24 May, 2022

अधिक ठंड लगने के कारण और उससे बचने के घरेलू नुस्खे

अधिक ठंड-सर्दी की शुरुआत हो चुकी है। जो अपने साथ कई तरह की परेशानी लेकर आती है। जैसे-जैसे सर्दी बढ़ती है वैसे ही इससे होने वाले साइड-इफेक्ट्स (Side-effect) भी बढ़ने लगते हैं। जिसका असर सबसे ज्यादा बच्चे और बड़े-बुजुर्गों पर देखने को मिलता है। इसलिए इस सर्द भरे मौसम से खुदको बचाने के लिए कुछ लोग अलाव (आग) का सहारा लेते हैं तो कुछ लोग रजाई-कंबल में रहना पसंद करते हैं। क्योंकि अलाव और रजाई से हमारे शरीर को शीघ्र ही गर्मी मिलती है। लेकिन कुछ लोगों को इतनी ठंड लगती है कि घंटों रजाई में रहने के बाद भी उनके हाथ-पैर ठंडे रहते हैं। जिसको वे या तो अनदेखा कर देते हैं या फिर ठीक से समझ नहीं पाते लेकिन यदि हाथ-पैर लगातार ठंडे ही रहते हैं, तो यह कुछ शारीरिक समस्‍या का संकेत भी हो सकता है। जिनको जानना और समझना बेहद जरूरी है।


क्या है हाथ- पैरों के लगातार ठंडे रहने की वजह?


हाथ-पैरों का ठंडा होने का सबसे बड़ा कारण उन्हें पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन और रक्त का न मिलना इहै। यह शरीर के खराब ब्लड सर्कुलेशन (रक्त प्रवाह) के कारण होता है। इसके अतिरिक्त नसों की क्षति, मधुमेह, हाइपोथायराइडिज्म (Hypothyroidism), क्रॉनिक फैटिग सिंड्रोम, तंत्रिका क्षति (Nerve Damage), हाइपोथर्मिया (Hypothermia), पैरों में लगातार दर्द का रहना, अधिक थकान और एनीमिया आदि समस्याओं के कारण भी अधिक ठंड लगती है। इसके अलावा यदि आप अधिक शराब का सेवन करते हैं या स्‍मोकिंग करते हैं या फिर आपके शरीर में किसी पोषण की कमी है तो भी आपके हाथ-पैर हर वक्‍त ठंडे रह सकते हैं।


अधिक ठंड लगने की समस्या से बचने के घरेलू नुस्खे-


गर्म पानी से नहाए-


सर्दियों के दिनों में नहाने के लिए हल्के गर्म पानी का प्रयोग करें। इसके अतिरिक्त गर्म पानी में नमक डालकर उससे हाथ-पैरो की सिकाई करें। इस प्रक्रिया में पानी की गर्माहट हाथ-पैरों को गर्म प्रभाव देती है और नमक शरीर को मैग्नीशियम देता है, जिससे आपके हाथ-पैर जल्दी गर्म होते हैं।


तेल की मालिश करें-


हाथ-पैरों की गर्म तेल से मालिश करें। इससे आपके हाथ-पैर जल्दी गर्म होते हैं। इसके अतिरिक्त गर्म तेल से मसाज करने से रक्त का प्रवाह अच्छा रहता है और ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है।


मैग्नीशियम सल्फेट (Magnesium Sulfate) का इस्तेमाल करें-


एक टब गर्म पानी में आधा कप मैग्नीशियम सल्फेट को मिलाकर, इसमें पैरों को 15-20 मिनटों तक डुबोकर रखें। इस प्रक्रिया को सप्ताह में तीन से चार बार करने से पैरों के दर्द और सूजन आदि में लाभ मिलता है।


हाइड्रो थैरेपी (Hydro Therapy) का इस्तेमाल करें-


हाइड्रो थैरेपी का मतलब जलचिकित्सा से हैं । इस थैरेपी में गर्म और ठंडे, दोनों तरह के पानी का प्रयोग किया जाता है। इसमे आपको पहले ठंडे पानी में पैरों को दो मिनट तक डुबो कर रखना होता है और फिर एक मिनट के लिए गरम पानी में। इस प्रक्रिया को 15-20 मिनट तक करने के बाद पैरों को तौलिये ये पोछ कर मोजे पहन लें। ऐसा करने से पैरों के दर्द में आराम मिलता है और सर्दी-गर्मी का संतुलन बना रहता है। इस थैरेपी को सप्ताह में तीन से चार बार करें।


अदरक का सेवन करें-


दो कप पानी में छोटे अदरक के टुकड़े को डालकर दस मिनट के लिए उबालकर छान लें। अब इस पानी में शहद मिलाकर दिन में दो से तीन बार पिएं। ऐसा करने से शरीर की गर्माहट बनी रहती है।


ग्रीन-टी (Green Tea) का सेवन करें-


दिन में दो से तीन कप ग्रीन-टी (हरी चाय) का सेवन करें। ध्यान रहें ग्रीन-टी में चीनी की जगह पर शहद का प्रयोग करें। इसके अतिरिक्त एक बाल्टी गर्म पानी में दो से तीन चम्मच हरी चाय पत्ती को डालकर इसमें पैरों को दस मिनट के लिए रखें। इस प्रक्रिया को दिन में दो बार करें। ऐसा करने से पैर जल्दी गर्म होते हैं।


आयरन युक्त पदार्थों का सेवन करें-


सर्दियों में शरीर को गर्म रखने के लिए आयरन बेहद जरूरी होता है। शरीर में आयरन की कमी होने से अधिक ठंड लगती है। इसलिए जरूरी है शरीर को गर्म रखने के लिए आयरन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करें। इसके लिए हरी पत्तेदार सब्ज़ी, सोयाबीन, सेब, जैतून, चुकंदर, खजूर आदि का अधिक सेवन करें। यह पदार्थ सर्दियों में शरीर को होने वाली आयरन की कमी को पूरा करते हैं और शरीर को तंदुरुस्त रखते हैं। इसके अलावा आयरन थाइराइड ग्रन्थि (Thyroid Gland) के स्त्राव (Discharge) को भी संतुलित करता है।


मैग्नीशियम युक्त पदार्थों का सेवन करें-


सर्दियों में मैग्नीशियम युक्‍त आहार भी शरीर के लिए बेहद जरूरी है। क्योंकि मैग्नीशियम ब्‍लड सर्कुलेशन को ठीक रखता है और शरीर को गर्म रखने में मदद करता है। इसलिए सर्दियों में


मैग्नीशियम युक्‍त पदार्थ जैसे- पालक, चुकंदर, ब्रॉक्‍ली, सीवीड (समुद्री खरपतवार), रूचिरा (Avocado), खीरा, बींस (सेम), आलू, साबुत अनाज, कद्दू के बीज, तिल के बीज और बादाम आदि जरूर खाएं।


शरीर में पानी की कमी न होने दें-


अक्सर लोग सर्दियों में कम पानी पीते हैं, जिससे शरीर के रक्त प्रवाह का स्तर गड़बड़ा जाता है। इसलिए शरीर में पानी की कमी न होने दें। क्योंकि शरीर में पानी की कमी डी-हाइड्रेड का कारण बनती है। जिसकी वजह से हमें अधिक ठंड लगती है, इसलिए खुद को स्वस्थ रखने के लिए दिन में कम से कम दो लीटर पानी जरूर पिएं। यदि आप गुनगुने पानी का सेवन करते हैं तो यह और भी बेहतर होगा।


घास पर चलें-


सुबह के वक्त घास पर नंगे पैर चलना भी शरीर के लिए अच्छा होता है। इसी दौरान पैरों की एक्सरसाइज करने से शरीर को पर्याप्त गर्मी मिलती है। इसलिए सर्दियों के दिनों में घास पर नंगे पैर चलना और एक्सरसाइज करना अधिक महत्वपूर्ण है।


अधिक टाइट कपड़े न पहने-


सर्दियों के दिनों में टाइट और अधिक कपड़े न पहने। क्योंकि ज्यादा और टाइट कपड़े ऊपर से तो हमें सर्द हवाओं से बचा लेते हैं लेकिन अंदर से हमारे शरीर के ब्‍लड सर्कुलेशन को रोक लेते हैं, जोकि हमारे लिए घातक (Deadly) हो सकता है। इसलिए इस तरह की स्थिति से बचें और टाइट कपड़ों की जगह पर ऊनी कपड़ों का इस्तेमाल करें।


कब जाएं डॉक्टर के पास?

  • यदि आपको अधिक ठंड लगने के साथ हाथ-पैरों का रंग पीला पड़ रहा है।
  • यदि आपको हाथ-पैरों में ठंड लगने के साथ झुनझुनी या सुन्नपन महसूस हो रहा है।
  • यदि ठंड के कारण आपके हाथ-पैरों में छाले पड़ रहे हैं।
  • यदि ठंड से आपकी त्‍वचा टाइट हो रही है तो तुंरत डॉक्‍टर को दिखाएं।
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Cholesterol: Its Types, Symptoms, Remedies & more

Posted 21 December, 2021

Cholesterol: Its Types, Symptoms, Remedies & more


cholesterol symptoms & remedies -Cholesterol is a fatty substance produced by the liver and is an essential part of the proper functioning of the body. But as they say,

“Too much of anything is hazardous to humans”
  • This stands absolutely true for Cholesterol as high cholesterol levels worsen the condition of a person and result in heart and neural illnesses.
  • Before going further, let us read more about Cholesterol, its types, high cholesterol symptoms, and ways of reducing cholesterol with the intake of a cholesterol-lowering diet.

Cholesterol and its Types(cholesterol symptoms & remedies )

Cholesterol is a waxy substance which is carried through blood on proteins known as Lipoproteins, these are mainly of two types-


High-Density Lipoproteins (HDL Levels)

Also known as “Good Cholesterol”, it carries the increased cholesterol from parts of your body back to the liver where the excess cholesterol is removed from your body.


Low-Density Lipoproteins (LDL Levels)

Known as “Bad Cholesterol”, LDL constitutes the major part of your body’s cholesterol. High LDL cholesterol levels result in heart attacks, chest pain, and strokes.


Factors leading to High Cholesterol


Poor diet- Eating animal products, baked cookies, crackers, or microwaved popcorns contains saturated fat and trans fats that can raise your cholesterol level. Foods that have a high cholesterol level, such as red meat and fat-based dairy products also increases your cholesterol.


Heredity- Genetically carried high cholesterol also run in families.


Obesity- Gaining weight is one of the major reasons for high cholesterol as a Body Mass Index (BMI) of 30 or more puts you at risk.


Lack of exercise- Workouts helps in boosting your body’s good cholesterol whereas lack of it would increase bad cholesterol.


Smoking- Smoking cigarettes have immensely harmful effects one among those is that it damages the walls of your blood vessels, putting them at greater risks of fat accumulation and also reduces your good cholesterol.


Age- As a person ages, the liver becomes less capable to remove LDL cholesterol, and hence the bad cholesterol keeps increasing.


Diabetes- High blood sugar damages the lining of your arteries and contributes to higher levels of Very-Low-Density Lipoprotein (VLDL) and lowers the HDL cholesterol level.


Symptoms of High Cholesterol


There are no symptoms that would indicate a high cholesterol level and only a blood test would help you know about it. However, if you notice any of the below mentioned ailments you should see a doctor-

  • If you have a high blood pressure.
  • You are overweight.
  • If you smoke or drink too much.

Tests for Cholesterol Levels

  • Total cholesterol
  • Non- HDL
  • Low density lipoprotein (LDL)
  • High density lipoprotein (HDL)

Healthy levels are mentioned in the table below-


Ways of Reducing Cholesterol


Since an unhealthy lifestyle is the major cause of increased cholesterol levels so following a controlled and healthy routine would automatically result in lowering your cholesterol levels and keeping it under control. 


Following are some of the ways that can help you-

  • Eat a low-salt diet and stress on having fruits, vegetables, whole grains, while avoiding saturated fats and trans fats which are primarily found in red meat, or full-fat dairy products.
  • Consuming foods with Omega-3 fatty acids would help in maintaining your heart health. Include salmon, mackerel, herring, walnuts, and flaxseeds in meals.
  • Soluble fibers reduce the absorption of cholesterol into your bloodstream. Food items such as oatmeal, kidney beans, brussels sprouts, apples, and pears would be great to consume.
  • Whey protein, as a supplement, lowers LDL cholesterol and total cholesterol as well as keeps the blood pressure in control. We mainly find it in dairy products.
  • Focus on exercise and always maintain a healthy weight that would not only keep your cholesterol at moderate levels but would also keep you active and refreshed.
  • Quit smoking and drink alcohol occasionally, if at all.
  • Don’t stress too much as stress results in certain imbalances in your body. If you keep yourself in a jolly mood you may win over a lot of problems.

Home Remedies for Cholesterol Control

  • Adding natural ingredients in your food such as Amla, Coriander seeds, Garlic, Turmeric, and Honey would cut down your cholesterol. Include these in your meals and reach the desired results.
  • Drinking fresh red cranberry juice, citrus juices, red wine, grape juice, cherry juice, and pomegranate juice would also help.
  • Having seen the dangerous effects of High Cholesterol brings the need for Ayurvedic Cholesterol Lotion i.e. Aarogyam Shakti Cholesterol Lotion which is 100% organic, safe, and easy to use. It not only provides nourishment to the skin but also helps in balancing cholesterol levels. This is an easy way of watching over your cholesterol without having to do much change in your lifestyle.

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बढ़ते कोलेस्ट्रॉल के लक्षण, कारण और इससे बचने के घरेलू उपाय

Posted 24 May, 2022

बढ़ते कोलेस्ट्रॉल के लक्षण, कारण और इससे बचने के घरेलू उपाय

बढ़ते कोलेस्ट्रॉल के लक्षण-कोलेस्ट्रॉल की समस्या हमारे आधुनिक खानपान और जीवन शैली से उत्पन्न हुई है। जैसे-जैसे हम जीवन शैली में बदलवों का अनुसरण कर रहे हैं, वैसे ही नये-नये रोगों को उत्पन्न करने का माध्यम बनते जा रहे हैं। और हमारा शरीर केमिकल्स का भंडार बनता जा रहा है। इसका बढ़ना आज प्रत्येक व्यक्ति के लिए बड़ी समस्या बन गयी है, जो भविष्य में हार्ट-अटैक की संभावना को बढ़ा देती है। पर हम अपनी जीवन शैली में बदलाव लाकर इस बीमारी की संभावना को कम कर सकते हैं। इस लेख में हम इन्हीं बदलावों और घरेलू उपायों के बारे में जानेंगे।


क्या होता है कोलेस्ट्रॉल?


कोलेस्ट्रॉल लिवर से निकलने वाला एक वसा है, जो शरीर के कार्यों को सुचारु रूप से करने के लिए आवश्यक होता है। यह मोम की तरह चिकना पदार्थ होता है, जो रक्त में मौजूद प्लाज्मा की सहायता से शरीर के विभिन्न हिस्सों में पहुंचता है। शरीर की हर एक कोशिका को स्वस्थ्य रहने के लिए इसकी जरूरत होती है। यह प्रोटीन के साथ मिलकर लिपोप्रोटीन बनाता है, जो फैट को रक्त में घुलने नहीं देता।


हमारे शरीर में दो तरह का कोलेस्ट्रॉल होता है, पहला एलडीएल (लो डेन्सिटी लिपोप्रोटीन) और दूसरा एचडीएल (हाई डेन्सिटी लिपोप्रोटीन)। एलडीएल कोलेस्ट्रॉल गाढ़ा और अधिक चिपचिपा होता है, जो इसको लिवर से होते हुए कोशिकाओं में ले जाने का काम करता है। शरीर में एलडीएल की मात्रा बढ़ने पर यह कोशिकाओं में हानिकारक रूप में इकट्ठा होने लगता है और कुछ समय बाद धमनियों को संकुचित कर देता है। परिणाम स्वरूप खून के बहाव में रुकावट पैदा होती है। विशेषज्ञों के अनुसार मानव शरीर में एलडीएल की मात्रा औसतन 70 प्रतिशत होती है, जिसको कोरोनरी हृदय रोग (हृदय में ब्लड और ऑक्सीजन की सप्लाई का कम होना, सीएडी) और स्ट्रोक (लकवा) का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। जिसके कारण इसे बैड (खराब) कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है।


वहीं एचडीएल को अच्छा कोलेस्ट्रॉल माना जाता है, जो काफी हल्का होता है। एचडीएल, इसको  कोशिकाओं से दूर वापस लिवर में ले जाता है। लिवर में पहुंचकर एचडीएल इसको तोड़कर व्यर्थ पदार्थों के साथ शरीर से बाहर निकालने का काम करता है। एचडीएल रक्त वाहिकाओं में जमे फैट को अपने साथ बहाकर ले जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोरोनरी हृदय रोग और स्ट्रोक को बढ़ने से रोकता है।


खराब कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना सेहत के लिए काफी हानिकारक होता है। इसके बढ़ने से हाई ब्लडप्रेशर और ओबेसिटी (मोटापा) के साथ निम्नलिखित समस्याएं हो सकती हैं-


पेट में दर्द होना-


हाई कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से पेट में दर्द शुरू होने लगता है। इसको हाई कोलेस्ट्रॉल का सबसे बड़ा और पहला साइड इफेक्ट माना जाता है। हालांकि पेट दर्द की दवा लेने से यह ठीक हो जाता है लेकिन यदि लंबे समय तक दर्द में आराम नहीं होता तो यह गंभीर बीमारी का कारण भी बन सकता है।


पैरों का सुन्न पड़ना-


कुछ लोगों के पैर हाई कोलेस्ट्रॉल के कारण सुन्न पड़ जाते हैं, इस समस्या को अनदेखा करने पर यह गंभीर रूप ले सकती है।


सीने में दर्द होना-


कुछ लोगों में हाई कोलेस्ट्रॉल के कारण उनके सीने में दर्द होता है। जिससे फेफड़ों की झिल्ली में सूजन आने के चांस बने रहते हैं। इसकी वजह से मरीज को सांस लेने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।


दिल का दौरा पड़ना-


हाई कोलेस्ट्रॉल को ह्रदय रोग का मुख्य कारण माना जाता है। मरीज के रक्त में यह ज्यादा होने पर हार्ट अटैक का खतरा अधिक रहता है। रक्त में ज्यादा यह होने से धमनियों में जमाव होने लगता है।


धड़कनों का बढ़ना-


हाई कोलेस्ट्रॉल शरीर का वजन बढ़ाने का काम करता है। इससे रक्तचाप में परिवर्तन होता है और व्यक्ति जल्दी थकने लगता है। जिससे उसकी ह्दय की धड़कन तेज होने लगती है।


सांस फूलना-


शरीर में इसकी मात्रा बढ़ने से लोगों का वज़न भी बढ़ने लगता है। ऐसे में हल्का सा टहलने पर भी सांस फूलने और पसीना आने जैसी समस्याएं पैदा होने लगती हैं।


ब्लड फ्लो का कम होना-


कभी-कभी हाई कोलेस्ट्रॉल से शरीर में ब्लड फ्लो भी कम हो जाता है। जिससे नसों में सूजन, मेमोरी का कमजोर होना, पेट खराब आदि समस्याएं होने लगती हैं। रक्त के बहाव में कमी होना ही भविष्य में दिल से जुड़ी बीमारियां और खून के थक्के जमने का कारण बनता है।


क्या हैं हाई कोलेस्ट्रॉल के मुख्य कारण?


शराब का सेवन करना-


शराब का अधिक मात्रा में सेवन करने से रक्त में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड (एक प्रकार का वसा) की मात्रा बढ़ जाती है। साथ ही सेवन के वक्त प्रयोग में लाई जाने वाली फ्राई नमकीन, चिप्स, आदि चीज़ों को खाना कोलेस्ट्रॉल की परेशानी को डबल करने का काम करती हैं।


धूम्रपान करना-


धूम्रपान करना शरीर के लिए बेहद खतरनाक होता है। यह व्यक्ति की रक्त वाहिकाओं को नुक़सान पहुंचाकर अच्छे कोलेस्ट्रॉल (एचडीएल) को कम करता है। जिससे शरीर में हाई कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने लगती है।


अधिक तनाव–


ज्यादा तनाव में रहने से हमें मस्तिष्क एवं शारीरिक थकान जल्दी होती है, इस वजह से हम लोग अपना ध्यान काम में नहीं लगा पाते। परिणामस्वरूप अधिक तनाव महसूस होने पर इसमें बढ़ोतरी होती है।


संतुलित आहार की कमी–


शरीर में संतुलित आहार एवं जरूरी पोषक तत्वों की कमी होने से भी इसकी समस्या बढ़ती है।


वंशानुगत या जेनेटिक कारण–


यदि परिवार में पहले से किसी को हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या रही है तो यह आपके लिए भी चिंता का विषय है। क्योंकि कुछ मामलों में हाई कोलेस्ट्रॉल का कारण जेनेटिक पाया गया है।


अन्य बीमारियां-


शुगर और हाइपोथायरायडिज्म (अंडरएक्टिव थायराइड, Underactive Thyroid) जैसी बीमारियां भी शरीर में कोलेस्ट्रॉल लेवल को बढ़ाने का काम करती हैं। इसलिए कोलेस्ट्रॉल लेवल को स्थिर रखने के लिए समय-समय पर मेडिकल जांच कराना आवश्यक है।


कोलेस्ट्रॉल के लिए कौन सा टेस्ट कराएं?


लिपिड प्रोफाइल ब्लड टेस्ट-


कोलेस्ट्रॉल की जांच की शुरूआत लिपिड प्रोफाइल ब्लड टेस्ट से होती है। इस टेस्ट के माध्यम से ब्लड में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा का पता लगाया जाता है।


“किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में कुल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा 200 मि.ग्रा/डीएल से कम, एचडीएल 60 मि.ग्रा./डीएल से अधिक और एलडीएल 100 मि.ग्रा/डीएल से कम होनी चाहिए।”


कोलेस्ट्रॉल स्क्रीनिंग टेस्ट-


कोलेस्ट्रॉल स्क्रीनिंग टेस्ट से रक्त में एचडीएल और एलडीएल दोनों की जांच की जाती है। पहली बार कोलेस्ट्रॉल स्क्रीनिंग टेस्ट 20 वर्ष की उम्र में कराना ठीक रहता है। उसके बाद हर पांच साल में एक बार इस टेस्ट को करवाना चाहिए लेकिन किसी व्यक्ति के रक्त में इसका स्तर सामान्य से अधिक है या परिवार में किसी को दिल की बीमारी रही हो तो हर 2 से 6 महीने में जांच आवश्य करानी चाहिए।


मेटाबॉलिक सिंड्रोम की जांच-


मेटाबॉलिक सिंड्रोम की जांच के द्वारा भी हाई कोलेस्ट्रॉल का इलाज किया जाता है। इस जांच के बाद इसका अच्छा इलाज करने में आसानी होती है।


शुगर टेस्ट-


शुगर या डायबिटीज के कारण भी हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या पैदा होती है। इसलिए समय-समय पर शुगर टेस्ट कराते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त मधुमेह से पीड़ित लोगों को अपना विशेष ध्यान रखना चाहिए।


लहसुन का सेवन करना-


हाई कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए लहसुन को सबसे बढ़िया घरेलू उपाय माना जाता है। कुछ दिनों तक रोज लहसुन की दो कलियां खाकर इसको कम किया जा सकता है। लहसुन में ऐसे एंजाइम्स पाए जाते हैं, जो बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करते हैं। एक शोध के अनुसार लहसुन के नियमित सेवन से एलडीएल कोलेस्ट्रॉल स्तर को 9 से 15 प्रतिशत तक घटया जा सकता है।


नींबू का प्रयोग करना-


नींबू में ऐसे एंजाइम होते हैं, जो मेटाबॉलिज्म के द्वारा बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करते हैं। इसमें विटामिन-सी की मात्रा होती है, जो रक्तवाहिका नलियों की सफाई करने का काम करता है। नींबू के अतिरिक्त लगभग सभी खट्टे फलों में कुछ ऐसे फाइबर होते हैं, जो बैड कोलेस्ट्रॉल को रक्त प्रवाह में जाने से रोककर शोधन तंत्र के जरिये शरीर से बाहर निकाल देते हैं।


काले चनों का सेवन करना-


जिन लोगों को उच्च कोलेस्ट्रॉल की समस्या रहती है उन्हें काले चनों का सेवन जरूर करना चाहिए। काले चनों में विटामिन-ए, विटामिन-बी, विटामिन-सी, विटामिन-डी, कैल्शियम, फाइबर, आयरन, कार्बोहाइड्रेट, मैग्नीशियम और फास्फोरस जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो इसके लेवल को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।


आंवले का सेवन करना-


एक चम्मच आंवला रस में एक चम्मच एलोवेरा रस मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से हाई कोलेस्ट्रॉल को घटाया जा सकता है। आंवला में विटामिन-सी और साइट्रिक एसिड होता है, जो इसके  लेवल को नियंत्रण करने में सहायता करता है।


अखरोट का सेवन करना-


अखरोट में कैल्शियम, मैग्नीशियम, ओमेगा-3, फाइबर, कॉपर और फॉस्फोरस आदि पोषक तत्व होते हैं, जो रक्तवाहनियों में जमा कोलेस्ट्रॉल को पिघलाकर बैड (खराब) कोलेस्ट्रॉल को वापस यकृत (लिवर, Liver) में भेजने का काम करता है। इसलिए रोजाना चार अखरोट का सेवन जरूर करना चाहिए।


किशमिश और बादाम का सेवन करना-


रात को पानी में 10-12 किशमिश और 6-7 बादाम भिगो कर सुबह खाली पेट खाने से भी इसके लेवल को नियंत्रित किया जा सकता है।


सरसों के तेल का इस्तेमाल करना-


सरसों के तेल में मोनो अनसैचुरेटेड (एकल असंतृप्त) फैटी और पॉली अनसैचुरेटेड (बहु असंतृप्त) फैटी एसिड उच्च मात्रा में पाया जाता है, जो अच्छे कोलेस्ट्रॉल में सुधार करने और बुरे कोलेस्ट्रॉल को कम करने की क्षमता रखता है।


ऑलिव आयल का इस्तेमाल करना-


ऑलिव आयल में मोनो अनसैचुरेटेड फैट होता है, जो इसके स्तर को स्थिर रखने का काम करता है। यद हृदय रोग की संभावना को कम करता है। साथ ही हाई ब्लड प्रैशर और शुगर लेवल को भी नियंत्रित रखने का काम करता है।


आरोग्यमशक्ति कोलेस्ट्रॉल लोशन का इस्तेमाल करना-


खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए वेदोबी द्वारा तैयार कोलेस्ट्रॉल लोशन (CHOLESTEROL LOTION) एक चमत्कारिक आयुर्वेदिक प्रोडक्ट है। यह अलसी, कलौंजी, सहजन,अर्जुन, इन्द्रायण आदि प्राकृतिक औषधियां से तैयार किया गया है। इसके लोशन को सिर्फ बाहरी प्रयोग के लिए तैयार किया गया है। इसकी पांच से छ: बूंदों से दिन में दो बार हथेली और पैरों के तलवों में मालिश करने से खराब कोलेस्ट्रॉल में कमी होती है। यह लोशन धमनियों के ब्लॉकेज को हटाकर ह्रदय को स्वस्थ रखता है और ह्रदय रोग की संभावना को 99% कम करता है।


कब जाएं डॉक्टर्स के पास?


यदि आपको अपनी बॉडी से निम्नलिखित बातों का संकेत मिलता है तो निश्चित ही आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ा हुआ है। ऐसे में बिना देरी किए तुरन्त डॉक्टर से मिलें।

  • तेज सर दर्द या मस्तिष्क में दर्द होने पर।
  • जरूरत से ज्यादा पसीना आने पर।
  • कम चलने पर भी ज्यादा सांस फूलने पर।
  • कई दिनों तक लगातार पैरों में दर्द रहने पर।
  • सीने में दर्द या बेचैनी महसूस होने पर।
  • माइग्रेन का दर्द होने पर।
  • जरूरत से ज्यादा थकान महसूस होने पर।
  • लगातार वजन बढ़ने पर।
  • दिल का जरूरत से तेज धड़कने पर आपको शीघ्र ही डॉक्टर के पास जाना चाहिए।
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क्यों होता है पीलिया? जानें इसके लक्षण और घरेलू उपाय

Posted 25 May, 2022

क्यों होता है पीलिया? जानें इसके लक्षण और घरेलू उपाय

क्यों होता है पीलिया – पीलिया एक सामान्य-सा दिखने वाला गंभीर रोग हैं। पीलिया होने पर लीवर कमजोर होकर काम करना बंद कर देता है। इसलिए समय पर पीलिया का इलाज न कराने से लीवर को स्थायी क्षति भी पहुंच सकती है। इसलिए पीलिया की प्रारंभिक जांच एवं उपचार बहुत आवश्यक हैं। नवजात शिशु से लेकर वृद्धावस्था तक किसी को भी पीलिया हो सकता है। लेकिन नवजात शिशुओं को इसका खतरा अधिक होता है। पीलिया को अंग्रेजी में जॉन्डिस (Jaundice) कहा जाता है।


क्यों होता है पीलिया?

शरीर में बिलीरुबिन (लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने पर बनने वाला भूरे-पीले रंग का द्रव) का स्तर बढ़ जाने के कारण आंखों का सफेद भाग, त्वचा और नाखून पीले पड़ जाते हैं। इस समस्या को ही पीलिया कहते हैं। दरअसल शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं एक तय अंतराल अर्थात 120 दिनों में टूटने लगती हैं। जिससे बिलिरुबिन (Bilirubin)  नामक बाई-प्रॉडक्ट बनता है। ये पदार्थ पहले लीवर में पहुंचता है और फिर मल और मूत्र के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है। किसी वजह से लाल रक्त कोशिकाएं 120 दिनों से पहले टूटने लगती हैं तो लीवर में बिलिरुबिन की मात्रा बढ़ने लगती है। इससे लीवर पर बुरा प्रभाव पड़ता है और लीवर के काम करने की क्षमता कमजोर पड़ जाती हैं। धीरे-धीरे बिलीरुबिन पूरे शरीर में फैल जाता हैं, जो पीलिया रोग का कारण बनता है।


पीलिया होने के कारण

बिलीरुबिन का स्तर बढ़ने के अलावा निम्नलिखित कारणों से भी पीलिया हो सकता है-

  • हेपेटाइटिस वायरस का संक्रमण।
  • थैलीसीमिया (शरीर में खून बनने की रफ्तार का धीमा होना) से ग्रस्त होने पर।
  • पैंक्रियाटिक कैंसर।
  • लीवर में घाव होना।
  • बाइल डक्ट (पित्त वाहिका) का बंद होना।
  • अधिक शराब का सेवन करना।
  • ज्यादा मसालेदार भोजन करना।
  • खुले में मिलने वाले दूषित खाद्य पदार्थों का सेवन करना।
  • मलेरिया रोग से पीड़ित होना।
  • नमक का अधिक सेवन करना।

पीलिया के लक्षण;


पीलिया होने पर निम्नलिखित लक्षण हो सकते हैं-

  • त्वचा, नाखून और आंख के सफेद हिस्से का तेजी से पीला होना।
  • पीला और गाढ़ा यूरिन आना।
  • लगातार थकान महसूस करना।
  • लंबे समय तक बुखार रहना।
  • हाथों में खुजली होना।
  • वजन का घटना।
  • इसमें लीवर की बीमारियों जैसे भूख न लगना, पेट दर्द, मितली आदि लक्षण भी दिखाई देते हैं।

पीलिया का इलाज करने के घरेलू उपाय;


गन्ने के रस से पीलिया का इलाज–


पीलिया के उपचार में गन्ने का रस बेहद कारगर होता हैं। यह शरीर में प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है। जिससे रोगी को पीलिया से जल्दी उबरने में सहायता मिलती है। सत्तू के साथ गन्ने के रस का सेवन करने से सप्ताह भर में ही पीलिया ठीक हो जाता है। दिन में तीन से चार बार सिर्फ गन्ने का रस पीने से भी पीलिया में लाभ होता हैं।


पपीता से पीलिया का इलाज–


पके हुए पपीते में पाए जाने वाले बीटा कैरोटीन (organic compounds) शरीर में विटामिन ‘ए’ बनाते हैं। साथ ही इसमें विटामिन ‘सी’, फॉस्फोरस, कैल्शियम, कार्बोहाईड्रेट, आयरन, प्रोटीन, साइट्रिक एसिड  व टारटरिक जैसे कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसलिए पका हुआ पपीता खाने से भी पीलिया के लक्षणों में कमी आती है। इसके अलावा कच्चे पपीते की बिना मसाले वाली सब्जी का सेवन करना भी पीलिया में लाभदायक साबित होता है।


दही के सेवन से पीलिया का इलाज–


दही का सेवन करने से पीलिया में बैक्टीरिया के संक्रमण की रोकथाम होती है। दही पीलिया के लक्षणों को कम करने में लाभकारी है। पीलिया रोगी अपने आहार में दही को शामिल कर सकते हैं।


हल्दी से पीलिया का इलाज–


हल्दी के सेवन से शरीर में मौजूद सभी विषाक्त पदार्थ नष्ट हो जाते हैं। इसी कारण हल्दी पीलिया के उपचार में बहुत अच्छी मानी जाती हैं। पीलिया से पीड़ित होने पर आधे गिलास पानी में एक चम्मच हल्दी को मिलाकर दिन में तीन बार पिएं। ऐसा करना बिलीरुबिन को शरीर से बाहर कर, पीलिया को ठीक करता है।


छाछ–मट्ठा से पीलिया का इलाज–


छाछ में प्रोटीन, न्यूनतम लिपिड (फैट), विटामिन और कार्बोहाइड्रेट आदि आवश्यक एंजाइम होते हैं, जो पीलिया को जल्दी ठीक करने में लाभदायक होते हैं। पीलिया होने पर रोज सुबह-शाम 1-1 गिलास मट्ठा या छाछ में सेंधा नमक मिलाकर पिएं।


कब जाएं डॉक्टर के पास?


शरीर में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देने पर शीध्र ही डॉक्टर के पास जाएं।

  • यूरिन के पीला होने पर।
  • आंखों और त्वचा में पीलापन आने पर।
  • जल्दी थकावट महसूस होने पर।
  • वजन घटने पर।
  • भूख न लगने पर।
  • पेट में तेज दर्द होने पर।
  • बुखार आने पर।
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क्या हैं यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के कारण, लक्षण और घरेलू उपचार?

Posted 25 May, 2022

क्या हैं यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के कारण, लक्षण और घरेलू उपचार?

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (Urinary tract infection) या यू.टी.आई एक प्रकार का जल्दी होने वाला संक्रमण है, जो ज्यादातर मूत्राशय में ई-कोलाई बैक्टीरिया (E. Coli Bacteria) के कारण होता है। यू.टी.आई इंफेक्शन होने पर यूरिन के समय दर्द और जलन की समस्या होती है। हालांकि यह समस्या पुरुषों और महिलाओं दोनों में ही देखी जाती है लेकिन महिलाओं में इसका असर ज्यादा देखने को मिलता है।


क्या होता है यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन या मूत्र मार्ग संक्रमण?


मूत्राशय प्रणाली के किसी भी भाग जैसे गुर्दे, मूत्राशय (bladder), मूत्रमार्ग (urethra) और मूत्रवाहिनी (ureters) में होने वाले संक्रमण को यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन या मूत्र मार्ग संक्रमण कहते हैं। यह संक्रमण सूक्ष्मजीवों के कारण होने वाला संक्रमण होता है, जो अधिकतर बैक्टीरिया के कारण होता है। पर कभी-कभी यह वायरस और फंगस द्वारा भी फैलता है। निचले मूत्र मार्ग इंफेक्शन (lower tract UTI) में मूत्रमार्ग और मूत्राशय पर, जबकि ऊपरी मूत्र मार्ग (Upper tract UTI) इंफेक्शन में मूत्रवाहिनी और गुर्दों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अत: निचले हिस्से का मूत्र मार्ग इंफेक्शन अधिक गंभीर होता है।


यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के प्रकार


यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन को स्थिति के आधार पर तीन भागों में बांटा गया है।


मूत्राशय में होने वाला संक्रमण (Cystitis or Bladder infection)-


यह बैक्टीरिया के कारण मूत्राशय के भीतर होने वाला संक्रमण है। कमजोर इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) वाले लोगों में यीस्ट भी मूत्राशय के संक्रमण का कारण हो सकता है।


मूत्रमार्ग में होने वाला संक्रमण (Urethritis or Urethra infection)-


इसमें मूत्रमार्ग में सूजन होने के कारण मूत्र त्यागने में दर्द की अनुभूति होती है।


गुर्दा संक्रमण (Pyelonephritis or Kidney infection)-


यह किडनी में होने वाला संक्रमण है। जिससे किडनी में इन्फेक्शन हो जाता है। यह एक गंभीर स्थिति होती है, जिसमें रोगी को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता पड़ सकती है। इसमें बुखार, पेशाब में खून और योनि में दर्द जैसे लक्षण नजर आते हैं। गर्भवती महिलाओं को यह संक्रमण होने की संभावना अधिक होती है।


यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के कारण


मूत्रमार्ग संक्रमण की समस्या मुख्य रूप से बैक्टीरिया या वायरस द्वारा होने के अलावा निम्नलिखित कारणों से भी हो सकती है-


खराब भोजन करना-


मूत्रमार्ग संक्रमण की समस्या खराब भोजन करने से होती है। अत: सभी लोगों को बासी (पुराना) और नुकसानदायक भोजन से परहेज करना चाहिए।


पेट का खराब रहना-


खराब पेट की समस्या से पीड़ित लोगों को भी यूरिन इंफेक्शन हो सकता है। इसलिए किसी भी ऐसी चीज़ का सेवन नहीं करना चाहिए, जो पेट के लिए नुकसानदायक हो।


रोग प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना-


मूत्रमार्ग संक्रमण होने की संभावना तब और अधिक बढ़ जाती है, जब किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोध क्षमता (immunity) कमजोर होती है। अत: सभी लोगों को अपनी इम्यूनिटी का पूरा ख्याल रखना चाहिए।


महिला का गर्भवती होना-


महिलाओं में गर्भवती होने के दौरान भी यूरिन इंफेक्शन हो सकता है। इसी कारण महिलाओं को गर्भावस्था में साफ-सफाई विशेष ध्यान रखना चाहिए।


गुर्दे में पथरी का होना-


किडनी स्टोन या गुर्दे की पथरी से पीड़ित लोगों को यूरिन इंफेक्शन होने का खतरा औरों से ज्यादा होता है। ऐसे लोगों को यू.टी.आई के लक्षण प्राप्त होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।


यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन होने के लक्षण


निम्नलिखित लक्षण मिलने पर यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन हो सकता है।

  • यूरिन करते समय मूत्राशय में दर्द या जलन का महसूस होना।
  • मूत्राशय में संक्रमण होने पर मूत्रमार्ग और मूत्राशय की परत में सूजन आ जाना।
  • बार-बार पेशाब आने जैसा महसूस होना लेकिन बहुत कम मात्रा में पेशाब आना।
  • पेशाब के रिसाव होने का डर लगना।
  • यूरिन से बदबू आना।
  • यूरिन में खून आना।
  • पेट के निचले हिस्से में दर्द होना।
  • छोटे बच्चों में मूत्र मार्ग संक्रमण होने पर बुखार, पीलिया, दस्त, उल्टी और चिड़चिड़ापन आदि लक्षण नजर आते हैं।
  • बुजुर्गो में मूत्र मार्ग संक्रमण के दौरान मूड बदलना, बुखार, भूख न लगना और सुस्ती आदि लक्षण दिखाई देते हैं।

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के घरेलू उपाय


गर्म सिकाई से मिलती है यू.टी.आई में राहत-


गर्म सिकाई सूजन को कम करने के साथ बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकती है। रोजाना गर्म पानी की सिकाई करने से मूत्राशय का प्रेशर कम होता है और संक्रमण से होने वाले दर्द में भी राहत मिलती है।


अनानास है यू.टी.आई से राहत दिलाने में सहायक-


अनानास में ऐसे एन्जाइम होते हैं, जिसमें सूजनरोधी (Anti-inflammatory) गुण होते हैं। इनकी मदद से यू.टी.आई के लक्षणों को दूर किया जा सकता है। यू.टी.आई से पीड़ित लोग कुछ दिन नियमित रूप से अनानास का सेवन करें। इसके अलावा अनानास का ताजा जूस पीना भी यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन में फायदेमंद होता है।


टी ट्री ऑयल है यू.टी.आई में कारगर-


टी ट्री ऑयल (Tea Tree Essential Oil) में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जो बैक्टीरिया से लड़ने में मदद करते हैं। टी ट्री ऑयल की कुछ बूंदों को पानी में मिलाकर इससे गुप्तांग को साफ करना चाहिए।


आंवला है यू.टी.आई में आरामदायक-


आंवला विटामिन-सी से समृद्ध होता है और यह बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकता है। एक चम्मच हल्दी पाउडर और एक चम्मच आंवला पाउडर को मिला लें। अब इस मिश्रण को एक कप पानी में उबालने के लिए रख दें और आधा होने तक उबालें। इस मिश्रण को दिन में चार से पांच बार पीने से यू.टी.आई में लाभ मिलता है।


ज्यादा पानी पीना है यू.टी.आई में फायदेमंद-


यूरिन इंफेक्शन से पीड़ित व्यक्ति को रोजाना ज्यादा से ज्यादा पानी पीना चाहिए। इससे संक्रमण को रोकने में सहायता मिलती है।


यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का आधुनिक इलाज-


निम्नलिखित आधुनिक इलाज के तरीकों को अपनाकर यूरिन इंफेक्शन की समस्या से निजात पाया जा सकता है।


एंटीबायोटिक दवाई लेना–


यूरिन इंफेक्शन की समस्या मुख्य रूप से बैक्टीरिया या वायरस की वजह से होती है। इसलिए एंटीबायोटिक दवाइयों का सेवन करके इसका इलाज किया जा सकता है। एंटीबायोटिक दवाई व्यक्ति को किसी भी तरह के वायरस या बैक्टीरिया के संपर्क में आने से रोकती है।


यूरिन टेस्ट कराना-


कई बार, यूरिन इंफेक्शन का इलाज यूरिन टेस्ट के द्वारा भी किया जाता है। यह टेस्ट मूत्र मार्ग संक्रमण के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


यूरेटेरोस्कोपी कराना (Ureteroscopy)-


कभी-कभी यूरिन इंफेक्शन से पीड़ित व्यक्ति को यूरेटेरोस्कोपी कराने की सलाह भी दी जाती है। यूरेटेरस्कोपी की मदद से यूरोलॉजिस्ट मूत्रनली या ट्यूमर, गुर्दे का स्टोनगुर्दे या मूत्रनली की लाइनिंग पर असामन्य ऊतकों (Tissue) को देख सकते हैं और इन समस्याओं का इलाज कर सकते हैं।


आरोग्यमशक्ति पिस हैप्पी स्प्रे का प्रयोग करना-


“आरोग्यमशक्ति पिसहैप्पी स्प्रे” लोगों के लिए तैयार किया गया एक प्रभावी और बेहद अच्छा टॉयलेट स्प्रे है। यह स्प्रे टॉयलेट पर जमा कीटाणुओं का 99.9% तक खात्मा करता है और यूरिन इंफेक्शन जैसी बीमारियों से बचाव करता है। प्रयोग के लिए पिसहैप्पी को टॉयलेट सीट पर स्प्रे करना होता है। जिसके 10 से 15 सेकेंड के बाद स्प्रे के सूखते ही टॉयलेट सीट सभी प्रकार के रोगाणुओं से मुक्त हो जाता है।

पिसहैप्पी स्प्रे लोगों को कॉलेज, कार्यालाय, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा, मॉल, होटल या अन्य सार्वजनिक स्थानों एवं पब्लिक टॉयलेट को इस्तेमाल करते वक्त संक्रमण के खतरे से बचाता है। इसकी एक अन्य विशेषता है कि इसके सलूशन में कोई भी हानिकारक केमिकल मौजूद नहीं है। यह पूरी तरह से नेचुरल इंग्रेडिएंट्स से तैयार किया गया है।


यूरीनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन से बचाव


जीवनशैली और आहार में निम्नलिखित बदलाव लाकर यूरीनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन से काफी हद तक बचा जा सकता है।

  • अधिक से अधिक पानी पीने और बिना रोके मूत्र त्यागने की आदत डालें।
  • शराब और कैफीन का सेवन न करें, ये मूत्राशय में संक्रमण पैदा कर सकते हैं।
  • महिलाओं को माहवारी के दौरान, टैम्पोन की जगह सेनेटरी पैड का उपयोग करना चाहिए ।
  • पुरुषों को जन्म नियंत्रण रखने के लिए शुक्राणु नाशकों का उपयोग करने से बचना चाहिए ।
  • गुप्तांग पर किसी भी प्रकार के सुगन्धित उत्पादों का उपयोग न करें।
  • हमेशा गुप्तांग को साफ रखें।
  • सम्भोग के पश्चात तुरन्त बाद मूत्र त्याग करें।

कब जाएं डॉक्टर के पास ?


यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के निम्नलिखित संकेत मिलने पर व्यक्ति को तुरंत इसकी जांच के लिए डॉक्टर से संपर्कं करना चाहिए।

  • मूत्र त्यागते समय मूत्राशय में दर्द या जलन महसूस होने पर।
  • गुप्तांग में सूजन होने पर।
  • मूत्र में से बदबू आने पर।
  • मूत्र में से खून आने पर।
  • पेट में दर्द होने पर।
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Urinary Tract Infection: Causes, Symptoms and Home remedies

Posted 21 December, 2021

Urinary Tract Infection: Causes, Symptoms and Home remedies


Urinary tract infection or UTI is a type of early infection that is mostly caused by E. coli bacteria in the bladder. In the case of UTI infection, there is a problem of pain and irritation while urinating. Although this problem persists in both men and women, it is more common among women.


What is it?


Infections occurring in any part of the urinary tract such as the kidneys, bladder, urethra, and ureters are called urinary tract infections. This infection is caused by microorganisms, mostly by bacteria. But sometimes it is also spread by viruses and fungus. 


The lower tract UTI has a bad effect on the urethra and bladder, while the upper tract UTI infection has a bad effect on the ureters and kidneys. Therefore, urinary tract infection of the lower part is more serious.


Types of UTI


Urinary tract infection is divided into three parts depending on the condition:


Cystitis or Bladder infection 


It is an infection within the bladder caused by bacteria. Yeast may also be a cause of bladder infection in people with poor immunity.


Urethritis or Urethra infection


There is a feeling of pain while urinating due to swelling in the urethra.


Pyelonephritis or kidney infection


It is a type of kidney infection. This is a serious health condition. The infected may need to be hospitalized if the problem gets worse. The symptoms of kidney infection are fever, blood in urine, and vaginal pain. Pregnant women are more likely to get infected.


Causes of Urinary Tract Infection


Major causes of urethra infection are bacteria and viruses, but also due to the following reasons-


Poor eating habits


Poor eating habits is also a cause of Urethra infection. Therefore, people should avoid stale and harmful food.


Stomach upset


People suffering from a stomach-problems may also have a urine infection. Therefore, do not consume anything that leads to stomach problems.


Weakness of immunity


The risk of urethral infection increases when a person’s immunity is weak. Therefore, people should take care of their immunity.




Urine infection is most common in women during pregnancy. As a precaution, women should be cautious about hygiene during pregnancy.


Kidney stones


People with kidney stones are more prone to urine infection. Such people should contact the doctor immediately if they see any symptoms of UTI.


Symptoms of UTI


Urinary tract infection has the following symptoms: 

  • Bladder pain or burning sensation while urinating.
  • Inflammation in the urethra and bladder layer when there is a bladder infection.
  • Frequent urge to urinate.
  • Fear of urine leakage.
  • Urine bleeding or bad odor from urine.
  • Lower abdominal pain.
  • Urinary tract infections in young children are diagnosed with fever, jaundice, diarrhea, vomiting, and irritability.
  • Symptoms of mood changes, fever, loss of appetite, and lethargy are seen in elderly.

Home remedies for UTI


Relief in UTI with hot compress


Hot compress prevents bacteria from growing and reduces inflammation. It also reduces bladder pressure and relieves pain caused by infection.


Pineapple is helpful 


Pineapples contain enzymes that have anti-inflammatory properties. These help in preventing UTI. People with UTI should consume pineapple regularly for a few days. Drinking fresh pineapple juice is also beneficial in urinary tract infections.


Tea tree oil is effective 


Tea Tree Essential Oil has antibacterial properties that help bacteria. Clean the genitals with a few drops of tea tree oil mixed with water.


Amla is beneficial


Amla is rich in Vitamin-C and it prevents bacteria from multiplying. Mix turmeric powder and Amla powder (one teaspoon each) in a cup of water. Boil the water till it reduces to half. Drinking this mixture four to five times a day. It provides benefits in preventing UTI.


Drinking more water is beneficial in UTI


A person suffering from a Urine infection should drink lots of water. This helps in the prevention of infection.


Modern treatment of Urinary Tract Infection


Methods of modern treatment are-


Taking antibiotics


The major cause of Urine infection is bacteria or viruses. Antibiotics can treat infections. Antibiotics help in prevents a person from coming in contact with any kind of virus or bacteria.


Urine test


This test plays an important role in the treatment of urinary tract infections. It helps in the diagnosis of Urine infection.




With the help of ureteroscopy, urologists can look at the urinary tract or tumor, renal stony kidney, or urinary lining, and treat these problems.


Using Aarogyam Shakti Piss Happy Spray


“Aarogyam Shakti Pisshappy Spray” is an effective and extremely good toilet spray. This spray eliminates up to 99.9% of germs present in the toilet and protects against diseases like a urine infection. 


Using Pisshappy is extremely easy. Spray it on the toilet seat. After 10 to 15 seconds the spray evaporates and the toilet seat is free from germs as well as microbes.


Pisshappy spray made from natural ingredients, protects people from the risk of infection while using public restrooms. 


Prevention of Urinary Tract Infection


Changes in lifestyle and diet can help in preventing UTIs. These are-

  • Drink as much water as you can.
  • Never control your urge to urinate.
  • Do not consume alcohol and caffeine, they are the major causes of bladder infections.
  • Women should use sanitary pads instead of tampons, during menstruation.
  • Men should avoid using sperm drugs for birth control.
  • Do not use any fragrant products on the genitals.
  • Always keep the genitals clean.
  • Always urinate immediately, especially after sexual intercourse.

When to See a Doctor?


Anyone with the following symptoms should immediately contact a doctor and get themselves examined-

  • Pain or burning sensation in the bladder while urinating.
  • Inflamed genitals.
  • Blood and also bad odor of urine.
  • Stomach ache.
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