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जीवक के महत्व, फायदे और नुकसान

Posted 25 November, 2022

जीवक के महत्व, फायदे और नुकसान

जीवक को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मलैक्सिस एक्यूमिनाटा (Malaxis acuminata) के रूप में जाना जाता है। यह एक औषधीय पौधा है, जो मध्यम आकार का लगभग 4-12 इंच लंबा होता है। आमतौर पर इसके तने छोटे होते हैं। साथ ही यह गर्म जलवायु में तेजी से बढ़ते हैं। इसके पौधों पर गर्मियों के महीनों में पीले, हरे या बैंगनी रंग के फूल लगते हैं। इसकी कलियों को विशेष रूप से आयुर्वेदिक चिकित्सा में औषधि के तौर पर उपयोग किया जाता है। जीवक च्यवनप्राश बनाने के प्रमुख अवयवों में से एक होता है। इसके अलावा जीवक अष्टवर्ग चूर्ण, च्यवनप्राश रसायन, घृत, तैला, गुटिका, अगड़ा और अन्य कई तरह के आयुर्वेदिक औषधियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी माना जाता है।

जीवक को भारत के विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। हिंदी में, इसे "जीवक" मलयालम और तमिल में "जीवाकम" और तेलुगु में "जीवाकामु" के नाम से पुकारा जाता है।

आयुर्वेद में जीवक का महत्व-

आयुर्वेदिक चिकित्सा में जीवक को वात और पित्त संतुलनकर्ता के रूप में जानते हैं। यह स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं से राहत दिलाने में मदद करता है। इसमें शीतल और कायाकल्प जैसे गुण मौजूद हैं,जो समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए फायदेमंद होते हैं।

जीवक में एल्कलॉइड, ग्लाइकोसाइड, फ्लेवोनोइड्स और बीटा-सिटोस्टेरॉल होता है। साथ ही इसमें पिपेरिटोन, ओ-मिथाइल बटाटासिन, 1,8-सिनेओल, सिट्रोनेलल, यूजेनॉल, ग्लूकोज, रमनोज, कॉलिन, लिमोनेन, पी-साइमीन और सेटिल अल्कोहल भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त जीवक की कलियां एंटीऑक्सीडेंट, एंटी प्यूरेटिक, एंटी इंफ्लेमेंटरी, एंटी बैक्टीरियल गुणों से भरपूर होती हैं, जो कई बीमारियों को ठीक करने में मदद करती हैं।

जीवक के फायदे-

दस्त के लिए-

आयुर्वेद के अनुसार, अतिसार (दस्त) भोजन या पानी में अशुद्धियों या विषाक्त पदार्थों के कारण होता है। यह वात दोष के असंतुलन के कारण भी होता है जिससे पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है। इसका परिणाम खराब चयापचय होता है, जो दस्त का कारण बनता है। दरअसल जीवक को पित्त संतुलन गुणों के लिए जाना जाता है, जो पाचन अग्नि को बनाए रखने में मदद करता है। इसके अलावा जीवक में मौजूद वात संतुलन गुण पाचन तंत्र को मजबूत करता है। साथ ही यह दस्त को नियंत्रित करने में सहायक होता है।

ब्रोंकाइटिस की समस्या के लिए-

ब्रोंकाइटिस ब्रोन्कियल ट्यूब में सूजन है, जो बलगम, खांसी, श्वास संबंधी समस्या और सीने में परेशानी का कारण बनता है। आयुर्वेद के अनुसार, ब्रोंकाइटिस असंतुलित वात और कफ दोष के कारण होता है। चूंकि जीवक में एंटी बैक्टीरियल, एंटी इंफ्लेमेंटरी और अन्य कई रसायन गुण पाए जाते हैं, जो ब्रोंकाइटिस को प्रबंधित करने में मदद करते हैं। इसके अतिरिक्त जीवक के कफ और वात संतुलन गुण बलगम को निकालने का काम करते हैं। इस प्रकार यह ब्रोंकाइटिस को प्रबंधित करने में सहायक है।

यौन कमजोरी के लिए-

आयुर्वेद के अनुसार यौन समस्याएं वात दोष के असंतुलन के कारण होती हैं, जो मूल रूप से शरीर की ऊर्जा में असंतुलन है। जीवक को शक्तिशाली वात संतुलन गुणों के लिए जाना जाता है। यह एक कामोत्तेजक के रूप में कार्य करता है। इसलिए यह यौन दुर्बलताओं में सहायक है।

कीट के काटने के लिए-

जीवक अपने शीतल गुणों के कारण शरीर में शीतलता प्रदान करता है। जीवक के शीतल और वात संतुलन गुण कीड़े के काटने से होने वाली जलन और दर्द से छुटकारा दिलाता हैं। यह कीड़े के काटने के जहरीले प्रभाव को भी कम करता है।

जोड़ों के दर्द के लिए-

जोड़ों का दर्द मुख्य रूप से वात दोष के असंतुलन के कारण होता है। जीवक को वात संतुलन गुणों के लिए जाना जाता है। इसलिए यह जोड़ों के दर्द में कारगर साबित होता है।

जीवक का उपयोग-

  • जीवक से बने चूर्ण को शहद या मिश्री के साथ सेवन हृदय रोगों में फायदेमंद होता है।
  • जीवक के कलियों से बनाए गए जीवनिया घृत का उपयोग गाउट और असंतुलित वात से जुड़े अन्य रोगों के लिए किया जाता है।
  • जीवक और अन्य जड़ी बूटियों को मिलाकर बनाए गए तेल का उपयोग गठिया और बुखार के इलाज के लिए किया जाता है।
  • जीवक और अन्य औषधीय जड़ी बूटियों के साथ संसाधित अस्थाना वस्ती एनीमिया और मलेरिया के उपचार में उपयोगी है।
  • देवदार, काकोली और जीवक का इस्तेमाल करके बनाया गया घृत बच्चों की शारीरिक कमजोरी को ठीक करने में उपयोगी है।
  • पंचवल्कल, जीवक और हिवाना अगड़ा का लेप बनाकर शहद के साथ मिलाकर बाहरी उपयोग के लिए किया जाता है। इसे सांप द्वारा कांटे जाने वाले हिस्से पर लगाने से जहर कम होता है।

यह कहां पाया जाता है?

यह कंबोडिया, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया में मूल रूप से पाया जाता है। भारत में, यह मुख्य रूप से समशीतोष्ण और उपोष्णकटिबंधीय हिमालय के इलाकों जैसे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड से अरुणाचल प्रदेश, असम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और मध्य प्रदेश तक 1200-2100 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है।

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केसर के औषधीय गुण और फायदे

Posted 21 November, 2022

केसर के औषधीय गुण और फायदे

केसर, जिसे आमतौर पर ‘लाल सोना (रेड गोल्ड) के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे सैफ्रॉन कहा जाता है। केसर इरिडेसी परिवार से संबंधित एक बारहमासी पौधा है। इसकी उत्पत्ति अरबी शब्द "ज़ाफ़रान" से हुई है। आमतौर पर केसर की गिनती सबसे महंगे और लोकप्रिय मसालों की श्रेणी में होती हैं। यह क्रोकस सैटाइवस के फूल की वर्तिकाग्र (निशान) से निकाला जाता है। इसका उपयोग खाद्य पदार्थों को स्वाद देने एवं कलर एजेंट के रूप में किया जाता है।

इसके अतिरिक्त केसर पाचन क्रिया,अनिद्रा और स्वस्थ्य संबंधी समस्याओं को कम करने का काम करता है। इसलिए आयुर्वेद में केसर को एक उत्तम औषधि माना जाता है।

केसर के पोषण गुण और महत्व-

केसर कैल्शियम, आयरन, पोटैशियम, मैग्नीशियम, प्रोटीन, विटामिन सी और विटामिन बी6 जैसे पोषक तत्वों का समृद्ध स्त्रोत है। इसके अतिरिक्त केसर क्रोसेटिन, क्रोसिन, सफ्रानल और केम्पेरानॉल जैसे एंटी ऑक्सीडेंट से भरपूर होता है । यह सभी तत्व कई शारीरिक और मानसिक समस्याओं के इलाज में मदद करते हैं।

आयुर्वेद में, केसर का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली में कई तरह से किया जाता रहा है। आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार, केसर में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटीकॉनवल्सेन्ट,एंटीऑक्सीडेंट और एंटीअल्जाइमर जैसे गुण पाए जाते हैं। यह सभी गुण कई तरह के स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं। यह चिंता, अवसाद, स्मृति समस्याओं, सूजन, पेट संबंधित समस्याओं के इलाज के लिए अच्छा उपाय है। केसर अपने चिकित्सीय गुणों के कारण त्वचा साफ और चमकदार बनाए रखता है।

केसर के फायदे

गठिया के इलाज में सहायक

केसर में पाया जाने वाला क्रोसेटिन और क्रोसिन एक एंटी-इंफ्लेमेटरी एजेंट के रूप में काम करता है। जिससे गठिया के इलाज में आसानी होती है।

पाचन तंत्र के लिए उपयोगी

केसर अपने मूलक समार्जक (मुक्त कणों की सफाई) और एंटीऑक्सीडेंट प्रभावों के कारण अपच के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दरअसल केसर में यूपेप्टिक (पाचन को ठीक करने वाला) औषधीय गुण होता है। वहीं, एक अन्य शोध के मुताबिक, केसर का उपयोग गैस्ट्रिक एसिड को कम करने और पाचन तंत्र में सुधार करने में लाभकारी होता है। इसके अलावा केसर अल्सरेटिव कोलाइटिस और सीने की जलन को भी ठीक करता है।

घाव ठीक करने में कारगर

केसर का प्रयोग घाव ठीक करने के लिए भी किया जाता है। इसमें पाए जाने वाले एंटी इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण घावों को ठीक करने में सहायक होते हैं। इसके लिए केसर को पानी और हल्दी के साथ मिलाकर सीधे घाव वाली जगह पर लगाएं। ऐसा करने से घाव शीघ्र भर जाते हैं।

श्वसन संबंधी समस्याओं में फायदेमंद-

इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट के कारण केसर श्वसन संबंधी समस्याओं जैसे अस्थमा के इलाज के लिए प्रभावी औषधि मानी जाती है। इसलिए इसके नियमित इस्तेमाल से ब्रोन्कियल ट्यूब (श्वसन नलियों) में मौजूद कैटरल (श्लेष्म या म्यूकस) पदार्थ और कफ को हटाने में सहायता मिलती है। जिससे अस्थमा की समस्या कुछ हद तक ठीक हो जाती है। इसके लिए केसर मिश्रित चाय का सेवन करें। ऐसा करने से फेफड़ों से बलगम साफ होता है और अस्थमा की समस्या दूर होती है।

अनिद्रा में सहायक

अनिद्रा बहुत कष्टदायक होती है। जिससे व्यक्ति पूरे दिन थका महसूस करता है। परिणामस्वरूप उसके कार्य में रुकावट पैदा होती है। ऐसे में केसर का रोजाना सेवन करना बहुत फायदेमंद होता है। यह मनुष्यों में नींद लाने का काम करता है। साथ ही यह नींद के पैटर्न को भी नियंत्रित करता है और व्यक्ति को स्वस्थ और अधिक ऊर्जावान महसूस कराता है। जिससे अनिद्रा की समस्या को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

कैंसर से बचाव के लिए

कैंसर से बचाव के लिए केसर का उपयोग किया जाता है। दरअसल इसमें एंटी कैंसर गुण पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त केसर में क्रोसिन नामक यौगिक मौजूद हैं, जो कोलन कैंसर कोशिकाओं के विकास को रोकने में उपयोगी होता है। साथ ही यह सभी गुण त्वचा के कैंसर में भी सकरात्मक प्रभाव डालते हैं।

आंखों के लिए फायदेमंद

केसर में पाए जाने वाले प्राकृतिक यौगिक, रेटिनल डिजनरेशन और दृष्टि हानि जैसी समस्याओं में लाभप्रद होते हैं। यह दृश्य प्रतिक्रिया को मजबूत करता है। इसके अतिरिक्त केसर में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट और एंटी इंफ्लेमेटरी गुण रेटिना स्ट्रेस से छुटकारा दिलाने में सहायता करते हैं।

बालों के उपचार में उपयोगी

केसर में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट क्षति ग्रस्त बालों की मरम्मत करने और उनके विकास को बढ़ावा देने में सहायक होते हैं। इसके लिए एक छोटा चम्मच केसर को बादाम या नारियल के तेल में मिलाकर बालों की अच्छी तरह से मालिश करें। ऐसा करने से बालों के विकास में मदद मिलती हैं। साथ ही बाल स्वस्थ्य और मजबूत होते हैं।

त्वचा की देखभाल के लिए

केसर का सामयिक अनुप्रयोग त्वचा को उज्ज्वल करता है। यह त्वचा को मॉइस्चराइज और मुलायम बनाता है। इसके लिए केसर मिश्रित दूध को फेस मास्क की तरह उपयोग करें। ऐसा करने से मुंहासों और दाग-धब्बों से राहत मिलती हैं।

केसर के नुकसान

वैसे तो केसर के सेवन से कोई दुष्प्रभाव नहीं होते हैं। लेकिन दुर्लभ परिस्थितियों या इसका अधिक सेवन हानिकारक साबित हो सकता है,जो निम्नलिखित हैं

  • केसर का अधिक मात्रा में सेवन करने से दस्त, चक्कर आना, उल्टी, श्लेष्मा झिल्ली संबंधित समस्या हो सकती हैं। कुछ मामलों में केसर का अधिक सेवन स्वास्थ्य के लिए विषाक्तता का कारण बन सकता है।
  • बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों को इसके सेवन से बचना चाहिए।
  • निम्न रक्तचाप और हृदय रोग के रोगियों को केसर से बचना चाहिए।
  • गर्भवती महिलाओं को केसर का अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए।

केसर कहां पाया जाता है?

केसर मूल रूप से ग्रीस का औषधीय पौधा है और सर्वप्रथम यहीं पर इसे उगाया गया था। लेकिन वर्तमान समय में, यह मसाला मुख्य रूप से ईरान, ग्रीस, मोरक्को और भारत में उगाया जाता है। भारत में केसर मुख्यतः जम्मू और कश्मीर में उगाया जाता है।

 

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जानें,क्विनोआ में मौजूद पोषक तत्व और उससे होने वाले स्वास्थ्य लाभ

Posted 19 November, 2022

जानें,क्विनोआ में मौजूद पोषक तत्व और उससे होने वाले स्वास्थ्य लाभ

क्विनोआ मूल रूप से एक तरह का बीज होता है। जिसे खाद्य अनाज के रूप में जाना जाता है। यह गूजफुट परिवार से संबंध रखता है। इसका वानस्पतिक नाम चिनोपोडियम क्विनोआ (Chenopodium quinoa) है। क्विनोआ अपने पौष्टिकता के कारण पूरे विश्व में लोकप्रिय रहा है। आमतौर पर इसका संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, यूरोप और चीन में तेजी से उपयोग किया जा रहा है।

कई स्वास्थ्य लाभों के कारण, यह खाद्य अनाज तेजी से लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है क्योंकि यह प्रोटीन और फाइबर का उत्कृष्ट स्रोत माना जाता है। आइए, इस लेख के माध्यम से क्विनोआ में पाए जाने वाले महत्वपूर्ण पोषक तत्वों और उससे होने वाले स्वास्थ्य लाभों के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा करते हैं।

क्विनोआ में महत्वपूर्ण पोषक तत्व

क्विनोआ के बीज विभिन्न विटामिन और खनिजों से समृद्ध हैं जैसे

  • विटामिन बी, अर्थात् बी-1 (थायमिन), बी-6 (पाइरिडोक्सिन) और बी-9 (फोलेट)। फोलेट लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण और स्वस्थ कोशिकाओं के वृद्धि और कार्य के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर गर्भावस्था के दौरान।
  • थायमिन कार्बोहाइड्रेट को ऊर्जा में बदलने में मदद करता है। साथ ही यह तंत्रिका, मांसपेशियों और हृदय के कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • सामान्य मस्तिष्क के विकास और तंत्रिका एवं प्रतिरक्षा प्रणाली को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन बी-6 (पाइरिडोक्सिन) महत्वपूर्ण है।
  • आयरन का उपयोग हीमोग्लोबिन के उत्पादन में भी किया जाता है, जो फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर के सभी अंगों तक पहुंचाने में सहायक होता है।
  • कैल्शियम का उपयोग मुख्य रूप से स्वस्थ हड्डियों के निर्माण और रखरखाव के लिए किया जाता है। इसके अलावा कैल्शियम का उपयोग हृदय, मांसपेशियों और तंत्रिकाओं के समुचित कार्य का समर्थन करने के लिए भी किया जाता है।
  • मैग्नीशियम मांसपेशियों और तंत्रिका कार्यों और ऊर्जा उत्पादन का समर्थन करता है।
  • फास्फोरस हड्डियों और दांतों के निर्माण, कोशिकाओं और ऊतकों की वृद्धि, रखरखाव और मरम्मत में मदद करता है।
  • पोटैशियम तंत्रिका कार्य, कोशिकाओं के भीतर पोषक तत्वों के आदान-प्रदान, हृदय गति के नियमन और मांसपेशियों के संकुचन में मदद करता है।
  • विटामिन ई प्रतिरक्षा प्रणाली का समर्थन करता है और कोशिकाओं के पुनर्जनन को बढ़ावा देता है।
  • क्विनोआ प्रोटीन से भरपूर होता है, जिसमें 14.1 ग्राम प्रोटीन होता है। प्रोटीन वजन को नियंत्रित करने, मांसपेशियों के निर्माण में सहायता करता है। यह कई अन्य स्वास्थ्य लाभों के अलावा चयापचय को बढ़ाता है और रक्तचाप को कम करता है।
  • इसमें मौजूद जस्ता, मैंगनीज, तांबा और सेलेनियम शरीर को सुचारु रूप से कार्य करने में मदद करते हैं।

क्विनोआ के फायदे-

क्विनोआ के बीज विभिन्न विटामिन और खनिजों से समृद्ध हैं जैसे

ग्लूटेन मुक्त आहार के रूप में क्विनोआ का सेवन सुरक्षित माना जाता हैं। सीलिएक रोग के रोगियों पर किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि क्विनोआ में मौजूद पोषण चावल की तुलना में बेहतर होता है। इसके अतिरिक्त यह प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और फाइबर की आवश्यक मात्रा प्रदान करता है।

    कैंसर से बचाव के लिए-

    क्विनोआ एंटी ऑक्सीडेंट से समृद्ध है, जो कैंसर के खतरे को कम करने के लिए अच्छा उपाय माना जाता है। दरअसल, क्विनोआ में तीन अद्वितीय पोषक तत्व पाए जाते हैं जो उत्परिवर्तित कोशिकाओं के खत्म होने से बचाने में मदद करते हैं। पहला सैपोनिन नामक तत्व पाया जाता है, जिसे वास्तव में एंटीन्यूट्रिएंट्स कहा जाता है। दूसरा सक्रिय पोषक तत्व लुनासीन है, जो केवल उत्परिवर्तित कोशिकाओं को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है। तीसरा क्वेरसेटिन नामक एक एंटी ऑक्सीडेंट है, जो शरीर में मुक्त कणों के निर्माण से लड़ता है और फेफड़ों के कैंसर के प्रसार को नियंत्रित करता है।

      खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक

      क्विनोआ में मौजूद सक्रिय तत्व शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल का उत्पादन करने वाले रासायनिक प्रक्रिया को धीमा करके एंटी इंफ्लेमेटरी की तरह कार्य करता है। इसके अलावा क्विनोआ चयापचय और कोशिकाओं के कार्य को बेहतर बनाने का काम करता है। इस प्रकार से क्विनोआ का सेवन शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल अर्थात एलडीएल (LDL) लेवल को कम करने में मदद करता है।-

      हड्डियों के रोगों से बचाने में सहायक-

      क्विनोआ में क्वेरसेटिन नामक एंटी ऑक्सीडेंट फ्लेवोनोइड पाया जाता है, जो कोर्टिसोल के स्तर को कम करता है। जिससे हड्डियों की रक्षा होती है। इसके अलावा क्विनोआ हड्डियों के घनत्व को बढ़ाता है और हड्डियों के स्वास्थ्य को बनाए रखता है। इस प्रकार क्विनोआ के नियमित सेवन से ऑस्टियोपोरोसिस जैसी हड्डियों की बीमारियों के विकास को रोका जा सकता है।

      गुर्दे की पथरी को कम करने में सहायक-

      क्विनोआ प्रोटीन का उत्कृष्ट स्त्रोत एवं गुलेटिन फ्री बीज है। साथ ही यह ऑक्सलेट से भी भरपूर होता है। जिसके कारण यह पित्त रस के स्राव को नियंत्रित करता है और शरीर में विषाक्त पदार्थों के संचय को रोकता है। इस प्रकार क्विनोआ पित्त पथरी और गुर्दे की पथरी के निर्माण को रोकता है।

      मधुमेह के इलाज में कारगर-

      क्विनोआ फाइबर का एक समृद्ध स्रोत है। जिससे यह शर्करा के स्तर को कम करने में मदद करता है। इसलिए रक्त शर्करा के स्तर को कम करके, मधुमेह वाले लोगों के लिए क्विनोआ का सेवन बहुत फायदेमंद होता है।

      क्विनोआ के दुष्प्रभाव

      • क्विनोआ में सैपोनिन नामक यौगिक मौजूद हैं। इसलिए इसका अधिक मात्रा में सेवन आंतों की अंदरूनी परत को प्रभावित करते हैं। जिससे लीकी गट सिंड्रोम होने की आशंका बढ़ जाती हैं।
      • गर्भावस्था के दौरान क्विनोआ का उपयोग चिकित्सक के परामर्शानुसार ही करें।

      यह कहां पाया जाता है?

      यह पौधा दक्षिण अमेरिका के एंडियन क्षेत्र में पाया जाता है, जहां यह हजारों वर्षों से देखने को मिल रहा है। अपने स्वास्थ्य लाभों से भरपूर होने के कारण क्विनोआ को अब संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, इटली, स्वीडन और भारत सहित दुनिया भर के कई देशों में उगाया जाता है। लेकिन अभी भी यह ज्यादातर पेरू और बोलीविया में उगाया जाता है।

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      Benefits, Importance and Side effects of Stevia

      Posted 29 September, 2022

      Benefits, Importance and Side effects of Stevia

      Stevia is a small perennial shrub that has been used as a natural sweetener for centuries. It is considered a healthy sugar substitute and is derived from a plant belonging to the Asteraceae family (sunflower, daisy and ragweed). Stevia tastes 200-300 times sweeter than real sugar. It has zero calories because it is natural and does not have any carbohydrates or artificial ingredients.

      Stevia is also known as Candyleaf, Sugarleaf, Honeyleaf and Meethi tulsi. Its scientific name is Stevia rebaudiana.

      Importance of Stevia

      Stevia has hepatoprotective, antioxidant, anti-wrinkle, antibacterial, anti-inflammatory properties which is useful in treating diabetes, high blood pressure, obesity, heart disease, high cholesterol and skin diseases.

      Importance of Shallaki in Ayurveda

      Shallaki reduces pain (especially joint pain) due to its Vata balancing properties. According to Ayurveda, all kinds of pain caused by aggravated Vata, can be cured using this herb. Shallaki helps to calm Vata and reduces pain associated with swelling.

      Stevia contains 8 types of glycosides (compounds that are purified and extracted from plants) namely-

      • Stevioside
      • Rebaudioside A, C, D, E and F
      • Steviolbiocide
      • Dulcoside A

      These glycosides are used in the making of Stevia products, the most common glycoside is Rebaudioside A (Reb-A).

      Benefits of Stevia

      • Treats diabetes-Stevia can help manage diabetes due to its anti-diabetic properties. It reduces glucose absorption, which increases insulin secretion. Thus, lowers blood sugar levels.
      • Lowers hypertension (high blood pressure)-Stevia helps in lowering blood pressure due to glycosides present in it. It relaxes constricted blood vessels and increases blood flow and oxygen to the heart.
      • Manages heart diseases-Stevia helps treat heart diseases due to the presence of glycosides in it. Glycosides reduce the concentration of low density lipoprotein (LDL) or bad cholesterol. Low levels of LDL helps reduce the risk of heart diseases.
      • Helpful in weight loss-Stevia can help you lose weight because it is low in calories. So, replacing regular sweeteners with stevia reduces calorie intake, thereby consuming it, reduces body weight.
      • Good for teeth-Stevia might be beneficial for teeth due to its antibacterial properties. It inhibits the growth of bacteria that causes plaque and tooth decay.
      • Protects the liver-Stevia is good for the liver due to its anti-hepatotoxic effects. It has antioxidant enzymes that fight free radicals and prevent cell damage.
      • Heals wound-Stevia heals cuts and wounds due to its antibacterial and wound healing properties.

      Treats skin diseases-

      Stevia can be beneficial for the skin due to its antibacterial and antioxidant properties that help fight free radicals. It provides glowing and supple skin. When used topically on the skin, stevia has shown magnificent results to prevent wrinkles, slow down signs of aging, and reduce acne.

      Side effects of Stevia

      Stevia extracts are free of side effects, while stevia products are very refined and used in moderation, they do not cause side effects, but the same is not true for crude stevia leaves. Some of the side effects of stevia leaves are:

      • It may cause damage to the kidneys, reproductive system and cardiovascular system.
      • People with low BP are advised to keep away from stevia leaves as it can also lower the blood pressure by reacting with medicines.
      • Some people may experience bloating, nausea, dizziness, muscle aches, and tingling.
      • Avoid using crude stevia leaves in pregnancy.

      It's better to consume stevia products than whole stevia leaves.

      Where is it found?

      Stevia is native to northeast Paraguay, Brazil, and Argentina. In India, it is found in Punjab, Karnataka, Chhattisgarh, Madhya Pradesh and Andhra pradesh.

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      What is Shallaki Health benefits, Uses and Side effects

      Posted 29 September, 2022

      What is Shallaki Health benefits, Uses and Side effects

      Shallaki is one of the ancient herbs in Ayurveda and is referred to as a tropical plant of the genus Burseraceae. It is also known as Boswellia serrata. It is a medium-sized flowering plant, both a tree and a shrub. This plant produces an aromatic resin and is used to make frankincense. Shallaki is widely used in traditional medicine and is an important part of Ayurvedic medicine.

      Nutritional values in Shallaki

      Shallaki is rich in phytochemicals and alkaloids. Beta boswellic acid is the main compound in it. It also contains other pentacyclic triterpene acids. These phytochemicals give Boswellia its health benefits, especially in treating medical conditions.

      Importance of Shallaki in Ayurveda

      Shallaki reduces pain (especially joint pain) due to its Vata balancing properties. According to Ayurveda, all kinds of pain caused by aggravated Vata, can be cured using this herb. Shallaki helps to calm Vata and reduces pain associated with swelling.

      Health Benefits of Shallaki

      • Prevents osteoarthritis-Shallaki has strong anti-inflammatory properties. It prevents joint swelling and protects from cartilage breakdown, making it an effective remedy for osteoarthritis.
      • Effective for rheumatoid arthritis-Shallaki is said to produce an autoimmune response in the body. Due to its anti-inflammatory properties, shallaki makes an effective treatment for rheumatoid arthritis.
      • Promotes natural healing-Shallaki increases the body's ability to naturally heal external wounds and bruises, as well as internal wounds such as bleeding.
      • Prevents inflammatory bowel disease-Anti-inflammatory properties of shallaki make it effective against various inflammatory diseases of the digestive tract such as ulcerative colitis and Crohn's disease.
      • Useful in asthma-Shallaki reduces leukotrienes, which causes bronchial muscle contraction, thereby reducing the severity and occurrence of asthma and other inflammatory bronchial diseases. It is also effective in reducing cough symptoms.
      • Treats cancer-Shallaki may be able to fight advanced breast cancer cells and limit the spread of malignant leukemia. It is also considered effective against pancreatic cancer cells.
      • Acts as an aphrodisiac-Shallaki can be used as a powerful aphrodisiac to increase sensual pleasure in sexual activity.
      • Cures female reproductive health-Shallaki promotes normal and smooth menstruation, removes congestion in the uterus and increases blood flow to the reproductive organs.

      Uses of Shallaki

      Shallaki extract is widely used as traditional medicine in tropical countries of India and Africa. Today, it is used by various pharmaceutical companies to produce alternative medicines in the form of pills, capsules, etc. Shallaki extract was also traditionally used to make frankincense, and is widely used till today.

      Side effects of Shallaki

      Shallaki have some adverse side effects on your health. It stimulates blood flow to the uterus and pelvis, so improper use can disrupt the menstrual cycle and even cause miscarriage in pregnant women.

      Where is it found?

      This plant grows in hilly areas of India, the Middle East and North Africa. In India, it is found in the dry hill forests of Gujarat, Madhya Pradesh, Rajasthan, Bihar, Orissa, Assam, Andhra Pradesh and the central peninsula of Assam.

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      कमल एक दिव्य सौंदर्य और पवित्रता का प्रतीक

      Posted 27 September, 2022

      कमल एक दिव्य सौंदर्य और पवित्रता का प्रतीक

      कमल भारत का राष्ट्रीय फूल है। हिंदी में इसे "कमल" और संस्कृत में "पद्मिनी" के नाम से जाना जाता है। यह एक पवित्र पौधा है, जो दिव्य सुंदरता और पवित्रता का प्रतीक है। इसे भारतीय संस्कृति में पूजनीय माना जाता है और इसे देवी लक्ष्मी को चढ़ाया जाता है। कमल के सभी भाग जैसे पत्ते, फूल, बीज, फल और प्रकंद खाने योग्य होते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम निलम्बो न्यूसीफेरा (Nelumbo nucifera) है।

      कमल का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व भी है। इसे विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। हिंदी में इसे "कमल", तमिल में "थमराई, तावरई", तेलुगु में "तमारा पुव्वु" और मलयालम में "तमारा" आदि नामों से पुकारा जाता हैं।

      कमल का महत्व-

      कमल के प्रजातियों को रंगों के आधार पर विभाजित किया गया हैं। यह प्रायः लाल, सफेद और नीले रंग के समान गुण वाले होते हैं। आयुर्वेद में, सफेद कमल को "पुंडरीका" लाल कमल को "कोकनाडा" और नीले कमल को "इंदिवेरा" कहा गया है। पुंडरीका पित्त और रक्त दोष को संतुलित करने के लिए उत्तम उपाय है।

      इसके बीजों में प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, मैंगनीज, फास्फोरस, सोडियम, जिंक और विटामिन (बी1, बी2, बी3, बी5, बी6, बी9, सी, ई) होते हैं। कमल में बायोएक्टिव घटक जैसे एल्कलॉइड और फ्लेवोनोइड भी मौजूद होते हैं। इसके अलावा कमल कसैले, मूत्रवर्धक, एंटी-ऑक्सीडेटिव, एंटी-डायबिटिक, एंटी-एजिंग, एंटी-हाइपरलिपिडेमिक, एंटी-इस्किमिया, एंटी-वायरल, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटीपाइरेटिक , हेपटोप्रोटेक्टिव जैसे औषधीय गुणों से भी भरपूर हैं।

      कमल के स्वास्थ्य लाभ-

      • रक्तस्राव को नियंत्रित करने में सहायक-कमल में कषाय गुण मौजूद हैं। साथ ही इसमें अच्छी मात्रा में फाइटोकेमिकल्स भी पाए जाते हैं, जो रक्त के थक्कों के निर्माण में सहायक हैं। जिससे चोट या घावों को शीघ्रता से ठीक करने में मदद मिलती है। कमल का यह गुण शरीर में अधिक रक्तस्राव को रोकने में मदद करता है। इस प्रकार बवासीर से रक्त आने, अधिक मासिक धर्म प्रवाह और नाक से रक्त आने जैसी समस्याओं में सहायक होता है।
      • दस्त को रोकने में मददगार- कमल में हेपटोप्रोटेक्टिव, कार्डियोवास्कुलर, एंटीस्पास्मोडिक और एंटी माइक्रोबियल गुण होते हैं। इसलिए दस्त के समय इसका उपयोग किया जाता है। यह मल त्याग की प्रक्रिया को कम करता है। साथ ही यह छोटी आंत में द्रव के संचय को रोकता है। इस प्रकार कमल दस्त को नियंत्रित करने में उपयोगी है।
      • पाचन क्रिया को सुधारने में कारगर-अपच के इलाज में कमल कारगर साबित होता है। दरअसल कमल में एल्कलॉइड और एंटीस्पास्मोडिक गुण मौजूद होते हैं। यह पाचन में मदद करता है और शरीर में गैस को बनने से रोकता है। इसमें मौजूद सभी तत्व पाचन तंत्र में सुधार कर, शरीर में मौजूद टॉक्सिक पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करते हैं।
      • सूजन को कम करने में सहायक-कमल अपने एंटी इंफ्लेमेंटरी गुणों की उपस्थिति के कारण सूजन से राहत दिलाने में मदद करता है। यह घटक सूजन वाले ऊतकों को शांत करते हैं। जिससे सूजन कम होती है।
      • त्वचा के लिए फायदेमंद-कमल के फूल का अर्क त्वचा को उज्ज्वल करने और एंटी-एजिंग एजेंट के रूप में कार्य करता है। यह मेलेनिन (जो त्वचा को काला करता है) और झुर्रियों के निर्माण के लिए जिम्मेदार एंजाइम को रोकता है।
      • कमल की पंखुड़ियों से बना लेप सिर दर्द से राहत दिलाने में उपयोगी होता है।
      • दाद और अन्य त्वचा रोगों के इलाज के लिए इसके जड़ों से बने चूर्ण का उपयोग पेस्ट के रूप में किया जाता है।
      • कमल की पंखुड़ियों का उपयोग खाद्य पदार्थों को सजाने के लिए किया जाता है।
      • खूनी बवासीर के उपचार में कमल के कलियों काशहद या मक्खन के साथ सेवन किया जाता है।
      • कमल के चूर्ण को गाय के दूध या घी में पकाकर सेवन करने से लालिमा, रक्तस्राव, दर्द और घाव से छुटकारा मिलता है।
      • खांसी के इलाज के लिए कमल के बीज के चूर्ण को शहद में मिलाकर सेवन किया जाता है।

      कमल का उपयोग करते समय बरतें यह सावधानियां एवं दुष्प्रभाव-

      आमतौर पर कमल का सेवन सभी उम्र के लोगों के लिए सुरक्षित है। हालांकि, इसका अधिक सेवन करने से कुछ लोगों को एलर्जी की समस्या उत्पन्न हो सकती है। इसके सेवन से होने वाले कुछ दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं:

      • उल्टी या मतली आना।
      • चक्कर आना।
      • त्वचा में खुजली होना।
      • गले में सूजन होना।
      • गर्भावस्था और सर्जरी से पहले इसका सेवन करने की सलाह नहीं दी जाती है।

      यह कहां पाया जाता है?

      सामान्यतः कमल पूरे भारत में पाया जाता है। लेकिन अधिकतर यह बाढ़ के मैदानों और डेल्टा क्षेत्रों में देखने को मिलता है।

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      नागरमोथा क्या है? जानें, इसके फायदे और उपयोग

      Posted 23 September, 2022

      नागरमोथा क्या है? जानें, इसके फायदे और उपयोग

      नागरमोथा एक आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है। इसमें कड़वा स्वाद और तीखी गंध होती है। इसकी लकड़ी का उपयोग लंबे समय तक चलने वाली सुगंध के कारण इत्र और अगरबत्ती बनाने के लिए किया जाता है। आमतौर पर इसे नट ग्रास के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा नागरमोथा को संस्कृत में चक्रंक्ष और चारुकेसरा, अंग्रेजी में नटग्रास और पर्पल नटगेज, बंगाली में नागरमोथा, मलयालम में मुशकेज़मिन, उर्दू में साद कुफ़ी, अरबी में सोद और सोदेकुफ़ी, तमिल में कोरई और मुथकासु, कन्नड़ में तांगाहुलु, मराठी में नागरमोथा या मोथा, गुजराती में नागरमोथया और मोथा नामों से पुकारा जाता हैं। इसका वैज्ञानिक नाम साइपरस रोटंडस (Cyperus Rotundus) है।

      आयुर्वेद में नागरमोथा का महत्व-

      आयुर्वेद में नागरमोथा का उपयोग दीपन (जठराग्नि को बढ़ाता है), पचन (भोजन पचाने में सहायक), रोचन (भूख को उत्तेजित करता है), कुपचन (उल्टी, अपच को रोकता है), ज्वर (बुखार में उपयोगी), यकृत विकार (यकृत संक्रमण को रोकता है) के लिए किया जाता रहा है। इसके अतिरिक्त यह आमहर (अपच का इलाज करता है), दाहहर (जलन से राहत देता है), श्वाशहर (सांस लेने में परेशानी), अनुलोमन (सांस लेने में सुधार करता है), संग्रहणी (दस्त का इलाज करता है), कमला (पीलिया रोकता है), काशहर (खांसी से राहत देता है) गुण के लिए भी जाना जाता है।

      नागरमोथा के फायदे-

      • बालों का झड़ना कम करें-नागरमोथा में एंटी बैक्टीरियल और एंटी फंगल गुण मौजूद होते हैं जो स्कैल्प पर रुसी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को नष्ट करते हैं। यह बालों की जड़ों को मजबूत बनाता है। जिससे बालों के गिरने या झड़ने की समस्या कम होती हैं।
      • मधुमेह का इलाज करने में सहायक-नागरमोथा में एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो रक्त शर्करा के स्तर को कम करने में मदद करते हैं। इस प्रकार यह मधुमेह के लिए एक प्रभावी उपाय है।
      • पाचन के सुधार में सहायक-नागरमोथा में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो सूजन या मासिक धर्म के कारण होने वाले दर्द से राहत दिलाने का काम करते हैं। इसके अलावा नागरमोथा का औषधीय गुण पाचन में भी मदद करता है।
      • काले धब्बें कम करने में मददगार-नागरमोथा में कसैले गुण पाए जाते हैं, जो मेलेनिन (त्वचा की रंगत के लिए जिम्मेदार त्वचा वर्णक) को कम करते हैं। इसप्रकार यह काले धब्बें का इलाज करने में मदद करती है।
      • यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) के इलाज में कारगर-नागरमोथा की जड़ में पाए जाने वाला एंटी बैक्टीरियल गुण जलन जैसे यूटीआई के लक्षणों का इलाज करने में मदद करते हैं।
      • लैक्टेशन बढ़ाने में मददगार-नागरमोथा प्रोलैक्टिन (एक हार्मोन) का उत्पादन करने में मदद करता है जो स्तनपान को बढ़ाता है। साथ ही यह स्तन के दूध की गुणवत्ता में सुधार भी करता है।
      • तनाव और चिंता को कम करने में कारगर-नागरमोथा से बने एसेंशियल ऑयल में एक सुखद सुगंध होती है, जो आपके शरीर पर शांत प्रभाव डालती है। यह तनाव को कम करता है और शरीर में सेरोटोनिन के स्तर को नियंत्रित करता है।

      त्वचा के लिए कारगर-

      नागरमोथा अपने शीतलन और कसैले गुणों के कारण सूजन, खुजली, छाले, एक्जिमा आदि में सहायक होती है।

      नागरमोथा के उपयोग-

      • नागरमोथा का उपयोग निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है।
      • नागरमोथा के तने का उपयोग इत्र और अगरबत्ती बनाने के लिए किया जाता है।
      • अपच और कई समस्याओं के इलाज के लिए नागरमोथा चूर्ण का सेवन किया जाता है।
      • इसकी जड़ों से निकाला गया तेल पेट की समस्याओं और मधुमेह के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
      • नागरमोथा जड़ के अर्क का उपयोग एक कीट विकर्षक के रूप में कार्य करता है।

      नागरमोथा के दुष्प्रभाव-

      नागरमोथा के अधिक सेवन से कई जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए कुछ सावधानियां बरतकर इसका सेवन करें, जो निम्नलिखित हैं:

      • इस जड़ी बूटी के अधिक सेवन से कब्ज होता है। जिसके कारण शरीर में वात दोष बढ़ सकता है।
      • कब्ज़ होने पर नागरमोथा के सेवन से परहेज करें, इससे पेट की समस्या और बढ़ सकती है।
      • चूंकि हर व्यक्ति के शरीर की प्रकृति अलग-अलग होती है। इसलिए गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान नागरमोथा लेने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श जरुर लें।

      नागरमोथा कहां पाया जाता है?

      नागरमोथा भारत के मध्य प्रदेश राज्य में पाया जाने वाला एक जमीनी पौधा है।

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      Stone Flower (Patthar Phool): Health benefits, Uses and Side effects

      Posted 20 September, 2022

      Stone Flower (Patthar Phool): Health benefits, Uses and Side effects

      Stone Flower, also known as Chharila or Patthar Phool, is a small plant that grows between rocks, tree trunks and soil. The outer skin of the plant is greenish black and white color from the inside. Thallus is up to 15 cm in diameter; loosely bound to the substratum. It is round, grayish white and smooth on top. Lower surface is dark brown and hairy.

      Stone flower belongs to the botanical family Parmeliaceae and is basically lichen (a symbiotic community of algae and fungi). It is used as a spice to enhance the taste and aroma of food. Its scientific name is Parmelia perlata.

      Other names of Stone flower are

      “Dagad phool” in Marathi, “Chhadila” in Urdu, “Silapuspa or Sitasiva” in Sanskrit, “Chhadilo” in Gujarati, “Kalpasi” in Tamil, “Rathi Puvvu” in Telugu and “Shailaja” in Bengali.

      Importance of Stone Flower in Ayurveda

      According to Ayurveda, Stone flower is highly rich in medicinal properties like Kashaya (Astringent), Tikta (Bitter), Laghu (digestive), Snigdha (Slimy in nature), Shita (Cold) and Kapha-Pitta balancing properties which are useful in treating skin diseases, cough, asthma and burning micturition along with curing many other medical conditions.

      Benefits of Stone Flower

      • Treats Urinary Tract Infection (UTI)-Urinary tract infection (UTI) is an infectious disease in any part of the urinary system. It can be in the bladder, kidneys, or urethra. A UTI can cause severe pelvic pain, painful urination or even blood in the urine. Stone flower provides relief in UTI due to its anti-inflammatory and antibacterial properties.
      • Helpful in Asthma-Stone flower is considered a good remedy for asthma ,due to its Vata-Kapha balancing properties.
      • Treats Urolithiasis-Urolithiasis is a condition in which stones (hard/rocky) form in the urinary bladder or urinary tract. Stone flower has capacity of breaking down the stones in smaller particles which leads to their outflow from the body along with urine
      • Beneficial in diabetes-Stone flower can be useful in the treatment of diabetes because it lowers blood sugar levels due to the presence of certain constituents (flavonoids, phenols) with antioxidant effects.
      • Cures skin diseases-Stone flower can be useful in fighting skin irritation and rashes because it is anti-inflammatory in nature. It also fights skin infections due to its antibacterial properties.
      • Manages cholesterol levels-Due to the presence of high phenolic content that possess antioxidant properties, Stone flower is useful for lowering low-density lipoprotein (LDL or bad cholesterol) and increasing high-density lipoprotein (HDL or good cholesterol) levels.

      Uses of Stone Flower-

      • The paste of stone flower is applied to the forehead to get relief from headache and areas affected by skin conditions such as itching with watery secretions, skin pigmentation, etc.
      • Stone flower is grounded and a paste is applied to the wound as part of the treatment.
      • Cold infusion of stone flower is given in a dose of 40-50 ml to treat diarrhea, thirst and anorexia.
      • Dried powder of stone flower mixed with honey and given to treat cough and asthma.
      • Decoction of stone flower is given in a dose of 50-60 ml mixed with cumin powder and sugar candy to treat kidney stones and burning micturition.
      • Cold infusion of this herb is given in a dose of 40-50 ml to treat fever and to strengthen the heart muscles.

      Side effects of Stone Flower

      There are no serious side effects from consuming stone flower in moderate doses, either as a spice in food or in the form of Ayurvedic herbal powder, paste, and decoction. However, it is recommended to avoid the consumption of stone flower in following cases-

      • For people who already have a cold, consuming cold infusion of stone flowers can make it worse.
      • It is also advisable to consult a doctor before taking stone flowers if the person is already on some kind of regular medication.

      Where is it found?

      Stone Flower is found on dead wood or rocks in the temperate Northern and Southern Himalayas.

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      कचूर के फायदे, उपयोग और नुकसान

      Posted 15 September, 2022

      कचूर के फायदे, उपयोग और नुकसान

      सदियों से कई ऐसी जड़ी- बूटियों का उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सा में औषधि के तौर पर किया जाता रहा है। इन्हीं जड़ी-बूटियों में कचूर भी शामिल है। दिखने में कचूर हल्दी या अदरक की तरह होती है। लेकिन यह एक खास औषधीय पौधा है, जो दर्द, सूजन, अल्सर को दूर करने के साथ-साथ कई शारीरिक समस्याओं को दूर करने में भी मदद करता है। इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के चिकित्सा प्रयोजनों के लिए किया जाता है।

      कचूर में सूजन विरोधी, फंगस रोधी, जीवाणुरोधी, पीड़ारोधी, रोगाणुरोधी और ऑक्सीकरण रोधी गुण पाए जाते हैं। इन सभी गुणों की वजह से स्वास्थ्य में लाभ हेतु कचूर का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है।

      क्या होता है कचूर?

      कचूर ज़िंजीबरेसी (Zingiberaceae) परिवार से संबंध रखने वाला एक औषधीय पौधा है। जिसका वानस्पतिक नाम कुरूकुमा जेडोरिआ (Curcuma zedoaria) है। आमतौर पर यह हल्दी की प्रजाति है और इसका रंग सफेद होता है। इसलिए इसे सफेद हल्दी भी कहा जाता है।इसका तना जमीन पर उगता हैं। इस पौधे की लंबाई करीब 3-4 फुट होती है। इसके पत्ते चिकने और मध्य भाग से गुलाबी रंग के होते हैं। इसके फूल पीले रंग के होते हैं। यह जड़ी-बूटी स्वाद में कड़वी होती है।

      कचूर के फायदे-

      • सूजन कम करने में सहायक-सूजन की समस्या के लिए कचूर एक प्राकृतिक उपचारक है। इस पर किए गए एक शोध के मुताबिक, कचूर में इथेनॉलिक एक्सट्रेक्ट नामक यौगिक पाया जाता है। यह एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों को प्रदर्शित करता है, जो सूजन के प्रभाव को कम करने में मदद करता है। इसके लिए इसके पत्ते या कंद को पीसकर प्रभावित अंगों पर लगाने से लाभ मिलता है।
      • घाव को ठीक करने में कारगर-कचूर के प्राकृतिक एंटीसेप्टिक और जीवाणुरोधी गुण इसे एक प्रभावी कीटाणुनाशक बनाते हैं। साथ ही इस पर किए गए एक रिसर्च से पता चलता है कि कचूर में वाउन्ड हीलिंग गुण मौजूद है, जो घाव भरने में सहायक होता है। इसलिए प्रभावित भाग पर कचूर पाउडर लगाने से घाव तेजी से ठीक होता है।
      • अल्सर को ठीक करने में कारगर-कचूर अल्सर को ठीक करने में प्रभावी होता है। क्योंकि इसमें एंटी अल्सर गुण मौजूद है, जो इस समस्या को बढ़ने से रोकता है। इसके लिए कचूर के कंद से बने काढ़े से कुल्ला करें। इस प्रकार यह अल्सर से पीड़ित रोगियों के लिए लाभप्रद है।
      • वायरल संबंधी समस्याओं के लिए-कचूर वायरल संबंधी समस्याओं के लिए कारगर साबित होता है। दरअसल यह एंटी माइक्रोबियल और एंटी-वायरल गुणों से समृद्ध है। यह दोनों गुण वायरल संक्रमण को रोकने या उससे बचाने में मदद करते हैं।
      • रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में कारगर-यदि कोई व्यक्ति लगातार बीमार रहता है तो इसकी मुख्य वजह उसकी कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) भी हो सकती है। ऐसे में कचूर के काढ़े का सेवन करना बेहद लाभप्रद होता है। दरअसल कचूर में इम्यूनोमॉड्यूलेटरी प्रभाव पाए जाते हैं। जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं। इसके अलावा इसमें मौजूद औषधीय गुण रक्त को साफ करने और स्वस्थ्य कोशिकाओं को बढ़ाने का काम करते है। साथ ही यह शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले बैक्टीरिया एवं फ्री रेडिकल्स से लड़ता है। जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
      • जोड़ों के दर्द में उपयोगी-कचूर में एंटी-एनाल्जेसिक और एंटी इंफ्लेमेंटरी गुण पाए जाते हैं। जो दर्द और सूजन से आराम दिलाने में कारगर है। खासतौर पर जो लोग जोड़ों के दर्द से पीड़ित हैं। उनके लिए कचूर का उपयोग करना काफी फायदेमंद रहता है। इसके लिए कचूर के प्रकन्द और फिटकरी को एक साथ पीसकर जोड़ों लगाएं।
      • मधुमेह से बचाव के लिए-मधुमेह से बचाव और उससे राहत दिलाने में कचूर एक प्रभावी औषधि है। इस विषय पर प्रकाशित एक शोध के अनुसार, कचूर में एंटी हाइपरलिपिडेमिक प्रभाव मौजूद होते हैं। यह प्रभाव रक्त शर्करा के स्तर को कम करते हैं। इस प्रकार यह मधुमेह से बचाव और रोकथाम के लिए उपयोगी है।

      कचूर के उपयोग-

      • कचूर के चूर्ण को दूध या गुनगुने पानी में मिलाकर सेवन किया जाता है।
      • कचूर को मसाले के रूप में अपने आहार में शामिल कर सकते हैं।
      • इससे बने चूर्ण को शहद के साथ सेवन किया जाता है।
      • इसके कंद से बने काढ़े का उपयोग गरारे या सेवन के रूप में किया जाता है।
      • इसकी पत्तियों से बने पेस्ट को लेप के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
      • कचूर से बने तेल को त्वचा पर लगाया जाता है।

      कचूर के नुकसान-

      • इसके सेवन से कुछ लोगों को पेट की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
      • चूंकि कचूर रक्त शर्करा के स्तर को कम करती है। इसलिए लो ब्लड शुगर के मरीजों को इसके उपयोग से परहेज करना चाहिए।
      • इसका सेवन महिलाएं पीरियड्स के दौरान न करें।
      • कचूर का सेवन गर्भावस्था के समय न करें। क्योंकि इससे मिसकैरेज होने का खतरा बढ़ जाता है।

      कहां पाया जाता है कचूर?

      सामान्यतः कचूर पूर्वोत्तर भारत एवं दक्षिण समुद्रतटवर्ती प्रदेशों में स्वतः उगने वाला पौधा है। लेकिन चीन, श्रीलंका और भारत में इसकी खेती भी की जाती है।

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      वच के फायदे और उपयोग

      Posted 14 September, 2022

      वच के फायदे और उपयोग

      वच को अंग्रेजी में स्वीट फ्लैग और कैलामस के नाम से जाना जाता है। यह एक अर्ध-जलीय बारहमासी मोनोकॉटाइलडोन पौधा है, जो मुख्य रूप से नदियों, तालाबों के आस-पास और दलदली जगहों पर विकसित होता है। इसके पौधे की लंबी, संकरी पत्तियां होती हैं। जिसकी लंबाई करीब 2-4 फीट तक होती है। वच के फूल छोटे और सफेद रंग के होते हैं। इस पौधे की पत्तियां और जड़ें एक मनमोहक सुगंध प्रदान करती हैं, जो पौधे की गुणवत्ता को बढ़ाती हैं। इसका वैज्ञानिक नाम एकोरस कैलमस (acorus calamus) है।

      वच एक औषधीय पौधा है जिसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में कई वर्षों से किया जाता रहा है। इसका उपयोग कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है। आइए इन तथ्यों पर हम इस ब्लॉग के माध्यम से चर्चा करते हैं-

      वच के पोषक तत्व-

      वच का पौधा पौष्टिक तत्वों का भंडार है। इसकी जड़ में बीटा-एसारोन, बीटा-गुर्जुनीन, (ई)-एसारोन, (जेड)-एसारोन, एरिस्टोलीन, सेक्वेस्टरपेन्स-नॉरसेक्वेस्टरपाइन कैलामुसीन और (ई)-एसारोन, कैलामुसिन ए-एच और बीटा-डॉकोस्टेरॉल शामिल हैं।

      आयुर्वेद में वच का महत्व-

      आयुर्वेद के अनुसार, वच में वात संतुलन और मेध्य गुण मौजूद होते हैं। जिसके कारण वच का सेवन शहद के साथ करने से स्पीच डिसऑर्डर की समस्या दूर होती है। इसके एक्सपेक्टोरेंट गुणों के कारण यह वायु मार्ग से कफ को हटाने में मदद करता है। जिससे सर्दी-जुकाम, खांसी आदि से राहत मिलती है। इसके अतिरिक्त वच में मौजूद अन्य तत्व कई शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं में लाभ प्रदान करते हैं।

      वच के फायदे-

      • जूं का इलाज करने के लिए-वच जूं से छुटकारा दिलाने के लिए सबसे अच्छा प्राकृतिक घटक माना जाता है। दरअसल वच का तेल एक प्राकृतिक कीटनाशक है, जो जूं को नष्ट करने में प्रभावी होता है। यह सामयिक उपयोग के लिए सुरक्षित है और त्वचा को नरम और मुलायम रखता है। इसलिए इसे स्कैल्प पर लगाने से कोई नुकसान नहीं होता है। साथ ही इसका तेल जूं को रोकने के लिए एक बढ़िया विकल्प है।
      • खांसी और गले में खराश के लिए-सर्दी, खांसी और जुकाम के इलाज में वच को प्रभावी औषधि माना जाता है। यह सर्दी और गले की खराश से राहत दिलाने का काम करता है। इसके लिए वच की जड़ के पाउडर को शहद में मिलाकर सेवन करने से राहत मिलती है। इसके अतिरिक्त जिन लोगों को स्पीच प्रॉब्लम या कुछ बच्चे बोलने में देरी करते हैं। यह उपाय उनके लिए भी लाभदायक साबित होता है। क्योंकि यह उन्हें उचित उम्र से बोलना शुरू करने और संवाद करने में मदद करती है।
      • अवसाद को दूर करने और याददाश्त को सुधारने में कारगर-वच तंत्रिकाओं को शांत करने के लिए जाना जाता है। साथ ही यह किसी की याददाश्त में सुधार करने में मदद करता है। एनसीबीआई की वेबसाइट पर प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, वच में एंटीडिप्रेसेंट गतिविधि होती है। यह गतिविधि व्यक्ति को तनाव और अवसाद को दूर करने में मदद करती है। इसके लिए वच की जड़ को कूटकर पानी में उबालें। इसे तब तक उबालें जब तक पानी जलकर एक चौथाई न बच जाएं। फिर इसे छानकर काढ़े की तरह सीप करके पिएं। ऐसा करने से अवसाद और तनाव दूर होताहै। साथ ही याददाश्त में बढ़ोतरी होती है। इसके अलावा ऐसा करने से मिर्गी या अन्य मानसिक समस्याओं में लाभ पहुंचता हैं।
      • संतान प्राप्ति में सहायक-वचा संतान प्राप्ति में होने वाली समस्याओं को दूर करके बच्चे के जन्म में मदद करता है। अक्सर बच्चे के जन्म के दौरान जब माँ थक जाती है या जन्म नहीं दे पाती है तो ऐसी स्थिति में वचा पाउडर बेहद कारगर उपाय साबित होता है। जिसकी मदद से मां बिना किसी परेशानी के बच्चे को जन्म दे पाती है।
      • सूजन को कम करने में सहायक-वच गठिया के कारण होने वाले दर्द और सूजन के इलाज में भी कारगर है। क्योंकि इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। जो गठिया और जोड़ों के दर्द जैसी समस्याओं में राहत पहुंचाने का काम करते हैं। इसके अलावा इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट सूजन बढ़ाने वाले अन्य कारणों और बैक्टीरिया, वायरस आदि को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं।
      • पेट के विकारों में लाभप्रद-वचा पेट फूलने का एक उत्कृष्ट उपाय है और शिशुओं में अपच के इलाज के लिए अच्छा उपाय माना जाता है। इसके लिए वच पाउडर को दूध में मिलाकर पिलाएं। ऐसा करने से बच्चों में होने वाली अपच एवं अन्य पेट संबंधी समस्याओं में लाभ मिलता हैं।

      वच के उपयोग-

      वच का उपयोग प्राकृतिक बाइंडर बनाने के लिए किया जाता है। यह लोगों के लिए एक कृत्रिम और अच्छा विकल्प है। इसके लिए वच के टुकड़े को जलाकर और फिर इसके एक्सट्रेक्ट एस्ट्रैक्ट को चंदन की लकड़ी पर रगड़ कर निकाला जाता है। यह बच्चों में उपयोग के लिए सुरक्षित और उपयुक्त है।

      वच का उपयोग कीटनाशक के रूप में भी किया जाता है। यह तिलचट्टे और कीड़ों से बचाता है और छोटे बच्चों पर उपयोग के लिए सुरक्षित है। इसके लिए वच जड़ी बूटी का उपयोग करने के लिए, आपको जड़ी बूटी के पाउडर को पानी में मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें। फिर इस मिश्रण को छिड़कें। ऐसा करने से कीड़ों से छुटकारा मिलता है।

      वच का उपयोग करते समय बरतें यह सावधानियां-

      वच का उपयोग करने की कुछ सावधानियां और दुष्प्रभाव इस प्रकार हैं-

      • लंबे समय तक (5-6 सप्ताह से अधिक नहीं) और अधिक मात्रा में वचा का उपयोग न करें।
      • यदि किसी व्यक्ति के शरीर में पित्त की अधिकता है तो ऐसी स्थिति में इसके सेवन से बचें।
      • वच का अधिक सेवन ड्रोसिनेस्स या स्लीपिनेस्स का कारण बन सकता है।
      • गर्भावस्था के दौरान वच का सेवन करने से पूरी तरह बचें।

      यह कहां पाया जाता है?

      वच भारत और बर्मा के दलदली स्थानों में उगता है। आमतौर पर यह भारत के मणिपुर और नागा पहाड़ियों में पाया जाता है।

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      यारो क्या है? जानिए, इसका आयुर्वेदिक महत्व, लाभ, उपयोग और दुष्प्रभाव

      Posted 03 September, 2022

      यारो क्या है? जानिए, इसका आयुर्वेदिक महत्व, लाभ, उपयोग और दुष्प्रभाव

      यारो एक बारहमासी बड़ा फूल वाला पौधा है। जिसका वैज्ञानिक नाम अचिलिया मिलेफोलियम (Achillea millefolium) है। इसके फूल पीले सफेद रंग और गुच्छों के रूप में व्यवस्थित होते हैं। यारो को प्राचीन काल से स्वास्थ्य लाभों के लिए औषधि के तौर उपयोग किया जाता रहा है। इसे व्यापक रूप से नाकबंद पौधे के रूप में भी जाना जाता है। क्योंकि इसकी पत्तियों में रक्त को गाढ़ा करने और नकसीर को नियंत्रित करने की क्षमता होती है।

      आयुर्वेद में यारो का महत्व-

      आयुर्वेद में, यारो अपने ज्वरनाशक और स्वेदजनक गुणों के कारण लोकप्रिय है। यह शरीर में पसीना उत्पन्न करके बुखार को नियंत्रित करने में सहायक होता है। इसके एंटीस्पास्मोडिक गुणों के कारण, इसका उपयोग दस्त के इलाज के लिए भी किया जाता है। यारो के पत्तों का सेवन इसके कार्मिनेटिव गुणों के कारण पाचन में भी मदद करता है।

      यारो के पौष्टिक तत्व-

      यारो एक शक्तिशाली चिकित्सीय जड़ी-बूटी है। जिसमें विटामिन, खनिज, फ्लेवोनोइड और एंटी ऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं। यारो आयरन, मैग्नीशियम, पोटेशियम जैसे खनिज तत्वों एवं विटामिन ए और सी से भरपूर होता है।

      यारो के स्वास्थ्य लाभ-

      • घाव भरने के लिए-यावसा का उपयोग रक्त स्राव घावों, निशान और अन्य त्वचा की समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है। यारो के ताजे पत्तों को किसी कट या घाव के चारों ओर लपेटा या बांधा जाता है। इसके उपचार गुण उपचार प्रक्रिया को तेज करने में मदद करते हैं। यारो का तेल रोगाणुरोधी और ऑक्सीकरण रोधी गुणों से भरपूर है, जो कई तरह के त्वचा रोगों के इलाज में फायदेमंद होता है। इसके अलावा, यारो के फूलों के काढ़े से सफाई करने से एक्जिमा के उपचार में लाभ होता है।
      • तनाव को दूर करने में सहायक-यारो में मौजूद फ्लेवोनोइड्स और शक्तिशाली एल्कलॉइड अवसाद और चिंता के लक्षणों को दूर करने में मदद करते हैं। यारो में पाए जाने वाले फाइटोन्यूट्रिएंट कॉर्टिकोस्टेरोन (एक हार्मोन जो तनाव के साथ बढ़ता है) के स्राव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए इससे बने तेल को अरोमाथेरेपी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
      • सूजन को कम करने में सहायक-आयुर्वेदिक चिकित्सा में यारो को त्वचा और यकृत की सूजन को कम करने के लिए जाना जाता है। त्वचा के संक्रमण, उम्र बढ़ने के लक्षण, फैटी लीवर की बीमारी और बुखार के इलाज के लिए यारो टी लाभकारी होती है।
      • मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद-यारो मस्तिष्क संबंधी समस्याओं के लिए प्राकृतिक उपचारक है। यह मल्टीपल स्केलेरोसिस जैसे मस्तिष्क विकारों को ठीक करने में मदद करता है। दरअसल इस जड़ी-बूटी में एंटी सिजुरे (anti seizure) प्रभाव पाया जाता है, जो मिर्गी का इलाज करता है। इसलिए इस हर्बल चाय को अपने आहार में शामिल करने से याददाश्त में भी सुधार होता है।
      • पाचन तंत्र के लिए लाभकारी-यारो का उपयोग इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) की समस्या जैसे पेट में दर्द, दस्त, सूजन और कब्ज आदि के इलाज के लिए किया जाता है। इसमें मौजूद फ्लेवोनोइड्स और एल्कलॉइड पाचन समस्याओं से राहत प्रदान करता है। साथ ही यह आंत के कार्यप्रणाली में सुधार करता है।

      यारो का उपयोग-

      • यारो का सेवन मुख्य रूप से चाय या काढ़े के रूप में किया जाता है।
      • इसके पत्तियों से बने अर्क या तेल को अरोमा थेरेपी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
      • इसकी पत्तियों को पीसकर पेस्ट बनाकर घावों पर लेप किया जाता है। .
      • यारों की पत्तियों को दातों के दर्द को दूर करने के लिए चबाया जाता है।
      • यारो की पत्तियों और फूलों को सुखाकर सुगंधित मसाले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

      यारो का उपयोग करते समय बरतें यह सावधानियां-

      वैसे तो यारो का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। लेकिन इसका अधिक मात्रा या लंबे समय तक सेवन दुष्प्रभाव का कारण बन सकते हैं। इसलिए सीमित मात्रा में ही इसका सेवन करें। आइए, चर्चा करते हैं इससे होने वाले कुछ अल्पकालिक दुष्प्रभाव के बारे में:

      • गर्भावस्था के दौरान यारो के सेवन से बचना चाहिए। क्योंकि यह मासिक धर्म चक्र को प्रभावित करता है। इस प्रकार यह गर्भपात का कारण बन सकता है।
      • यह रक्त के थक्के को धीमा करता है। इसलिए ब्लीडिंग डिसऑर्डर वाले लोगों में यारो के सेवन से ब्लीडिंग का खतरा बढ़ सकता है।
      • इसके प्रति संवेदनशील लोगों में एलर्जी का कारण बनता है। यदि किसी को इससे एलर्जी है, तो यारो का उपयोग करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
      • ड्रोसिनेस्स (असामान्य रूप से नींद आना)।
      • त्वचा में जलन।
      • मूत्र उत्पादन में वृद्धि।

      यह कहां पाया जाता है?

      यारो उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में व्यापक रूप से उगाया जाता है। भारत में यह मुख्य रुप से जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में पाया जाता है।

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      12 Interesting Benefits of Tej Patta That You Should Know

      Posted 01 September, 2022

      12 Interesting Benefits of Tej Patta That You Should Know

      Tej Patta, also known as Bay leaf, is a leaf of the sweet bay tree (Laurus nobilis), an evergreen tree of the family Lauraceae and native to Mediterranean countries. Tej Patta is a popular spice used for pickling and marinating, and for flavour stews, fillings, and fish. It smells mild, but has a bitter taste.

      Tej Patta adds aroma and sweetness to the recipe. It can be stored for months as dry spices are really very strong and can be stored for a long time.

      Nutritional Values of Tej Patta

      This aromatic spice contains a wide variety of essential phytochemical compounds, minerals and vitamins that are essential for optimal health and well-being. Fresh bay leaves are a storehouse of vitamin C, a powerful antioxidant that removes harmful toxins from the body, boosts immunity, and accelerates wound healing. It is also an impressive source of B-complex vitamins, which support enzyme synthesis, nervous system function, and metabolic regulation. In addition, Tej Patta is rich in minerals such as copper, potassium, manganese, iron, zinc, and selenium, which control blood pressure, heart rate, and several enzyme reactions.

      Importance of Tej Patta in Ayurveda

      According to Ayurveda, Tej Patta helps balance Kapha and Vata dosha. It helps remove excess phlegm from the lungs by melting it due to its ushna (heat) nature. It also helps in reducing asthma symptoms.

      Benefits of Tej Patta

      • Improves digestion-Tej Patta contains organic compounds that are effective in relieving stomach pain and relieving Irritable Bowel Syndrome (IBS). Tej Patta helps reduce the levels of toxins in the body to function better. It contains enzymes that help digest proteins that are difficult to digest. Tej Patta plays an important role in the digestion of complex proteins.
      • Improves heart health-Tej Patta contains various compounds that can be beneficial for the cardiovascular system. These compounds strengthen the capillaries in the heart and reduce bad cholesterol.
      • Reduces inflammation-The anti-inflammatory properties of Tej Patta are enhanced by a unique phytonutrient called parthenolide, which significantly reduces inflammation and lowers the risk of arthritis.
      • Effective for hair growth-Tej Patta are boiled in water and applied to the scalp after hair wash. The chemicals and volatile compounds in Tej Patta can help get rid of dry skin and dandruff. Bay leaves are also useful for restoring hair growth and preventing hair loss.
      • Combats stress-Stress is one of the most common problems that have a negative impact on a person's well-being. To manage stress, simply add Tej Patta to your regular meal plan. Linalool essence can help lower stress hormones in the system, especially when used in aromatherapy. Tej Patta can calm you down and fight symptoms of depression and anxiety.
      • Beneficial for menstrual problems-Tej Patta can cause regular and normal menstrual periods if taken orally. They also have the ability to treat vaginal discharge.
      • Provide proper sleep-Eating Tej Patta before bed contributes to a good sleep. A few drops of Tej Patta extract are mixed with water and consumed.
      • Treats diabetes-Due to the presence of several phytochemicals and essential oils in Tej Patta, it can help lower blood sugar levels in diabetics. Consumption of Tej Patta can increase insulin and glucose metabolism.
      • Acts as an insect repellent-Tej Patta is a great insect repellent as they contain lauric acid. A dish of Tej Patta can ward off insects. A paste made of crushed leaves and a little oil soothes stings and bites when applied on the affected area.
      • Treats dandruff-Tej Patta is an excellent remedy for dandruff and itchy scalp. It strengthens the hair follicles and reduces the itching that occurs with a dry scalp. To do this, a few bay leaves are crushed into a powder and mixed with coconut oil. This paste can then be applied to your scalp to reduce dandruff and itching on the scalp.
      • Heals wound-Tej Patta is believed to have antimicrobial properties that help heal wounds and speed up the healing process. Tej Patta extract acts as a natural remedy to treat minor cuts and wounds.
      • Good for respiratory system-Tej Patta has antibacterial properties which make it beneficial for the respiratory system, as the vapors are inhaled. This loosens mucus and removes harmful bacteria that can be trapped in the airways.

      Where is Tej Patta found?

      Tej Patta grows naturally in the Northwestern Himalayas, Sikkim, Assam, Meghalaya, Mizoram, tropical and subtropical Asia, South Asia, the Pacific region and Australia. As a spice, it is used in various cuisines, especially North Indian cuisine, giving it the best aroma and taste.

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      Tagar: Benefits, Uses and Side effects

      Posted 01 September, 2022

      Tagar: Benefits, Uses and Side effects

      Tagar, commonly known as Indian Valerian, is a hairy perennial herb which can reach upto 40-45cm in height. The leaves are sometimes pinnate and 2.5-7 cm long, the flowers are unisexual and white or slightly pink. Tagar is classified in two varieties i.e. Nighantus Tagar and Pinda Tagar. Its botanical name is Valeriana wallichii and belongs to the Valerianaceae family.

      Importance of Tagar

      Tagar is highly useful in ayurveda for its medicinal properties like Vishaghna(anti-toxin), Vedanasthapana(analgesic), Aksepahara (anticonvulsant), Deepan(appetizer), Hridaya(cardio tonic), Yakrduttejaka(hepatoprotective), Shwashara(bronchodilator), Kusta (antileprotic), Jwaragna(antipyretic), Bhutapasmara nasan(a remedy for epilepsy and averts the evil powers), Mutrajanan(diuretic), and Chaksusya(beneficial for the eyes) properties.

      Tagar is a wonderful natural sedative that has been shown to improve sleep, calm the mind and lower blood pressure. It relieves stress and makes you relaxed and happy.

      Benefits of Tagar

      • Reduces anxiety-Tagar is useful in reducing anxiety as it has a calming effect on the mind and helps the body relax due to anxiolytic properties. It helps flush out toxins and acts directly on the nerve channels.
      • Treats sleeping disorders-Tagar acts as a sedative which helps in treating insomnia. It reduces the activity of certain chemicals in the brain that helps in calming brain activities, which further helps in inducing sleep.
      • Treats epilepsy symptoms-Tagar helps treat epilepsy symptoms due to its anticonvulsant properties. The special constituents found in Tagar help relieve involuntary muscle spasms. The specific chemicals found in Tagar help minimize the severity of seizures and also reduce their frequency. These anticonvulsant compounds prevent epilepsy.
      • Reduces joint pain and inflammation-Tagar helps in reducing joint pain and inflammation due to its analgesic and anti-inflammatory properties. It relaxes tense muscles.
      • Useful in dysuria-Tagar has Mutrajanan (diuretic) properties that are useful in dysuria.

      Uses of Tagar

      • For the treatment of sore wounds and infections, a cold infusion of Tagar roots is given.
      • To treat wounds, apply a paste made from Tagar roots.
      • Tagar root paste is applied to the joints to relieve pain.
      • Cold infusion of roots of tagar is given regularly as a tonic for 1-2 weeks to reduce body weakness.
      • A decoction of the roots of the plant is used for the treatment of paralysis, convulsions, hysteria and arthritis.
      • Tagar root paste is applied to areas affected by insect bites and scorpion stings.
      • A decoction of the roots is given to treat asthma and cough.
      • Cold infusion or decoction of Tagar roots is given to treat fever.

      Side effects and Precautions of using Tagar

      Tagar can cause certain side effects when consumed in excessive quantities or inappropriately such as-

      • Stomach upset.
      • Dry mouth.
      • Lucid dreams.
      • Heart problems.
      • Tagar may affect the central nervous system when taken with anticonvulsants. Therefore, consult a doctor when taking Tagar with anticonvulsants.
      • It is recommended that you avoid Tagar in heart disorders or consult a doctor before consuming Tagar.
      • Tagar can interfere with normal liver function, so you are advised to avoid it or consult a doctor before using Tagar for liver diseases.
      • It is advisable to avoid or consult your doctor before using Tagar during pregnancy or breastfeeding.

      Where is it found?

      Tagar is found in Pakistan, India, Afghanistan, Nepal, Bhutan and South West China. In India, it is found in Meghalaya and in the temperate Himalayas that ranges from 1500 to 3600m.

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      Triphala: An Ayurvedic Formulation of Three Fruits

      Posted 31 August, 2022

      Triphala: An Ayurvedic Formulation of Three Fruits

      Triphala is a polyherbal medicine consisting of three fruits. These fruits are

      • Amalaki (Emblica officinalis)It has a cooling effect that controls Pitta and supports the natural functions of the liver and immune system.
      • Bibhitaki (Terminalia bellerica)It is very good for pacifying Kapha Dosha.
      • Haritaki (Terminalia chebula)It has a heating nature which is good for all three doshas (Vata, Pitta and Kapha). It is known for its "scraping" effect, which removes toxins and helps in maintaining health.

      Importance of Triphala

      In Ayurveda, Triphala is important for its Rasayana properties, which means this formulation is highly effective in maintaining the health and vitality of the body as well as preventing diseases.

      Triphala contains several compounds believed to be responsible for its health benefits including carbohydrates, minerals, sodium, vitamins, fiber, gallic acid, chebulagic acid and chebulinic acid.

      Benefits of Triphala

      • Reduces the risk of heart diseases-Triphala contains high concentrations of oleic and linoleic oil, which can help in reducing the risk of heart disease. Linoleic oil is important for increasing HDL cholesterol (good cholesterol) while lowering levels of LDL cholesterol (bad cholesterol).
      • Good for digestive system-Triphala works very well as a laxative and can be used to stimulate bowel movements and prevent bloating. People with digestive or intestinal problems can take a spoonful of Triphala Churna before going to bed.
      • Relieves in constipation-Triphala is effective in constipation as it helps regulate bowel movements. To get rid of constipation, you need to drink a glass of warm water with 2 teaspoons of Triphala churna every night.
      • Boosts immunity-Triphala churna is rich in vitamin C, which is beneficial for the immune system and a powerful antioxidant. It is also rich in bioflavonoids, which helps in speedy recovery of diseases.
      • Reduces inflammation-Regular consumption of Triphala helps reduce internal and external inflammation that a person may have, due to poor immunity or lack of nutrition in the body.
      • Prevents cancer-Triphala churna is said to have anti-cancer properties and has chemoprotective, radioactive and antineoplastic effects which helps to prevent cancer.
      • Skin effective-Triphala churna rejuvenates, moisturizes and softens your skin. This is due to the powerful antioxidant compounds present in Triphala, which removes pigmentation and helps kill acne-causing bacteria.
      • Treats dandruff and promotes hair growth-The emollient properties of Triphala powder helps retain moisture in the hair and protect it from the risk of alopecia (hair loss). Mix or consume Triphala Churna with water or apply topically to stimulate hair growth and remove dandruff.
      • Aids in weight loss-Triphala can help in weight loss, especially if you want to burn belly fat. Antioxidants present in Triphala can help increase fat burning and metabolism by helping you get rid of toxins.

      Side effects of using Triphala

      Triphala Churna is a safe choice when consumed in moderate quantities but there are some side effects also-

      • Pregnant women should not take Triphala because of the downward flow of energy which can even lead to miscarriage.
      • Breastfeeding mothers should also avoid using Triphala because it can be passed to the baby through breast milk and can be dangerous.
      • Do not give your baby more than a pinch of this powder as it can cause diarrhea and other stomach problems.
      • Never take Triphala Churna more than the recommended amount as it can cause sluggishness and dehydration.

      Where is it found?

      Triphala is found in southern Asia and India, within lower hills and plains.

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      क्या है लैवेंडर ? जानें, इसके फायदे और नुकसान

      Posted 22 August, 2022

      क्या है लैवेंडर ? जानें, इसके फायदे और नुकसान

      लैवेंडर कई औषधीय गुणों से भरपूर एक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है। इसका वानस्पतिक नाम लैवेंडुला एंगस्टीफोलिया (Lavandula angustifolia) है। लैवेंडर एक सदाबहार पौधा है जिसे मध्य पूर्व, भूमध्यसागरीय और भारत में मूल रूप से पाया जाता है। यह एक खास औषधीय पौधा है, जो मानसिक थकान, अवसाद और तनाव के साथ-साथ कई शारीरिक समस्याओं को दूर करने में भी मदद करता है। इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के कॉस्मेटिक और चिकित्सा प्रयोजनों के लिए भी किया जाता है। लैवेंडर केपुष्प और घास में खास सुगंध होती है। जिससे मन और शरीर दोनों को आराम मिलता है। इसके अलावा लैवेंडर में सूजन विरोधी, फंगस रोधी, अवसाद रोधी, जीवाणुरोधी, रोगाणुरोधी, पीड़ारोधी, सूक्ष्मजीवी रोधी, शांतिदायक और सन्तोष दिलाने के गुण पाए जाते हैं। इन सभी गुणों की वजह से स्वास्थ्य में लाभ हेतु लैवेंडर का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है।

      लैवेंडर के फायदे

      • अनिद्रा को दूर करने में कारगर-अनिद्रा एक कष्टप्रद समस्या है जो व्यक्ति को पूरे रात जगाती है। इसके लिए सोने से पहले अपने तकिए पर लैवेंडर से बने एसेंशियल ऑयल की कुछ बूंदों को डालें। इसकी खुशबू दिमाग को शांत कर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर करती है। इसलिए बेहतर नींद के लिए इस तेल का उपयोग अच्छा उपाय माना जाता है।
      • फंगल संक्रमण को दूर करने में सहायक-फंगस संक्रमण से लड़ने के लिए लैवेंडर एक प्राकृतिक उपचारक है। दरअसल लैवेंडर में एंटीफंगल और एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं जो फंगल कोशिकाओं की झिल्लियों को नष्ट करने का काम करते हैं।
      • बालों के विकास में लाभदायक-लैवेंडर कातेल बालों के विकास के लिए प्रभावी विकल्प है। इसे बालों पर लगाने से बालों के रोम को पोषण मिलता है। जिससे बालों के विकास में बढ़ोतरी होती है।
      • रक्तचाप और हृदय गति को नियंत्रित करने में सहायक-लैवेंडर आवश्यक तेल को सूंघने से दिमाग की मांसपेशियों के कार्यप्रणाली में सुधार होता है। जिससे रक्तचाप को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। परिणामस्वरूप हृदय गति में सुधार करताहै।
      • अस्थमा में लाभप्रद-लैवेंडर में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो ब्रोन्कियल ट्यूब के सूजन और संक्रमण को ठीक करने में मदद करते हैं। इस प्रकार लैवेंडर आवश्यक तेल श्वसन स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
      • दाग-धब्बों को दूर करने में मददगार-लैवेंडर के तेल को प्रभावित जगह पर लगाने से दाग-धब्बों के इलाज में मदद मिलती है। इसके एनाल्जेसिक और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण सूजन कम हो जाती है।
      • चिंता कम करने में सहायक-लैवेंडर एंटी-डिप्रेसेंट के रूप में कार्य करता है जो चिंता के स्तर को कम करता है। जिससे यह बेहतर नींद प्राप्त करने में मदद मिलती है।

      लैवेंडर का उपयोग करते समय बरतें यह सावधानियां-

      • तंत्रिका तंत्र-लैवेंडर तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। सर्जरी के दौरान, एनेस्थीसिया या अन्य दवाओं के साथ सेवन करने पर इसे सुरक्षित नहीं माना जाता है। इसलिए सर्जरी से 2 सप्ताह पहले लैवेंडर के उपयोग को रोकने की सलाह दी जाती है।
      • गर्भावस्था या स्तनपान-गर्भावस्था या स्तनपान के दौरान लैवेंडर का उपयोग करने से बचें। इसके अलावा डॉक्टर के परामर्शनुसार उपयोग करें।
      • कुछ दवाओं से बचें-लैवेंडर कुछ शामक दवाओं जैसे बार्बिटुरेट्स के साथ प्रयोग किया जाता है जो अधिक उनींदापन या नींद का कारण बनता है। इसलिए, इन दवाओं के साथ लैवेंडर के उपयोग से बचने की सलाह दी जाती है।
      • बच्चे- लैवेंडर में एक हार्मोनल प्रभाव होता है जो बच्चों के शरीर में सामान्य हार्मोन में बदलाव कर सकता है। इसलिए, चिकित्सक के सलाह पर ही इसका इस्तेमाल करें।

      लैवेंडर के दुष्प्रभाव-

      • उल्टी या मतली आना।
      • सिर दर्द होना।
      • अधिक भूख लगना।
      • कब्ज़ होना।
      • दस्त आना।
      • एलर्जी होना।
      • आंतों में ऐंठन होना।

      यह कहां पाया जाता है?

      अधिकांशतः लैवेंडर फ्रांस के प्रोवेंस की इलाकों में व्यावसायिक रूप से उगाए जाते हैं। क्योंकि यहां कि जलवायु लैवेंडर उत्पादन के लिए आदर्श है। चूंकि यह पौधा बारहमासी है और इसे उगाने के लिए शुष्क, धूप वाले वातावरण की आवश्यकता होती है। आमतौर पर कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बढ़ता है। भारत में लैवेंडर के फूल हिमाचल प्रदेश, कश्मीर घाटी और उत्तर प्रदेश राज्य की पहाड़ियों पर देखने को मिलते हैं।

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      निशोथ के फायदे, उपयोग और नुकसान

      Posted 19 August, 2022

      निशोथ के फायदे, उपयोग और नुकसान

      आमतौर पर निशोथ को भारतीय जलप के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसा पौधा है जिसमें कई औषधीय गुण पाए जाते हैं। जिसके कारण निशोथ का उपयोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। निशोथ मुख्य रूप से दो तरह का होता है। पहला काला और दूसरा सफेद, जिसमें से सफेद का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में लोकप्रिय रूप से किया जाता है। सामान्यतः निशोथ एक ज्वरनाशक और रेचक पौधा है, जो इसे बुखार के लिए एक उत्कृष्ट उपाय बनाता है। इसके अतिरिक्त यह यकृत रोग, हृदय रोग, बवासीर आदि के उपचार में सहायक होता है।

      निशोथ के औषधीय गुण-

      निशोथ में कई तरह के औषधीय गुण जैसे सूजनरोधी, रोगाणुरोधी, एनाल्जेसिक, एंटी अर्थराइटिक, कैंसर विरोधी, रेचक, हेपटोप्रोटेक्टिव और अबोर्टिफिसिएंट गुण मौजूद हैं।

      निशोथ के फायदे-

      • कब्ज के इलाज में मददगार-निशोथ में शक्तिशाली विरेचक और रेचक गुण होते हैं। जिससे मल त्याग में वृद्धि होती है और मल को आसानी से पास करने में मदद मिलती है।
      • कीड़ों को दूर करने में सहायक-निशोथ अपने कृमिघ्ना (एंटी वर्म्स) गुणों के कारण कृमि संक्रमण से छुटकारा दिलाने में मदद करता है।
      • खांसी और ब्रोंकाइटिस को ठीक करने में सहायक-निशोथ में कफ संतुलन गुण होते हैं, जो खांसी, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा और अधिक कफ के कारण होने वाली श्वसन क्रिया में तकलीफ जैसी समस्याओं को दूर करने में मदद करता है।
      • अतिरिक्त फैट को कम करने में सहायक-निशोथ अपने विरेचक और डिटॉक्सिफाइंग गुणों के कारण शरीर से अधिक पानी और विषाक्त पदार्थों को हटाने में मदद करता है। जिससे शरीर का अतिरिक्त वसा और सूजन को कम करने में मदद मिलती हैं।
      • बवासीर के इलाज में मददगार-निशोथ बवासीर के इलाज में सहायक होता है। इसके सूजनरोधी और रोगाणुरोधी गुण गुदा में होने वाली खुजली, जलन और सूजन जैसे लक्षणों में राहत प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त निशोथ में पाए जाने वाला विरेचक गुण कब्ज को दूर करने में मदद करता है।
      • गठिया के इलाज में सहायक-निशोथ गठिया के इलाज में कारगर होता है। दरअसल इसमें मौजूद एंटी अर्थराइटिक और एंटी इंफ्लेमेंटरी गुण जोड़ों की सूजन को कम करतें है। साथ ही शरीर के विभिन्न हिस्सों के दर्द से राहत दिलाते है। इस प्रकार निशोथ गठिया की समस्या को कम करने में बेहद लाभकारी औषधि है।

      निशोथ के उपयोग-

      • आम तौर पर निशोथ की जड़ का चूर्ण कब्ज और बवासीर की समस्या को दूर करने के लिए रेचक के रूप में दिया जाता है। इसका सेवन त्रिफला के साथ किया जाता है।
      • यह आंत से अतिरिक्त पित्त और कफ को निकालने का काम करता है।
      • निशोथ त्वचा रोगों में मदद करता है क्योंकि यह रक्त से पानी के संचय को हटाता है। इसके लिए इसे मंजिष्ठा, कुटकी, पुनर्नवा और नीम के साथ मिलाया जाता है।
      • गुग्गुल, अदरक और हल्दी के साथ मिश्रित निशोथ उच्च कोलेस्ट्रॉल और मोटापे में प्रभावी होता है।
      • रूमेटिक वात, लकवा रोग, रक्ताल्पता, पीलिया और सूजन में निशोथ को अदरक के साथ मिलाकर सेवन करना बहुत फायदेमंद होता है।
      • इसका सेवन मिश्री के साथ 3 ग्राम की मात्रा में करने से पीलिया में आराम पहुंचता है।
      • निशोथ की जड़ का पेस्ट विटिलिगो, अन्य त्वचा रोगों, खालित्य, ग्रीवा, लिम्फैडेनाइटिस, बवासीर अल्सर के इलाज के लिए किया जाता है।

      निशोथ के दुष्प्रभाव और कुछ सावधानियां-

      निशोथ को दवा के रूप में इस्तेमाल करने से कुछ दुष्प्रभाव हो सकते हैं। कभी-कभी यह रक्त शर्करा के स्तर को प्रभावित करता है। साथ ही इसे निर्देशों और सावधानियों के बिना सेवन करने पर अन्य जटिलताओं का कारण बन सकता है। छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को विशेष रूप से इसका दुष्प्रभाव होता है।

      • अन्य दवाओं के साथ लेने पर निशोथ अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है और शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है।
      • अधिक मात्रा में निशोथ का सेवन करना दस्त का कारण बनता है। इसलिए, इसका सेवन करने से पहले डॉक्टर से परामर्श जरुर लें।
      • 12 साल से कम उम्र के बच्चों को निशोथ का सेवन किसी भी रूप में न कराएं।
      • अपेंडिसाइटिस से पीड़ित लोगों को इसके सेवन से बचना चाहिए क्योंकि इससे अन्य समस्या हो सकती है।
      • गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान निशोथ का सेवन न करें।

      यह कहां पाया जाता है?

      निशोथ ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और उष्णकटिबंधीय एशिया में पाया जाता है। भारत में, यह जंगली बगीचों के पास पाया जाता है, जो मुख्य रूप से 900 मीटर ऊंचाई तक पाए जाते हैं।

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      तेज पत्ते के 12 रोचक फायदे और उपयोग

      Posted 18 August, 2022

      तेज पत्ते के 12 रोचक फायदे और उपयोग

      तेज पत्ता को अंग्रेजी में बे लीव्स (Bay leaves) के नाम से जाना जाता है। यह एक सुगंधित पत्ता है, जो लॉरस परिवार से संबंध रखता है। यह एक सदाबहार पेड़ है और भूमध्यसागरीय देशों का मूल निवासी है। तेज पत्ता एक लोकप्रिय मसाला है जिसका उपयोग अचार, काढ़े और कई तरह के लजीज पकवान बनाने में किया जाता है। इसकी गंध हल्की और स्वाद से कड़वा होता है।

      तेज पत्ता नुस्खा में सुगंध और मिठास जोड़ता है। इसे महीनों तक संग्रहीत किया जा सकता है क्योंकि सूखे मसाले वास्तव में बहुत मजबूत होते हैं और लंबे समय तक संग्रहीत किए जाते हैं।

      तेज पत्ता के पौष्टिक तत्व-

      इस सुगंधित मसाले में कई तरह के फाइटोकेमिकल यौगिक, खनिज और विटामिन मौजूद हैं जो इष्टतम स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं। तेजपत्ता में मुख्य रूप से विटामिन सी से भरपूर है, जो शक्तिशाली एंटी ऑक्सीडेंट के गुणों को प्रदर्शित करता है। यह शरीर से हानिकारक विषाक्त पदार्थों को निकालता है। साथ ही यह प्रतिरक्षा को बढ़ाने और शीघ्रता से घाव भरने में सहायता करता है। यह बी-कॉम्प्लेक्स विटामिन का भी एक प्रभावशाली स्रोत है, जो एंजाइम संश्लेषण, तंत्रिका तंत्र के कार्य और चयापचय विनियमन का समर्थन करता है। इसके अलावा, तेज पत्ता तांबा, पोटैशियम, मैंगनीज, लोहा, जस्ता और सेलेनियम जैसे खनिजों में समृद्ध है, जो रक्तचाप, हृदय गति और कई एंजाइम प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है।

      तेजपत्ता का आयुर्वेदिक गुण-

      आयुर्वेद के अनुसार, तेज पत्ता कफ और वात दोष को संतुलित करने में सहायक है। यह अपने उष्ण (गर्मी) प्रकृति के कारण फेफड़ों से अतिरिक्त कफ को पिघलाकर निकालने का काम करता है। यह अस्थमा के लक्षणों को कम करने में भी लाभकारी होता है।

      तेज पत्ता के फायदे-

      • पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद-तेज पत्ता में मौजूद कार्बनिक यौगिक पेट दर्द और इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) से राहत दिलाने में प्रभावी होते हैं। तेज पत्ता शरीर से विषाक्त पदार्थों को हटाने में मदद करता है। इसके अलावा तेज़पत्ते में एंजाइम पाए जाते हैं जो पाचन तंत्र को सुधारने में मदद करते हैं। साथ ही यह जटिल प्रोटीन के पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
      • हृदय स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में सहायक- तेज पत्ता में कई तरह के यौगिक मौजूद होते हैं जो हृदय के कार्यप्रणाली में सुधार करते हैं। यह यौगिक हृदय की कोशिकाओं को मजबूत और खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं।
      • सूजन को कम करने में कारगर-तेज पत्ता के एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों को पार्थेनोलाइड नामक एक फाइटोन्यूट्रिएंट द्वारा बढ़ाया जाता है। यह गुण सूजन को काफी कम करता है। जिससे गठिया के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।
      • बालों के विकास में मददगार-तेजपत्ते को पानी में उबालें। अब इस पानी को बाल धोने के बाद स्कैल्प पर लगाएं। ऐसा करने से तेजपत्ते में मौजूद रसायन और वाष्पशील यौगिक शुष्क त्वचा और रूसी से छुटकारा मिलता हैं। साथ ही यह बालों के विकास को बढ़ावा देता हैं। इसके अतिरिक्त ऐसा करने से बालों का झड़ना या गिरना कम होता हैं।
      • तनाव को कम करने में सहायक-तेजपत्ता से बने एसेंशियल ऑयल में एक सुखद सुगंध होती है जो आपके शरीर पर शांत प्रभाव डालती है। यह तनाव को कम करता है और शरीर में सेरोटोनिन के स्तर को नियंत्रित करती है। इसके अलावा तेजपत्ता में पाए जाने वाला लिनालूल एसेंस सिस्टम में तनाव वाले हार्मोन को कम करने में मदद करता है। इसलिए इसे अरोमाथेरेपी में इस्तेमाल किया जाता है।
      • मासिक धर्म संबंधी समस्याओं में लाभप्रद-तेजपत्ता का उपयोग महिलाओं में मासिक धर्म संबंधी विकारों के इलाज में किया जाता है। यह गर्भाशय की मांसपेशियों और एंडोमेट्रियम के लिए एक टॉनिक के रूप में कार्य करता है। मासिक धर्म के समय बहुत अधिक खून आने की समस्या में तेजपत्ता के चूर्ण का सेवन करना लाभप्रद होता है। इसके उपयोग से मासिक धर्म नियमित हो जाता है। साथ ही मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द को भी कम करता है।
      • उचित नींद प्रदान करें-सोने से पहले तेजपत्ता का सेवन करने से अच्छी नींद आती है। इसके लिए तेज़पत्ते के अर्क की कुछ बूंदों को पानी में मिलाकर सेवन किया जाता है।
      • मधुमेह का इलाज में सहायक-तेजपत्ता में विभिन्न प्रकार के फाइटोकेमिकल्स के उपस्थिति के कारण, यह मधुमेह रोगियों में रक्त शर्करा के स्तर को कम करने में मदद करता है। तेजपत्ते के सेवन से इंसुलिन और ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म बढ़ता है।
      • कीट विकर्षक के रूप में कारगर-तेज पत्ता एक महान कीट विकर्षक है क्योंकि इसमें लॉरिक एसिड पाया जाता है। तेज पत्ता से बने एसेंशियल ऑयल कीड़ों को नष्ट करती है। इसके अलावा कुचले हुए पत्तों और थोड़े से तेल से बना पेस्ट प्रभावित जगह पर लगाने से कीड़ों के डंक और काटने से राहत मिलती है।
      • डैंड्रफ के इलाज में कारगर-ततेज पत्ता डैंड्रफ और खुजली वाली खोपड़ी के लिए एक उत्कृष्ट उपाय है। यह बालों के रोम को मजबूत करता है और शुष्क खोपड़ी के कारण होने वाली खुजली को कम करता है। इसके लिए तेज पत्ते से बने पाउडर को नारियल के तेल में मिलाकर पेस्ट बना लें। अब इस पेस्ट को स्कैल्प पर लगाएं। ऐसा करने से डैंड्रफ और स्कैल्प पर होने वाली खुजली कम होती है।
      • घाव भरने में सहायक-तेज पत्ता में रोगाणुरोधी गुण पाए जाते हैं जो घावों को ठीक करने और उपचार प्रक्रिया को तेज करने में मदद करते हैं। इसके लिए तेज पत्ता का अर्क को प्रभावित अंगों पर लगाएं। ऐसा करने से घाव शीघ्र भरते हैं। इस प्रकार तेजपत्ता कटने, फटने और घावों के इलाज के लिए एक प्राकृतिक उपचार के रूप में कार्य करता है।
      • श्वसन प्रणाली के लिए लाभकारी-तेजपत्ता में जीवाणुरोधी गुण मौजूद हैं जो श्वसन प्रणाली के लिए बेहद लाभकारी होते हैं। इसके वाष्प को अंदर लेना फायदेमंद होता है। यह बलगम को ढीला करता है और हानिकारक बैक्टीरिया को हटाता है। जिससे वायुमार्ग साफ होता हैं।

      तेजपत्ता कहां पाया जाता है?

      तेजपत्ता भारत के मेघालय, अरुणाचल प्रदेश व नागालैंड में उपजाया जाता है। इन जिलों में जिस प्रकार से किसान तेजपत्ता की खेती कर रहे है उससे व दिन दूर नही होगा जब उक्त जिला देश में सबसे अधिक तेजपत्ता उपजाने वाला राज्य बन जाएगा। भारत के अलावा फ्रांस, बेल्जियम, इटली, रूस, मध्य व उत्तरी अमेरिका में इसकी मुख्य रूप से खेती की जाती है।

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      त्रिफला: एक महाऔषधि

      Posted 16 August, 2022

      त्रिफला: एक महाऔषधि

      प्राचीनकाल से ही कई ऐसी जड़ी-बूटियां हैं, जिनका उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सा में अपने औषधीय गुणों के कारण किया जाता रहा है। इन्हीं जड़ी-बूटियों में त्रिफला भी शामिल है। त्रिफला तीन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से तैयार किया गया मिश्रण है। यह आयुर्वेदिक मिश्रण तमाम बीमारियों के रोकथाम एवं इलाज के लिए प्रभावी होता है। आइए, इस लेख के माध्यम से एक नजर डालते है कि त्रिफला किन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से मिलकर बना है और इससे क्या स्वास्थ्यवर्धक लाभ प्राप्त होते हैं। इसमें शामिल जड़ी-बूटियां निम्न हैं:

      • आंवला (एम्बिलिका ओफ्फिसिनलिस)-आंवला को आमलकी के नाम से जाना जाता है। इसमें शीतलन प्रभाव होता है, जो पित्त को नियंत्रित करता है। साथ ही यह यकृत और प्रतिरक्षा प्रणाली के कार्यप्रणाली में सुधार करता है।
      • बिभीतकी (टर्मिनलिया बेलेरिका)यह कफ दोष को शांत करने के लिए बहुत अच्छा घटक है। आयुर्वेद के अनुसार बिभीतकी में ग्लूकोसाइड, गैलिक एसिड, टैनिन, इथाइल गैलेट जैसे जैविक यौगिक मौजूद होते हैं। इसी कारण बिभीतकी स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी होती है।
      • हरीतकी (टर्मिनलिया चेबुला)-हरीतकी प्रकृति से गर्म होती है, जो त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) के लिए अच्छी मानी जाती है। यह अपने "पाचक" गुणों के लिए जाना जाती है। इसके अलावा हरीतकी शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालती है और स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करती है।

      त्रिफला का महत्व-

      आयुर्वेद में, त्रिफला अपने रसायन गुणों के लिए महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है कि यह मिश्रण शरीर के स्वास्थ्य और जीवन शक्ति को बनाए रखने के साथ-साथ बीमारियों को रोकने में अत्यंत प्रभावी है।

      त्रिफला में कार्बोहाइड्रेट, खनिज, सोडियम, विटामिन, फाइबर, गैलिक एसिड, चेबुलाजिक एसिड और चेबुलिनिक एसिड जैसे यौगिक पाए जाते हैं। यह सभी यौगिक कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं।

      त्रिफला के फायदे-

      • हृदय समस्याओं को कम करने में सहायक-त्रिफला में ओलिक और लिनोलिक यौगिक की उच्च मात्रा होती है, जो हृदय रोग के जोखिम को कम करने में मदद करती है। लिनोलिक तेल एचडीएल कोलेस्ट्रॉल (अच्छा कोलेस्ट्रॉल) बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण होता है। जबकि एलडीएल कोलेस्ट्रॉल (खराब कोलेस्ट्रॉल) के स्तर को कम करता है।
      • पाचन तंत्र के लिए लाभदायक-त्रिफला एक रेचक के रूप में काम करता है। यह पाचन प्रक्रिया को बढ़ाकर भोजन को आसानी से पचाने में मदद करता है। यह चयापचय में सुधार करता है और पाचन क्षमता को बढ़ाकर अमा को कम करता है। इसलिए पाचन या आंतों की समस्या वाले लोगों के लिए प्रतिदिन सोने से पहले एक चम्मच त्रिफला चूर्ण का सेवन करना फायदेमंद होता है।
      • कब्ज में असरदार-त्रिफला कब्ज जैसी समस्याओं में असरदायक होती है। क्योंकि यह अपने रेचक गुणों के कारण आंतों में संचित अपशिष्ट पदार्थों को हटाता है। इस प्रकार यह मल त्याग को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसलिए कब्ज से छुटकारा पाने के लिए रोजाना रात को 2 चम्मच त्रिफला चूर्ण को एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर पिएं।
      • प्रतिरक्षा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में कारगर-त्रिफला चूर्ण में विटामिन सी और पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसके सेवन से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार होता है। त्रिफला एंटीऑक्सीडेंट और बायोएक्टिव गतिविधि के रूप में काम करता है। जिसके कारण यह रोगाणुओं से लड़ने और शरीर को विभिन्न संक्रमणों से बचाने में मदद करता है।
      • सूजन को कम करने में मददगार-कभी-कभी शरीर में खराब प्रतिरक्षा क्षमता या पोषण की कमी के कारण किसी व्यक्ति की आंतरिक और बाहरी अंगों में सूजन आ जाती है। ऐसे में त्रिफला का नियमित सेवन प्रभावी होता है। दरअसल त्रिफला में एंटी इंफ्लेमेंटरी गुण पाए जाते हैं, जो सूजन को कम करने में सहायक होते हैं।
      • वजन कम करने में सहायक-त्रिफला बेली फैट को बर्न करके वजन कम में मदद करता है। दरअसल त्रिफला में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट शरीर से विषाक्त पदार्थों को हटाता है। साथ ही यह मेटाबॉलिज्म को बढ़ाने में मदद करता है। जिससे वजन कम करने में मदद मिलती है।
      • कैंसर से बचाव के लिए-त्रिफला चूर्ण में कैंसर रोधी गुण मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त त्रिफला में कीमोप्रोटेक्टिव, रेडियोधर्मी और एंटीनोप्लास्टिक प्रभाव होते हैं। यह सभी प्रभाव कैंसर को रोकने में मदद करते हैं।
      • त्वचा के लिए लाभदायक-त्रिफला चूर्ण त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए लोकप्रिय घटक हैं। इसमें पाए जाने वाले विटामिन, एंटी ऑक्सीडेंट और फाइटो केमिकल त्वचा को फिर से जीवंत, मॉइस्चराइज़ और मुलायम बनाता है। इसके अलावा त्रिफला पिगमेंटेशन और मुंहासे पैदा करने वाले बैक्टीरिया को नष्ट करने में मदद करता है।
      • बालों को पोषण देने में सहायक-त्रिफला बालों के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसमें मौजूद पोषक तत्व बालों को स्वस्थ्य बनाने और उन्हें मजबूती प्रदान करने का काम करते हैं। दरअसल शरीर में मैग्नीशियम की कमी के कारण बाल झड़ते या गिरते हैं। चूंकि त्रिफला में मैग्नीशियम की उच्च मात्रा होती है, इसलिए इससे बालों का गिरना कम होता है। इसके अतिरिक्त मैग्नीशियम मोटे और स्वस्थ बालों को बढ़ावा देने का काम करता है। इसके अलावा त्रिफला में मौजूद बहेड़ा अपने रुखे (सूखे) और कषाय (कसैले) गुणों के कारण रूसी को भी नियंत्रित करता है।

      तत्रिफला के नुकसान-

      त्रिफला का सीमित मात्रा में सेवन सुरक्षित है लेकिन इसका अधिक सेवन हानिकारक प्रभाव डालता है जो निम्नलिखित हैं:

      • त्रिफला चूर्ण को अधिक मात्रा में सेवन करना सुस्ती और निर्जलीकरण का कारण बनता है।
      • बच्चों को इस पाउडर की एक चुटकी से अधिक न दें क्योंकि इससे दस्त और पेट की अन्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
      • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को त्रिफला का सेवन नहीं करना चाहिए।

      यह कहां पाया जाता है?

      त्रिफला दक्षिणी एशिया और भारत की निचली पहाड़ियों और मैदानी इलाकों में पाया जाता है।

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