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बबूल के फायदे और नुकसान

By Vedobi India May 31, 2021

बबूल के फायदे और नुकसान

दुनिया में तमाम ऐसी जड़ी-बूटियां हैं, जो शरीर के लिए बेहद लाभदायक मानी जाती हैं। उन्हीं जड़ी-बूटियों में से एक बबूल भी है। बबूल की जड़ें काफी मजबूत होती हैं। यह पेड़ सालों साल जिंदा रह सकता है। इसकी पत्तियों से लेकर फूल कई औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं और यह कई आयुर्वेदिक उपचार में काम आते हैं। इसकी हरी और पतली टहनियां दातुन करने के काम आती हैं। इसकी छाल से उत्तम कोटि का गोंद निकलता है, जो औषधीय गुणों से भरपूर होता है तथा इससे कई रोगों का उपचार किया जाता है। इसी कारण आयुर्वेद में इसके चूर्ण का प्रयोग दवा के रूप में होता है। बबूल मुंह की बदबू, मसूड़ों का दर्द, बदबूदार पसीना, दांतों का दर्द, सिर दर्द जैसी कई समस्याओं में फायदा करता है।

आयुर्वेद में बबूल का महत्व-

आयुर्वेद में बबूल के विभिन्न भाग जैसे फूल, पत्ता आदि को महिलाओं की सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। लेकिन इसके पौष्टिक और उपचारात्मक गुणों के कारण बहुत-सी बीमारियों के लिए इसे आयुर्वेद में औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। बबूल एक ऐसा वृक्ष है जिसमें कई गुण पाए जाते हैं। बबूल के पेड़ का उपयोग रोगों से छुटकारा दिलाने और शारीरिक दुख दूर करने के लिए हजारों साल से होता आया है। यह मुख्य रूप से स्त्री रोग, रक्त बहने के विकारों और मूत्र संबंधित रोगों में काफी फायदेमंद है।

बबूल की छाल कसैली, रूखी और स्वभाव से ठंडी होती है। इसके फूल, पत्ते, फल और छाल का उपयोग कब्ज, सर्दी, जुकाम, खासी, घाव, मधुमेह, गले के रोग, त्वचा रोग आदि को ठीक करने में किया जाता है।  इसकी छाल का आमाशय के ऊपर मृदु प्रभाव पड़ता है। इसलिए कमजोर लोगों और गर्भवती स्त्रियों को विरेचक औषधि के रूप में इसका इस्तेमाल करना चाहिए। इसके अलावा अफारा (पेट फूलना), मुंह में पानी आना जैसे लक्षणों में भी इसका उपयोग किया जा सकता है।

बबूल के फायदे-

दांतों और ओरल हेल्थ के लिए फायदेमंद-

बबूल गोंद का उपयोग दैनिक रूप से मुंह की स्वच्छता के लिए किया जाता है। इसमें मौजूद रोगाणुरोधी गुण मुंह में मौजूद बैक्टीरिया को खत्म करने और उन्हें पनपने से रोकते हैं। बबूल मुंह में मौजूद प्लाक को दूर करने और मसूड़ों की सूजन को कम करने के लिए भी जाना जाता है। इसके लिए बबूल पेड़ की ताजा छाल को चबाना और इसकी टहनियों से दातून करना फायदेमंद होता है। इसके अलावा बबूल की छाल, पत्ते, फूल और फलियों को बराबर मात्रा में मिलाकर बनाए गए चूर्ण से मंजन करने से दातों के रोग दूर हो जाते हैं। साथ ही दांत और मसूड़े साफ एवं मजबूत होते हैं। 

दस्त के इलाज के लिए-

बबूल पर किए गए शोध से पता चलता है कि इसमें हेपेटोप्रोटेक्टिव, कार्डियोवास्कुलर, एंटीस्पास्मोडिक और एंटी माइक्रोबियल गुण होते हैं। इसलिए दस्त के समय इसका उपयोग किया जाता है। बबूल की पत्तियों और काले जीरे को पीसकर सेवन करने से दस्त में आराम मिलता है। इसके अलावा पेट संबंधी संक्रमण या दस्त के इलाज के लिए बबूल छाल के काढ़ा का सेवन करना लाभप्रद होता है।

खांसी के इलाज के लिए बबूल-

बबूल खांसी को ठीक करने के लिए अच्छा विकल्प है। इसमें पाए जाने वाले औषधीय गुण खांसी को ठीक करते हैं। इसके लिए बबूल के पत्ते और तने की छाल का चूर्ण बनाकर शहद के साथ सेवन करने से खांसी को ठीक किया जा सकता है।

सूजन को दूर करने में कारगर-

बबूल में एंटी-ग्रेन्युलोमा और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। जो सूजन को रोकने में सहायक होते हैं। बबूल पर किए गए शोध से पता चलता हैं कि यह सूजन संबंधी बीमारियों का इलाज करने में मदद करता है। यह ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डी का रोग) के मरीजों को राहत देता है। रयूमेटायड (सूजन संबंधी विकार) और गठिया के कारण उत्पन्न सूजन के उपचार में भी बबूल की फली का उपयोग किया जाता है। 

लिकोरिया से निजात दिलाने में मददगार-

अगर किसी को सफ़ेद पानी आने या लिकोरिया (Leucorrhoea) की समस्या है तो 1 चम्मच बबूल की छाल के चूर्ण का प्रतिदिन दो बार गाय के दूध के साथ सेवन करें। इसके सेवन से इन समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा। इसके अलावा बबूल की छाल को रात भर पानी में भिगोकर अगले दिन उस पानी को उबालें। पानी को आधा हो जाने तक उबालें। बाद में उसे छानकर बोतल में भर लें। अब इस पानी से योनि को धोने से प्रदर एवं योनि शौथिल्य (ढीलापन) में लाभ मिलता है। 

मासिक धर्म संबंधी विकारों में लाभप्रद-

बबूल का प्रयोग स्त्रीरोग की विभिन्न समस्याओं को दूर करने और महिलाओं में मासिक धर्म संबंधी विकारों के इलाज में किया जाता है। यह गर्भाशय की मांसपेशियों और एंडोमेट्रियम के लिए एक टॉनिक के रूप में कार्य करता है। मासिक धर्म के समय बहुत अधिक खून आने की समस्या मे बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर पीना फायदेमंद होता है। इसके उपयोग से मासिक धर्म नियमित हो जाएगा।

गर्भाशय को मजबूत करता है-

बांझपन, गर्भाशय की कमजोरी, होर्मोन का असंतुलन, पेट के रोग और पेडू का दर्द (Pelvic pain) जैसी समस्याएं होने पर बबूल की फली का सेवन करें। ऐसे में कीकर बबूल के पेड़ के तने में एक फोड़ा-सा निकलता है, जिसे कीकर का बांदा कहते हैं। इसे पीसकर चूर्ण बनाकर माहवारी के खत्म होने के अगले दिन से सेवन करने से बांझपन की समस्याएं से निजात मिलता है।

योनि से असामान्य खून की समस्या में लाभदायक-

अगर किसी को रक्त प्रदर, योनि से असामान्य खून निकलना, पेशाब से सम्बंधित समस्या है तो बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर दिन में दो बार पिएं। इसके सेवन से इन समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा।

पौरुष शक्ति के लिए-

बबूल कीकर की 100 ग्राम की मात्रा को भूनकर इसमें 500 ग्राम अस्वगंधा मिला लें। अब एक चम्मच इस मिश्रण का नियमित रूप से सुबह-शाम 15 दिनों तक सेवन करें। ऐसा करने से शीघ्रपतन, वीर्य की कमी और धातु दुर्बलता में लाभ मिलता है। इसके अलावा बबूल की गोंद को घी में भूनकर इसका पकवान बनाकर सेवन करने से मनुष्य की शक्ति बढ़ जाती है। 

आंखों के दर्द और सूजन में लाभप्रद-

बबूल की पत्तियों को पीसकर इसकी टिकिया बनाकर रात को सोते समय आंख पर बांधने से आंखो का दर्द, जलन और आंखों का लाल होना आदि रोग दूर हो जाते हैं। इसके अलावा बबूल के पत्ते को पीसकर, शहद मिलाकर उस पेस्ट को काजल के रूप में आंखों पर लगाने से आंखों से पानी निकलना ख़त्म हो जाता है।

मधुमेह (डायबिटीज) के उपचार में सहायक-

बबूल में इन्सुलिन के स्तर को संतुलित करने का गुण पाया जाता है। जो मधुमेह के रोगी के लिए अत्यन्त लाभदायक है। इंसुलिन के अलावा बबूल की फली शरीर में ग्लूकोज के स्तर को भी नियंत्रित करती है। इसलिए बबूल फली के चूर्ण का सेवन करना मधुमेह के लिए अच्छा होता है।

मोटापा कम करने में सहायक-

वजन को कम करने के लिए भी बबूल बेहद कारगर है। प्रारंभिक रिसर्च से पता चलता है कि प्रतिदिन 30 ग्राम बबूल चूर्ण का सेवन करने से मोटापा तेजी से कम होता है।

 कैंसररोधी गुण-

आयुर्वेद के अनुसार बबूल में कैंसर से लड़ने वाले पर्याप्त गुण होते हैं। इसमें मौजूद तत्व कैंसर कोशिकाओं से डी.एन.ए. को बचाते हैं और कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों को भी कम करते हैं।

घाव को ठीक करने में सहायक है-

बबूल घावों को भरने के लिए बहुत ही फायदेमंद औषधि है। क्योंकि बबूल के पत्ते और छाल में ब्लीडिंग और इन्फेक्शन को नियंत्रित करने की क्षमता होती है। इसलिए बबूल का उपयोग किसी भी तरह की चोट, घाव, ब्लीडिंग और इन्फेक्शन को ठीक करने में किया जाता है। इसके लिए बबूल की पत्तियों को पीसकर घाव पर लगाना चाहिए। इससे घाव शीघ्र भरता है।

चिंता, अवसाद और तनाव दूर करने में-

बबूल गोंद का इस्तेमाल तनाव कम करने के लिए किया जाता है। क्योंकि बबूल गोंद में एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं। जो ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद करते हैं। दरअसल, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का सीधा संबंध मनोविकार से होता है। इसके कम होने से अवसाद, तनाव व चिंता जैसे कई दिमागी रोग और समस्याएं दूर हो जाती हैं।

बवासीर के इलाज के लिए-

बबूल की फली खूनी बवासीर के इलाज के लिए एक अच्छा उपाय है। बबूल में एंटी-इंफ्लामेटरी गुण पाया जाता है। जो शरीर के किसी भी अंग पर आई सूजन को कम करने में मदद करता है। बबूल के बांदा को काली मिर्च के साथ पीसकर चूर्ण बना लें। अब इस मिश्रण का प्रतिदिन पानी के साथ सेवन करने से बवासीर में लाभ होता है।

रक्त को साफ करने में मददगार-

बबूल में प्राकृतिक रक्त शोधक का गुण पाया जाता है। जो शरीर से अशुद्धियों (विषाक्त पदार्थों) को दूर करने में सहायता करता है। इसके अलावा बबूल छाल के काढ़ा से इम्यूनिटी को भी बूस्ट किया जा सकता है।

बैक्टीरियारोधी, फंगसरोधी सूक्ष्मजीवी रोधी गुण-

बबूल को लेकर किए गए विभिन्न शोधों से पता चलता है कि यह अनेक प्रकार के बैक्टीरिया, पैथोजेनिक (रोगजनक) फंजाई एवं पैरासाइट्स (परजीवी) की वृद्धि को रोकता है।

बबूल के नुकसान-

  • बबूल का पर्याप्त मात्रा में प्रयोग या दवा के रूप में इस्तेमाल शरीर पर कोई हानिप्रद प्रभाव नहीं डालता। लेकिन इसका अधिक प्रयोग एमेनोरिया (amenorrhoea) अर्थात मासिक धर्म के न होने की समस्या को और बिगाड़ सकता है।
  • अधिक मात्रा में बबूल का सेवन करने से लिवर और गुर्दे को नुकसान पहुंच सकता है।
  • गर्भवती महिलाओं को बबूल का उपयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि उनके लिए यह हानिकारक हो सकता है।
  • हृदय रोग के मरीज को इस जड़ी-बूटी को लेने से पहले चिकित्सक का परामर्श अवश्य लेना चाहिए।

बबूल कहां पाया जाता है?

वास्तव में बबूल मरुभूमि में उत्पन्न होने वाला वृक्ष है। मरुभूमि के अलावा बबूल के वृक्ष भारत में उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, राजस्थान,  बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र एवं आंध्रप्रदेश के जंगलों में पाए जाते हैं। भारत में बबूल के जंगली वृक्ष तो मिलते ही हैं साथ ही लगाए हुए वृक्ष भी मिलते हैं।

 


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