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क्या हैं टॉन्सिलाइटिस के कारण लक्षण और निदान

By Anand Dubey July 13, 2021 0 comments

मौसम में बदलाव होते ही लोगों को गले में दर्द एवं खराश की शिकायत होने लगती हैं। यह शिकायत अक्सर गले में इंफेक्शन के कारण होती है। जिसके बढ़ने पर गले में टॉन्सिल नामक बीमारी का खतरा होने लगता है। यह इंफेक्शन किसी भी व्यक्ति को हो सकता है। यह एक सामान्य संक्रमण है। लेकिल बदलते मौसम का संकेत मानकर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इससे पीड़ित व्यक्ति को खाने, पीने और निगलने में असुविधा होती है।

टॉन्सिलाइटिस क्या है?

टॉन्सिल शरीर का लसीका प्रणाली (Lymphatic System) का अंग हैं। जो गले के दोनों तरफ एवं जीभ के पीछे रहता है। जहां मुंह और नाक की ग्रंथियां मिलती हैं। यह ग्रंथियां शरीर में संक्रमण के कारण बनने वाले बैक्टीरिया को अंदर जाने से रोकती हैं। इस प्रकार से टॉन्सिल शरीर के रक्षा-तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जब टॉन्सिल्स में किसी भी तरह का संक्रमण होता है। जिससे टॉन्सिल के आकार में बदलाव और सूजन होने लगती है। तब इसे अंग्रेजी में टॉन्सिलाइटिस (Tonsillitis) एवं हिंदी में गालगुटिका शोथ कहा जाता हैं। वैसे टॉन्सिलाइटिस किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है। लेकिन ज्यादातर यह छोटे बच्चों से लेकर किशोरावस्था (5-15 साल तक) के लोगों में देखने को मिलता है।

टॉन्सिलाइटिस के लक्षण

  • गले में असहनीय दर्द का महसूस होना।
  • निगलने में अधिक तकलीफ होना।
  • गले की सूजी हुई लसीका ग्रंथि का दिखाई देना।
  • तेज बुखार का आना।
  • गले का लगातार सूखना।
  • जबड़े एवं गर्दन में दर्द होना।
  • सिर में दर्द होना।
  • कान के निचले हिस्से में दर्द होना।
  • अधिक थकान, कमजोरी और चिड़चिड़ापन महसूस करना।
  • टॉन्सिल पर सफ़ेद निशान का दिखाई देना।
  • दो सप्ताह से भी अधिक समय तक आवाज में भारीपन रहना।

क्या होते हैं टॉन्सिलाइटिस के कारण?

टॉन्सिलाइटिस होने के मुख्य दो कारण हैं। पहला जीवाणु (Bacteria) द्वारा और दूसरा विषाणु (virus) द्वारा। इसके अलावा अन्य कारण भी होते हैं। आइए चर्चा करते हैं इन्हीं कारणों के बारे में;

  • वायरल इन्फेक्शन (कॉमन कोल्ड) की वजह से।
  • चिल्लाने या आवाज़ दबाने से।
  • रासायनिक धुएं या वायु प्रदूषण में सांस लेने से।
  • काली खांसी और इन्फ्लूएंजा होने पर।
  • किसी पदार्थ से एलर्जी होने पर।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर।
  • गले में नमी के कम होने पर।
  • अधिक ठंडी चीजों जैसे आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक आदि का सेवन करने पर।
  • स्ट्रेपकोकस नामक जीवाणु का शरीर में प्रवेश करने पर।
  • अधिक धूम्रपान करने पर।

टॉन्सिल्स के प्रकार?

एक्यूट टॉन्सिल

इस प्रकार के टॉन्सिल में सूजन आ जाती है। यह मुख्य रूप से गले में इंफेक्शन के कारण होता है। यह फैरिंक्स यानी जीभ के पीछे के भाग (गले के एक हिस्से) को प्रभावित करता है। यह ज्यादातर युवाओं में देखने को मिलता है ।

रिकरेंट टॉन्सिल

टॉन्सिल की यह समस्या छोटे बच्चों में देखने को मिलती हैं। जिसे एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग से ठीक किया जाता है। कुछ बच्चों में यह समस्या बार-बार उत्पन्न होने लगती है।

क्रोनिक टॉन्सिल

यह टॉन्सिल का गंभीर रूप है। इससे पीड़ित व्यक्ति के गले में टॉन्सिल स्टोन (एक प्रकार का चिकना पदार्थ) बनने लगते हैं।

पेरिटॉन्सिलर एब्सेस

यह भी टॉन्सिल का ही प्रकार है। जो सिर और गर्दन में अधिक संक्रमण होने की वजह से होता है। इस प्रकार का टॉन्सिल भी युवाओं में अधिक देखने को मिलते हैं।

टॉन्सिलाइटिस होने पर ध्यान रखें यह बातें

  • धूम्रपान करने से बचें।
  • नमक वाले गुनगुने पानी से गरारे करें।
  • प्रचुर मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन करें।
  • कफवर्धक पदार्थों जैसे दही, बर्फ का पानी, ठंडा दूध, आइसक्रीम, चावल आदि का बिल्कुल सेवन न करें।
  • बासी भोजन, जंक फूड के सेवन से बचें।
  • किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचने के लिए भोजन करने से पहले हाथों को अच्छी तरह से धोएं।
  • छींकने और खांसने के बाद या शौचालय से आने के बाद हाथों को अच्छी तरह से धोएं।
  • तैलीय एवं वसायुक्त भोजन के सेवन से बचें।
  • संक्रामक एवं प्रदूषित वातावरण में जाने से बचें।

टॉन्सिलाइटिस के घरेलू उपचार

  • गले के दर्द और गले से संबंधित किसी भी प्रकार के संक्रमण से राहत पाने के लिए चाय और सूप जैसे गर्म तरल पदार्थों का सेवन करें।
  • गर्म दूध में एक चम्मच हल्दी डालकर सेवन करने से संक्रमण से बचाव होता हैं। क्योंकि हल्दी में संक्रमण को दूर करने की क्षमता होती है।
  • लहसुन में एंटी-बैक्टीरियल गुण मौजूद होते हैं। जो गले के संक्रमण को दूर करने में मदद करते हैं। इसके लिए लहसुन की 2 से 3 कलियों को अपने दांतों के बीच रखकर चूसने से फायदा होता है।
  • फिटकरी के पाउडर को पानी में उबालकर गरारे करने से टॉन्सिलाइटिस में आराम मिलता हैं।
  • अदरक में एंटीबैक्टीरियल गुण पाया जाता है। जो गले की सूजन और दर्द को दूर करता है। इसलिए किसी भी रूप में अदरक का इस्तेमाल करना गले के संक्रमण हेतु फायदेमंद होता है।
  • तुलसी में एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं। जो बदलते मौसम में शरीर को होने वाली दिक्कतों से बचाने का काम करते हैं। तुलसी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को भी बढ़ाती है।
  • एक कप पानी में नीम की 4-5 पत्तियों को उबालकर पीना, गले के लिए काफी फायदेमंद होता है।
  • गले में इंफेक्शन हेतु काली मिर्च से बनी चाय का सेवन करना अच्छा होता है। क्योंकि काली मिर्च में एंटीऑक्सीडेंट गुण पाया जाता है। जो एक प्राकृतिक दर्द निवारक होता है। जो गले की खराश और दर्द में राहत दिलाता है।
  • टॉन्सिल के घरेलू इलाज में से एक मेथी के बीज भी है। क्योंकि मेथी के बीज में एंटीमाइक्रोबियल और एंटीवायरल गुण मौजूद होते हैं। जो टॉन्सिल में संक्रमण उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया को दूर करने में मदद करते हैं।
  • जायफल और बरगामोट के तेल में कैफीन होता है। जिसका ठंडा, सुखदायक और ताजा प्रभाव ट्रॉन्सलाइटिस में आराम दिलाता है। इसलिए गले से संबंधित कोई परेशानी होने पर जायफल या बरगामोट तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • शहद युक्त मिश्रित चाय शुष्क गले के लिए अच्छे घरेलू उपचारों में से एक है। क्योंकि यह गले की परेशानी को कम करने में मदद करती है। इसलिए गले में खराश और खांसी होने पर यह चाय (शहद युक्त मिश्रित चाय) कारगर साबित होती है।
  • अंजीर टॉन्सिल के लिए अच्छा होता है। क्योंकि इसमें फेनोलिक यौगिक मौजूदगी के कारण यह एंटीइंफ्लेमेटरी गुणों को प्रदर्शित करता हैं। जो गले के अंदर की सूजन को कम करने में सहायक होता हैं। इसके लिए अंजीर को पानी में उबालकर पेस्ट बनाकर गले में लगाएं।
  • सेब का सिरका गले का दर्द और खांसी के लिए अच्छी दवाओं में से एक है। क्योंकि इसमें एसिटिक एसिड होता है। जिसमें एंटीमाइक्रोबियल गुण होता है। जो बैक्टीरिया और वायरस संक्रमण से लड़ता है।
  • कैमोमाइल में एंटी इंफ्लेमेटरी, एंटी बैक्टीरियल गुण होते है। जो टॉन्सिल के कारण होने वाली सूजन और दर्द में मदद करते हैं। इसलिए कैमोमाइल चाय को घरेलू उपचार के तौर पर इस्तेमाल में लाया जा सकता है।
  • गले में टॉन्सिल का इलाज के लिए पुदीने की चाय बेहतर विकल्प है। दरअसल, टॉन्सिल का एक कारण मुंह का संक्रमण भी हो सकता है। वहीं, पुदीने में मौजूद एंटीवायरल और एंटीबैक्टीरियल गुण इस संक्रमण को रोकने में सहायक होते हैं।

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